बिहार के भोजपुर जिले से एक ऐसी अनोखी घटना सामने आई है, जिसने पूरे राज्य में चर्चा छेड़ दी है। यहां एक पोते ने अपनी दादी की शवयात्रा को इस तरह भव्य बना दिया कि लोग हैरान रह गए।
शाहपुर प्रखंड में 95 वर्षीय कौशल्या देवी के निधन के बाद उनकी अंतिम यात्रा को यादगार बनाने के लिए परिवार ने ऐसा आयोजन किया, जो आम तौर पर किसी शादी समारोह में देखने को मिलता है।
700 गाड़ियां और 3500 लोगों की भीड़
कौशल्या देवी की शवयात्रा में शामिल व्यवस्थाएं किसी बड़े इवेंट से कम नहीं थीं:
- 700 से ज्यादा गाड़ियां
- 3500 से अधिक लोग शामिल
- ड्रोन कैमरे से पूरी कवरेज
- बैंड-बाजा और पारंपरिक नृत्य
शवयात्रा का नजारा इतना भव्य था कि लोग छतों पर चढ़कर इसे देखने लगे। कई लोगों को तो यह समझ ही नहीं आया कि यह बारात है या अंतिम यात्रा।
ड्रोन कैमरा और ‘लौंडा नाच’ ने खींचा ध्यान
इस अनोखी शवयात्रा में आधुनिक और पारंपरिक दोनों का संगम देखने को मिला।
- ड्रोन कैमरों से हर एंगल से वीडियो शूट
- ‘लौंडा नाच’ का आयोजन
- पूरे इलाके में उत्सव जैसा माहौल
इस तरह की शवयात्रा ने लोगों को चौंका दिया और सोशल मीडिया पर भी इसकी चर्चा तेज हो गई।
पोते ने क्यों बनाई इतनी खास विदाई?
बड़े पोते रमेश पांडेय के मुताबिक:
“हमने दादी के रूप में एक विरासत खो दी है। उनकी विदाई को हम यादगार बनाना चाहते थे।”
परिवार का कहना है कि यह सिर्फ एक शवयात्रा नहीं, बल्कि उनकी दादी के सम्मान में किया गया अंतिम समारोह था।
कैंसर से हुई थी कौशल्या देवी की मौत
कौशल्या देवी पिछले 3 साल से कैंसर से पीड़ित थीं।
उनके पति डॉ. जनार्दन पांडेय का निधन 7 साल पहले हो चुका था।
परिवार में:
- दो बेटे: वृंदावन पांडेय (वकील) और नारद पांडेय
- 6 पोते, जो अलग-अलग व्यवसाय से जुड़े हैं
आखिरी इच्छा को पोतों ने किया पूरा
कौशल्या देवी ने जीवन में एक इच्छा जताई थी:
👉 “मैं इस घर में दुल्हन बनकर आई थी, मेरी विदाई भी धूमधाम से हो।”
उनकी इस इच्छा को उनके 6 पोतों ने मिलकर पूरा किया—और उसे इतना भव्य बना दिया कि वह पूरे इलाके में मिसाल बन गया।
सोशल मीडिया पर वायरल, लोग बोले—“पोते हों तो ऐसे”
इस घटना के बाद इलाके में हर जुबान पर यही चर्चा है।
सोशल मीडिया पर भी लोग इसे लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं:
- “ऐसी विदाई पहली बार देखी”
- “पोते हों तो ऐसे”
- “Bihar is not for beginners”
निष्कर्ष
यह घटना सिर्फ एक अनोखी शवयात्रा नहीं, बल्कि एक परिवार के प्रेम, सम्मान और परंपरा को दिखाती है।
जहां एक तरफ लोग इसे भव्य आयोजन के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह अपने बुजुर्गों के प्रति सम्मान का भी अनोखा उदाहरण बन गया है।