कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) इन दिनों गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं। ताजा घटनाक्रम में राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। खास बात यह है कि इस सप्ताह पार्टी छोड़ने वाली वह दूसरी राज्यसभा सांसद हैं।

राजनीतिक जानकार इसे सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष और बिखराव का संकेत मान रहे हैं। बंगाल से लेकर दिल्ली तक पार्टी के अंदर जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं, उसने ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राज्यसभा की सदस्यता से भी दिया इस्तीफा

सूत्रों के अनुसार सुष्मिता देव ने बुधवार सुबह राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति से मुलाकात कर अपना आधिकारिक त्यागपत्र सौंप दिया। इसके साथ ही उन्होंने न केवल संसदीय पद छोड़ा, बल्कि असम में तृणमूल कांग्रेस के संगठन को भी बड़ा झटका दिया।

उन्होंने असम टीएमसी के अध्यक्ष पद समेत सभी सांगठनिक जिम्मेदारियों से इस्तीफा दे दिया है। इससे असम में पार्टी की स्थिति पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

इस्तीफे के बाद क्या बोलीं सुष्मिता देव?

इस्तीफा देने के बाद सुष्मिता देव ने मीडिया से बातचीत में कहा,

"आज मैं एक आजाद महिला हूं। मैं हिमंता दा को लंबे समय से जानती हूं। मैं उनसे शिष्टाचार के नाते मिलने गई थी। मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि कौन क्या कर रहा है। साथ ही मैं बंगाल की राजनीति में सीधे तौर पर शामिल नहीं हूं क्योंकि मैं असम से हूं।"

उनके इस बयान के बाद राजनीतिक अटकलों का दौर और तेज हो गया है।

बीजेपी में शामिल होने की अटकलें तेज

सुष्मिता देव के इस्तीफे के तुरंत बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से उनकी मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

सूत्रों का दावा है कि आने वाले दिनों में वह भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम सकती हैं। हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन उनके इस्तीफे और मुख्यमंत्री से मुलाकात को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

यदि सुष्मिता देव बीजेपी में शामिल होती हैं तो यह न केवल असम बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जाएगा।

कौन हैं सुष्मिता देव?

सुष्मिता देव पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संतोष मोहन देव की बेटी हैं। उनका परिवार असम की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली रहा है।

उनकी राजनीतिक यात्रा कई महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरी है:

  • कांग्रेस की राष्ट्रीय नेता रहीं
  • ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं
  • असम के सिलचर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुनी गईं
  • 2021 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुईं
  • असम में टीएमसी को मजबूत करने की जिम्मेदारी संभाली

जब उन्होंने कांग्रेस छोड़ी थी, तब इसे ममता बनर्जी के राष्ट्रीय विस्तार अभियान की बड़ी सफलता माना गया था। लेकिन अब उनका टीएमसी छोड़ना पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।

सुखेंदु शेखर रे भी छोड़ चुके हैं पार्टी

सुष्मिता देव से पहले इसी सप्ताह राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे ने भी पार्टी छोड़ने का ऐलान किया था।

रे लंबे समय तक ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में गिने जाते थे। उन्होंने इस्तीफे के साथ जारी अपने बयान में न केवल पार्टी नेतृत्व बल्कि बंगाल में पिछले 15 वर्षों की टीएमसी सरकार पर भी सवाल उठाए थे।

उनका इस्तीफा पहले ही पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ था और अब सुष्मिता देव के जाने से संकट और गहरा गया है।

बंगाल में भी बगावत के संकेत

राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे ऐसे समय में हुए हैं जब पश्चिम बंगाल में भी पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया है।

हाल ही में 58 टीएमसी विधायकों ने पार्टी नेतृत्व की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाया। उन्होंने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार शोवनदेब चट्टोपाध्याय का समर्थन नहीं किया और विपक्ष के नेता पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी के पक्ष में अपनी राय व्यक्त की।

इस घटनाक्रम ने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं।

लोकसभा सांसदों का भी अलग रुख

राजनीतिक संकट यहीं नहीं रुका। खबरों के अनुसार टीएमसी के कई लोकसभा सांसदों ने भी पार्टी नेतृत्व से असहमति जताई है।

बताया जा रहा है कि 20 लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने की बात कही।

यदि यह घटनाक्रम आगे बढ़ता है तो यह ममता बनर्जी की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और टीएमसी की ताकत दोनों पर असर डाल सकता है।

ममता बनर्जी के सामने क्या हैं चुनौतियां?

तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत रही है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं:

1. संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना

लगातार इस्तीफों से कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

2. राष्ट्रीय विस्तार की रणनीति पर असर

ममता बनर्जी लंबे समय से खुद को राष्ट्रीय विपक्षी राजनीति के प्रमुख चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं।

3. असम और पूर्वोत्तर में कमजोर पड़ सकती है पकड़

सुष्मिता देव को असम में टीएमसी का चेहरा माना जाता था। उनके जाने से पार्टी को नुकसान हो सकता है।

4. विपक्षी गठबंधन में प्रभाव कम होने का खतरा

यदि पार्टी में टूट जारी रहती है तो राष्ट्रीय स्तर पर उसकी राजनीतिक ताकत प्रभावित हो सकती है।

क्या टीएमसी में शुरू हो गया है बड़ा बिखराव?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार इस्तीफे और बगावत के संकेत किसी भी दल के लिए चिंता का विषय होते हैं।

हालांकि टीएमसी नेतृत्व अभी भी स्थिति को नियंत्रण में बताने की कोशिश कर रहा है, लेकिन जिस तरह से राज्यसभा सांसद, विधायक और लोकसभा सांसदों के नाम सामने आ रहे हैं, उससे पार्टी के भीतर असंतोष की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

निष्कर्ष

सुष्मिता देव का इस्तीफा तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। इससे पहले सुखेंदु शेखर रे के इस्तीफे और पार्टी के भीतर सामने आए असंतोष ने ममता बनर्जी की चिंताओं को बढ़ा दिया है।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या सुष्मिता देव वास्तव में बीजेपी में शामिल होती हैं और क्या टीएमसी नेतृत्व इस बढ़ते राजनीतिक संकट को संभाल पाएगा। आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय राजनीति में इस घटनाक्रम का बड़ा असर देखने को मिल सकता है।