रांची: हूल दिवस के अवसर पर केन्द्रीय सरना समिति ने संथाल हूल के महान क्रांतिकारी वीर शहीद सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा वीरांगनाओं फूलो-झानो को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उनके अद्वितीय बलिदान और संघर्ष को याद किया। इस अवसर पर समिति ने उनके आदर्शों को अपनाने और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर कार्य करने का आह्वान किया।
केन्द्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की ने कहा कि वर्ष 1855 का संथाल हूल केवल एक विद्रोह नहीं था, बल्कि जल, जंगल, जमीन, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए लड़ी गई ऐतिहासिक जनक्रांति थी। उन्होंने कहा कि सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो ने अंग्रेजी शासन, महाजनी प्रथा और शोषण के विरुद्ध संघर्ष कर आदिवासी समाज में नई चेतना का संचार किया।
अजय तिर्की ने कहा कि आज भी झारखंड में आदिवासी समाज के सामने कई चुनौतियां मौजूद हैं। उनका आरोप है कि राज्य में आदिवासियों की जमीन की लूट जारी है और कुछ लोग आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों के नाम हस्तांतरित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) अधिनियम का कई स्थानों पर उल्लंघन हो रहा है, जिससे आदिवासी समाज के संवैधानिक और पारंपरिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हूल विद्रोह के महानायकों का त्याग और बलिदान आज भी समाज को अन्याय, शोषण और अधिकारों के हनन के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता संग्राम के दौर में थे।
केन्द्रीय सरना समिति ने हूल दिवस के अवसर पर सभी लोगों से वीर शहीदों के आदर्शों को आत्मसात करने तथा सामाजिक न्याय, समानता, आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर कार्य करने की अपील की। समिति का कहना है कि शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनके सपनों के अनुरूप न्यायपूर्ण और समानता पर आधारित समाज के निर्माण की दिशा में सभी मिलकर प्रयास करेंगे।