रांची: झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर अचानक हलचल तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए राज्यसभा की दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर हुई पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक में इस प्रस्ताव पर सहमति बनी। बैठक के बाद पार्टी नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिया कि दोनों सीटों पर झामुमो अपनी दावेदारी पेश करेगा और उम्मीदवारों के चयन का अंतिम फैसला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन करेंगे।
इस फैसले के सामने आने के बाद झारखंड की सियासत में नए समीकरण बनने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस निर्णय का असर सत्तारूढ़ गठबंधन पर पड़ेगा या फिर चुनाव से पहले कोई नया राजनीतिक समझौता सामने आएगा।
हेमंत आवास पर हुई महत्वपूर्ण बैठक
राज्यसभा चुनाव की रणनीति तय करने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर झामुमो की अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक में मंत्री हफीजुल हसन, दीपक बिरुआ, स्टीफन मरांडी, नलिन सोरेन, बसंत सोरेन समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
बैठक के बाद मंत्री हफीजुल हसन ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी ने राज्यसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति तय कर ली है। उन्होंने कहा कि झामुमो दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा और उम्मीदवारों के नाम पर अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन करेंगे।
इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
कांग्रेस ने पहले ही कर दी है उम्मीदवार की घोषणा
राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है। पार्टी नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता प्रणव झा को झारखंड से राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की घोषणा कर दी है।
कांग्रेस की इस घोषणा के अगले ही दिन झामुमो की बैठक और दोनों सीटों पर दावा करने का फैसला सामने आया। ऐसे में गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर असहजता की स्थिति पैदा होती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों दल अपने-अपने उम्मीदवारों पर अड़े रहते हैं तो यह गठबंधन के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति बन सकती है।
क्या गठबंधन में बढ़ेगी खींचतान?
झारखंड में झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दलों का गठबंधन सत्ता में है। पिछले कुछ वर्षों से गठबंधन ने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौतियों का सामना एकजुट होकर किया है।
लेकिन राज्यसभा चुनाव हमेशा से राजनीतिक संतुलन और शक्ति प्रदर्शन का मंच माना जाता है। ऐसे में झामुमो द्वारा दोनों सीटों पर दावा ठोकना कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
हालांकि अभी तक किसी भी दल की ओर से गठबंधन टूटने जैसी कोई बात सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस फैसले को दबाव की राजनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
क्या कहते हैं विधानसभा के आंकड़े?
राज्यसभा चुनाव में जीत का गणित पूरी तरह विधानसभा की संख्या पर आधारित होता है। झारखंड विधानसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास कुल मिलाकर लगभग 56 विधायक हैं।
राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए लगभग 28 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि गठबंधन पूरी तरह एकजुट रहता है तो दोनों सीटें आसानी से जीत सकता है।
लेकिन यदि झामुमो और कांग्रेस अलग-अलग रणनीति अपनाते हैं तो स्थिति जटिल हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, झामुमो के पास अकेले इतनी संख्या नहीं है कि वह बिना सहयोग के दोनों सीटें जीत सके। इसलिए अंतिम समय में किसी समझौते या सीट बंटवारे की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
आखिर क्यों महत्वपूर्ण है राज्यसभा चुनाव?
राज्यसभा चुनाव केवल संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व का मामला नहीं होता, बल्कि यह राजनीतिक दलों की ताकत, प्रभाव और भविष्य की रणनीति का भी संकेत देता है।
झामुमो लंबे समय से झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति का सबसे प्रभावशाली दल रहा है। ऐसे में पार्टी चाहती है कि राज्यसभा में उसका प्रतिनिधित्व और मजबूत हो।
वहीं कांग्रेस भी राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखना चाहती है। इसलिए दोनों दलों के बीच सीट को लेकर प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक मानी जा रही है।
क्या हेमंत सोरेन करेंगे अंतिम फैसला?
बैठक के बाद पार्टी नेताओं ने साफ कर दिया है कि उम्मीदवारों के चयन का अंतिम अधिकार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पास रहेगा।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि हेमंत सोरेन अंतिम समय तक सभी विकल्पों पर विचार करेंगे। संभावना यह भी है कि गठबंधन धर्म को ध्यान में रखते हुए कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे कांग्रेस और झामुमो दोनों संतुष्ट रहें।
हालांकि फिलहाल पार्टी की ओर से दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारने का निर्णय राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
सभी की निगाहें हेमंत सोरेन पर
राज्यसभा चुनाव की नामांकन प्रक्रिया जारी है और आने वाले दिनों में राजनीतिक तस्वीर और साफ होगी। फिलहाल झारखंड की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस और झामुमो राज्यसभा चुनाव में एकजुट रहेंगे या फिर दोनों दलों के बीच राजनीतिक टकराव देखने को मिलेगा।
झामुमो की बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी राज्यसभा चुनाव को लेकर आक्रामक रणनीति अपनाने के मूड में है। वहीं कांग्रेस भी अपने उम्मीदवार की घोषणा कर पीछे हटने के संकेत नहीं दे रही है।
ऐसे में अब सभी की निगाहें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अगले कदम पर टिकी हैं। आने वाले कुछ दिन न केवल राज्यसभा चुनाव बल्कि झारखंड की गठबंधन राजनीति के भविष्य की दिशा भी तय कर सकते हैं।