झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शक या सामान्य आरोपों के आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि अवैध संबंध जैसे गंभीर आरोपों को साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना अनिवार्य है।
यह फैसला दो बच्चों वाले दंपती से जुड़े मामले में आया है। इस दंपती का विवाह दिसंबर 2011 में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था। पति ने दावा किया कि विवाह के कुछ समय बाद उसकी पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध बन गया और वर्ष 2021 में पत्नी दोनों बच्चों, आभूषण और नगदी लेकर घर छोड़कर चली गई।
🏛 फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका
पति ने झारखंड के गोड्डा जिले स्थित फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2022 को याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए थे।
⚖ झारखंड हाईकोर्ट में अपील
पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायाधीश अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा।
🔍 गंभीर आरोप प्रमाणित नहीं
खंडपीठ ने कहा कि केवल संदेह या सामान्य आरोपों के आधार पर वैवाहिक संबंध विच्छेद की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने नोट किया कि कथित अवैध संबंध के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं प्रस्तुत किए गए, जैसे:
इसलिए अदालत ने कहा कि आरोप प्रमाणित नहीं माने जा सकते।
💡 सामान्य मतभेद क्रूरता नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में सामान्य मतभेद, तकरार या पारिवारिक विवाद अपने-आप में ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आते। तलाक जैसे गंभीर निर्णय के लिए आरोपों का स्पष्ट और प्रमाणिक होना आवश्यक है।
⚖ न्यायालय का संदेश
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केवल शक या अनुमान पर तलाक संभव नहीं
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गंभीर आरोपों के लिए ठोस सबूत जरूरी
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फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने यही दृष्टिकोण अपनाया
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वैवाहिक विवाद में न्यायिक प्रक्रिया की सख्ती सुनिश्चित
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