पटना। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को मजबूत करने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में पटना नगर निगम ने एक सराहनीय और नवाचारी पहल की है। अब शहर में रीसाइक्लिंग न होने वाले प्लास्टिक कचरे से इको-फ्रेंडली पेवर ब्लॉक तैयार किए जाएंगे। यह प्रयोग न केवल प्लास्टिक कचरे की गंभीर समस्या का समाधान करेगा, बल्कि टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण सामग्री को भी बढ़ावा देगा।
इसके लिए पटना के रामचक बैरिया इलाके में विशेष संयंत्र स्थापित किया जा रहा है, जहां प्रतिदिन करीब 2000 पेवर ब्लॉक तैयार करने की क्षमता होगी।
क्यों पड़ी इस पहल की जरूरत?
राजधानी पटना में हर दिन लगभग 1100 टन कचरा निकलता है, जिसमें करीब 22 टन प्लास्टिक कचरा शामिल होता है। वर्षों से शहर के कचरा डंपिंग स्थलों पर लगभग 13 लाख टन कचरा जमा हो चुका है।
इससे जमीन पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। प्लास्टिक कचरे का वैज्ञानिक और स्थायी समाधान नगर निगम के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका था।
प्लास्टिक से पेवर ब्लॉक बनाने का विचार कैसे आया?
नगर आयुक्त यशपाल मीणा के नेतृत्व में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन विभाग ने इस समस्या का नवाचार के जरिए समाधान तलाशा। लैब स्तर पर तैयार किए गए प्लास्टिक पेवर ब्लॉक सभी तकनीकी और गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरे हैं।
अब ट्रायल पूरा होने और अंतिम स्वीकृति के बाद इसका व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन शुरू किया जाएगा।
कैसे बनते हैं प्लास्टिक से पेवर ब्लॉक?
इस प्रक्रिया में सबसे पहले ऐसे प्लास्टिक कचरे को एकत्र किया जाता है, जिसका सामान्य तौर पर पुनर्चक्रण संभव नहीं होता।
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प्लास्टिक को धोकर छोटे टुकड़ों में काटा जाता है
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फिर उसे पिघलाकर रेत, खदान की धूल या सिरेमिक कचरे जैसे एग्रीगेट के साथ मिलाया जाता है
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तैयार गर्म मिश्रण को सांचों में डालकर पेवर ब्लॉक बनाए जाते हैं
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ठंडा होने के बाद ये ब्लॉक मजबूत और उपयोग योग्य बन जाते हैं
पर्यावरण और आर्थिक फायदे
प्लास्टिक से बने ये पेवर ब्लॉक कई तरह से फायदेमंद हैं—
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प्लास्टिक कचरे का प्रभावी निपटान
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सीमेंट के कम उपयोग से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी
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पारंपरिक कंक्रीट की तुलना में हल्के, मजबूत और किफायती
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गर्मी, ठंड और ध्वनि के प्रति बेहतर प्रतिरोधक क्षमता
कहां होगा इनका उपयोग?
इन इको-फ्रेंडली पेवर ब्लॉकों का उपयोग—
में किया जा सकेगा।
हालांकि भारी ट्रैफिक वाले इलाकों में इनका उपयोग सीमित रहेगा, क्योंकि इनकी संपीडन क्षमता पारंपरिक कंक्रीट से कुछ कम होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में तकनीक में सुधार से इनकी मजबूती और जल प्रतिरोधक क्षमता को और बढ़ाया जा सकता है।
कैसे बदलेगी शहर की तस्वीर?
पटना नगर निगम की यह पहल कचरा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास—तीनों के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो आने वाले समय में यह मॉडल देश के अन्य शहरों के लिए भी उदाहरण बनेगा और प्लास्टिक कचरे को समस्या नहीं, बल्कि एक उपयोगी संसाधन के रूप में देखा जाएगा।