नई दिल्ली। पंजाबी सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम: पंजाब '95) एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। फिल्म को OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर चुपचाप रिलीज किए जाने के कुछ ही घंटों बाद हटा लिया गया, जिसके बाद यह मामला अब केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) तक पहुंच गया है। बढ़ते विवाद के बीच मंत्रालय ने फिल्म की सामग्री (Content) की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय अंतरविभागीय समिति (Inter-Departmental Committee - IDC) का गठन किया है।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब फिल्म पहले ही सेंसर बोर्ड (CBFC) के साथ लंबे कानूनी विवाद, 120 से अधिक कट्स की मांग और लगभग तीन वर्षों की देरी का सामना कर चुकी है। अब सरकार की विशेष समिति यह तय करेगी कि फिल्म की सामग्री सूचना प्रौद्योगिकी नियमों और राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रावधानों के अनुरूप है या नहीं।



 

ZEE5 पर रिलीज के कुछ घंटों बाद ही हटाई गई फिल्म

'सतलुज' को 3 जुलाई को बिना किसी बड़े प्रचार-प्रसार के OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज किया गया। लेकिन रिलीज के कुछ ही घंटों बाद फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया।

फिल्म हटने के बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई। कई लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बताया, जबकि कुछ लोगों ने फिल्म के विषय को संवेदनशील मानते हुए सरकार के फैसले का समर्थन किया।

फिल्म को हटाने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने पूरे मामले की समीक्षा शुरू की और अब इसकी जांच के लिए विशेष समिति गठित कर दी गई है।


आखिर क्यों बनाई गई IDC?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A तथा आईटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 के तहत कार्रवाई की है।

धारा 69A सरकार को यह अधिकार देती है कि यदि कोई ऑनलाइन सामग्री सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत की संप्रभुता या अखंडता के लिए खतरा मानी जाती है, तो उसे हटाने या उसकी पहुंच रोकने के निर्देश दिए जा सकते हैं।

वहीं, आईटी नियम 2021 के तहत गठित Inter-Departmental Committee (IDC) डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट से जुड़ी शिकायतों की समीक्षा करती है और केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें देती है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, अब यह समिति फिल्म की पूरी सामग्री का परीक्षण करेगी और अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपेगी। इसके बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।


क्या है 'सतलुज' की कहानी?

'सतलुज' दरअसल मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित बायोपिक है।

जसवंत सिंह खालरा ने 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों और हजारों लोगों के कथित गैरकानूनी अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों को उजागर किया था। उन्होंने दावा किया था कि तत्कालीन परिस्थितियों में बड़ी संख्या में लोगों की हत्या के बाद उनके शवों का गुप्त रूप से अंतिम संस्कार किया गया।

1995 में जसवंत सिंह खालरा का कथित तौर पर अपहरण कर लिया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। उनके जीवन और संघर्ष को ही इस फिल्म में दिखाया गया है।

फिल्म का विषय ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, जिसके कारण शुरुआत से ही इसे लेकर विवाद बना हुआ है।


तीन साल से अटकी थी फिल्म

इस फिल्म का निर्माण काफी पहले पूरा हो चुका था और इसे वर्ष 2023 में रिलीज किया जाना था।

हालांकि, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फिल्म में 120 से अधिक कट लगाने की मांग की थी। निर्माताओं ने इतने बड़े बदलाव करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद फिल्म को सेंसर प्रमाणपत्र नहीं मिला और मामला कानूनी प्रक्रिया में चला गया। लगभग तीन वर्षों तक फिल्म रिलीज नहीं हो सकी।

आखिरकार निर्माताओं ने OTT प्लेटफॉर्म पर इसे रिलीज करने की कोशिश की, लेकिन वहां भी फिल्म कुछ घंटों के भीतर हटा दी गई।


दिलजीत दोसांझ ने क्या कहा?

फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने सोशल मीडिया पर लाइव आकर अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से ही अंदाजा था कि फिल्म ज्यादा समय तक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं रहेगी।

दिलजीत ने कहा कि उनका और फिल्म निर्माताओं का उद्देश्य दर्शकों तक फिल्म पहुंचाना था और वह मकसद काफी हद तक पूरा हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में लोगों ने फिल्म देख ली और संभव है कि कई लोगों ने इसे डाउनलोड भी कर लिया हो।

उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर समर्थकों और आलोचकों के बीच बहस और तेज हो गई।


FWICE ने उठाए सवाल

दिलजीत दोसांझ के बयान के बाद फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) के अध्यक्ष बी.एन. तिवारी ने भी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि दिलजीत जैसे बड़े कलाकारों को फिल्मों का चयन करते समय उसके सामाजिक और राष्ट्रीय प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।

तिवारी का कहना था कि दिलजीत आज केवल पंजाब ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लोकप्रिय कलाकार हैं, इसलिए उनके हर निर्णय का व्यापक असर पड़ता है।

हालांकि, इस बयान के बाद भी सोशल मीडिया पर लोगों की राय बंटी हुई नजर आई।


सेंसरशिप बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

'सतलुज' विवाद ने एक बार फिर भारत में फिल्म सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस छेड़ दी है।

एक पक्ष का मानना है कि यदि किसी फिल्म से सामाजिक तनाव या राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित होने की आशंका हो तो सरकार को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।

वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्ति पर आधारित फिल्म को देखने और समझने का अधिकार दर्शकों को होना चाहिए तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति पर अत्यधिक प्रतिबंध नहीं लगने चाहिए।

अब इस पूरे मामले में IDC की रिपोर्ट काफी अहम मानी जा रही है।


फिल्म की स्टारकास्ट और निर्देशन

'सतलुज' का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ मुख्य भूमिका में नजर आए हैं।

इसके अलावा अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, गीतिका विद्या सहित कई कलाकार महत्वपूर्ण भूमिकाओं में दिखाई देते हैं।

फिल्म का निर्माण लंबे समय से चर्चा में रहा है और रिलीज से पहले ही यह देश की सबसे विवादित फिल्मों में शामिल हो चुकी है।


अब आगे क्या होगा?

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा गठित IDC फिल्म की सामग्री की विस्तृत समीक्षा करेगी। समिति यह देखेगी कि फिल्म में ऐसा कोई कंटेंट तो नहीं है जो आईटी नियमों या राष्ट्रीय हित से जुड़े प्रावधानों का उल्लंघन करता हो।

समिति की रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार आगे का फैसला लेगी। इसमें फिल्म को दोबारा रिलीज करने, संशोधन कराने या अन्य कानूनी कार्रवाई जैसे विकल्प शामिल हो सकते हैं।

फिलहाल फिल्म OTT प्लेटफॉर्म से हट चुकी है और दर्शकों की नजर अब सरकार की जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है।


निष्कर्ष

दिलजीत दोसांझ की 'सतलुज' केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि सेंसरशिप, डिजिटल कंटेंट रेगुलेशन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चल रही बहस का नया केंद्र बन गई है। CBFC के साथ वर्षों तक चले विवाद के बाद OTT रिलीज और फिर कुछ ही घंटों में फिल्म हटाए जाने से यह मामला और संवेदनशील हो गया है। अब MIB द्वारा गठित IDC की जांच और उसकी सिफारिशें तय करेंगी कि इस विवादित फिल्म का भविष्य क्या होगा।