झारखंड के हजारीबाग जिले में अवैध कोयला कारोबार और वन विभाग की कथित मिलीभगत को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के हजारीबाग के पूर्व जिला अध्यक्ष शंभुलाल यादव ने पश्चिमी वन प्रमंडल, हजारीबाग के डीएफओ मौन प्रकाश पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
शंभुलाल यादव ने मुख्यमंत्री को शिकायत पत्र भेजकर अवैध कोयला तस्करी की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि डीएफओ मौन प्रकाश की शह पर जिले में बड़े पैमाने पर कोयले का अवैध उत्खनन और परिवहन हो रहा है।
क्या हैं शिकायत में लगाए गए आरोप?
शिकायत पत्र में लगाए गए आरोप काफी गंभीर बताए जा रहे हैं। इसके अनुसार:
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डीएफओ मौन प्रकाश वर्ष 2024 में पदस्थापन के बाद से
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विभागीय विकास योजनाओं में 7 प्रतिशत कमीशन लेते हैं
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कोयला माफियाओं से सांठगांठ कर
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जिले में अवैध कोयला तस्करी को संरक्षण दे रहे हैं
शिकायत में यह भी कहा गया है कि यह पूरा नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय है और इससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है।
चेकनाका को लेकर भी गंभीर सवाल
शंभुलाल यादव ने अपने पत्र में हजारीबाग–बरही मुख्य मार्ग और चौपारण क्षेत्र में बनाए गए नए चेकनाका पर भी सवाल उठाए हैं।
शिकायत के अनुसार:
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नया चेकनाका केवल वसूली के उद्देश्य से बनाया गया
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जबकि चौपारण के चोरदाहा में पहले से चेकपोस्ट मौजूद है
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चेकनाका पर ट्रकों से कथित रूप से अवैध वसूली की जाती है
कथित वसूली का ब्योरा:
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हो सकी है।
बड़कागांव में 6 जगह अवैध उत्खनन का दावा
शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि बड़कागांव क्षेत्र में डीएफओ के संरक्षण में:
यह राशि कथित रूप से स्थानीय नेटवर्क और संरक्षण देने वालों तक पहुंचाई जाती है।
DFO मौन प्रकाश ने आरोपों को किया खारिज
मीडिया में खबरें प्रकाशित होने के बाद जब DFO मौन प्रकाश से संपर्क किया गया, तो उन्होंने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया।
DFO का पक्ष:
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किसी भी प्रकार की कोयला चोरी में शामिल नहीं
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अवैध उत्खनन या तस्करी से कोई संबंध नहीं
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विकास योजनाओं में कमीशन लेने के आरोप पूरी तरह गलत
उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद और राजनीतिक प्रेरित हैं।
जांच की मांग, अब सरकार की भूमिका अहम
इस पूरे मामले में अब राज्य सरकार और वन विभाग की भूमिका अहम मानी जा रही है। शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच चुकी है और अगर जांच के आदेश दिए जाते हैं, तो यह मामला और गंभीर रूप ले सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह वन विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा।