रांची। झारखंड की समृद्ध लोक कला और सांस्कृतिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर सम्मान मिला है। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार समारोह में झारखंड के तीन कलाकारों को सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने हाथों सभी सम्मानित कलाकारों को पुरस्कार प्रदान किए।
सम्मान पाने वालों में सरायकेला के प्रसिद्ध छऊ मुखौटा शिल्पकार गुरु सुशांत कुमार महापात्र तथा रांची के बुंडू की सगी बहनें बुटन देवी और सोमवारी देवी शामिल हैं।
छऊ मुखौटा शिल्प के लिए सुशांत कुमार महापात्र सम्मानित
सरायकेला के गुरु सुशांत कुमार महापात्र को छऊ और पारंपरिक मुखौटा शिल्प के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पुरस्कार मिलने के बाद उन्होंने इसे अपने गुरुओं को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि सरायकेला की छऊ मुखौटा कला को आगे बढ़ाना उनके जीवन का उद्देश्य है। वह आने वाले समय में भी छऊ मुखौटा शिल्प और छऊ नृत्य के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए काम करते रहेंगे।
बुंडू की बुटन और सोमवारी देवी को भी मिला सम्मान
रांची जिले के बुंडू की सगी बहनें बुटन देवी और सोमवारी देवी को पारंपरिक नचनी नृत्य परंपरा को जीवित रखने और आगे बढ़ाने के लिए सम्मानित किया गया।
दोनों बहनों ने झारखंड की पारंपरिक लोक संस्कृति और नृत्य परंपरा को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय स्तर पर मिले इस सम्मान को झारखंड की लोक कला और कलाकारों के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
115 कलाकारों को मिला सम्मान
वर्ष 2024 और 2025 के लिए आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में देशभर के कुल 115 कलाकारों को संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप एवं पुरस्कार प्रदान किए गए।
इस समारोह में झारखंड के तीन कलाकारों का सम्मान राज्य की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा सम्मानित किए जाने से कलाकारों के साथ-साथ उनके क्षेत्र के लोगों में भी खुशी का माहौल है।
राष्ट्रीय मंच पर झारखंड की लोक संस्कृति को पहचान
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिलने से झारखंड की छऊ, पारंपरिक मुखौटा शिल्प और नचनी नृत्य जैसी लोक परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। कलाकारों का कहना है कि ऐसे सम्मान नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने और पारंपरिक कलाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करेंगे।
झारखंड की लोक कला को मिले इस सम्मान को राज्य की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।