रांची/गिरिडीह: झारखंड की राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनके पद से नहीं होती। सुदिव्य कुमार सोनू भी उन्हीं नेताओं में शामिल रहे। गिरिडीह की गलियों से निकलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के संगठन में अपनी जगह बनाने वाले सोनू ने तीन दशक से ज्यादा लंबे राजनीतिक सफर में कार्यकर्ता, संगठनकर्ता, विधायक, रणनीतिकार और कैबिनेट मंत्री की भूमिकाएं निभाईं।
गिरिडीह में समर्थकों के बीच ‘सोनू भैया’ के नाम से लोकप्रिय सुदिव्य सोनू को पार्टी के भीतर एक ऐसे नेता के तौर पर देखा जाता था, जो संगठन और चुनावी राजनीति की बारीकियों को करीब से समझते थे।
लेकिन उनका यह मुकाम किसी आसान राजनीतिक यात्रा का परिणाम नहीं था। इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, चुनावी हार, संगठन के लिए लगातार काम और शीर्ष नेतृत्व के साथ भरोसे का रिश्ता रहा।
गुरुजी के सान्निध्य में सीखी राजनीति
26 जुलाई 1970 को गिरिडीह में जन्मे सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक झुकाव शुरुआती दौर से ही झारखंड की अस्मिता और आंदोलन की राजनीति से जुड़ गया था।
वर्ष 1989 में उन्होंने झामुमो की प्राथमिक सदस्यता लेकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उनके राजनीतिक जीवन में दिशोम गुरु **शिबू सोरेन** की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। बताया जाता है कि शिबू सोरेन ने उनके पिता से कहकर उन्हें अपने साथ रखा और उन्हें अपने बेटे की तरह स्नेह देते हुए राजनीति की बारीकियां सिखाईं।
गुरुजी के करीब रहकर सोनू ने राजनीति को केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि संगठन और जनसरोकारों से जुड़ा संघर्ष समझा।
आंदोलन की जमीन से संगठन की जिम्मेदारी तक
अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर चले आंदोलन के दौर में सुदिव्य सोनू सक्रिय रहे। आंदोलन के दौरान उन्हें राजनीतिक संघर्षों और मुकदमों का सामना भी करना पड़ा।
यही दौर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को आकार देने वाला रहा। आंदोलन की राजनीति से निकले इस कार्यकर्ता ने धीरे-धीरे संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की और वर्ष 1992 में **गिरिडीह नगर झामुमो के संस्थापक अध्यक्ष** की जिम्मेदारी संभाली।
यह पद उनके लिए महज एक संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं था। यहीं से गिरिडीह की स्थानीय राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ बनने लगी।
जीत से पहले हार का लंबा दौर
आज उन्हें लगातार दो बार विधायक और मंत्री के रूप में याद किया जाता है, लेकिन विधानसभा तक पहुंचने का रास्ता उनके लिए आसान नहीं था।
सुदिव्य कुमार सोनू ने **2009 और 2014** में गिरिडीह विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इन हार के बावजूद उन्होंने संगठन और क्षेत्र में अपनी सक्रियता कम नहीं की।
2019 में आखिरकार लंबे संघर्ष का परिणाम मिला। उन्होंने गिरिडीह विधानसभा सीट से भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को हराकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया।
इसके बाद 2024 में उन्होंने फिर जीत दर्ज की और लगातार दूसरी बार गिरिडीह के विधायक बने।
गिरिडीह से रांची तक बढ़ता राजनीतिक प्रभाव
विधायक बनने के बाद सुदिव्य सोनू की भूमिका केवल गिरिडीह तक सीमित नहीं रही। झामुमो संगठन में उनकी सक्रियता और राजनीतिक समझ ने उन्हें राज्य स्तर पर महत्वपूर्ण बना दिया।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी मिली। **उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति तथा खेल एवं युवा कार्य** जैसे महत्वपूर्ण विभाग उनके पास रहे।
मंत्री के रूप में उनके सामने अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारियां थीं। खासकर शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी भूमिका लगातार चर्चा में रही।
पर्यटन को लेकर दिखी अलग सोच
पर्यटन विभाग संभालने के दौरान सुदिव्य सोनू का जोर झारखंड की प्राकृतिक खूबसूरती और स्थानीय पर्यटन क्षमता को नई पहचान दिलाने पर रहा।
इको-टूरिज्म, स्काईवॉक और होमस्टे जैसी अवधारणाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में पहल की गई। झारखंड के पर्यटन स्थलों को केवल घूमने की जगह के बजाय स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की सोच भी उनके काम का हिस्सा रही।
छात्रों और सरकार के बीच संवाद की भूमिका
JPSC और JSSC से जुड़े विवादों के दौरान भी सुदिव्य सोनू की भूमिका सामने आई। छात्रों की नाराजगी और सरकार के पक्ष के बीच संवाद कायम करने की कोशिशों में उन्होंने सक्रियता दिखाई।
युवाओं के मुद्दों पर सरकार का पक्ष रखने के साथ-साथ छात्रों की बात सरकार तक पहुंचाने की उनकी कोशिशों ने उन्हें इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण संवादकर्ता के रूप में स्थापित किया।
पर्दे के पीछे की रणनीति में माहिर
सुदिव्य सोनू की सबसे अलग पहचान उनकी रणनीतिक क्षमता को लेकर रही। वे उन नेताओं में माने जाते थे जो मंच से ज्यादा संगठन के भीतर की तैयारियों और चुनावी रणनीति पर काम करने के लिए जाने जाते थे।
2019 के आसपास झामुमो की सोशल मीडिया रणनीति को मजबूत करने में भी उनकी भूमिका बताई जाती है। पार्टी के लिए सोशल मीडिया टीम तैयार करने और डिजिटल माध्यमों के जरिए संगठन की पहुंच बढ़ाने पर उन्होंने जोर दिया।
इसी वजह से पार्टी के भीतर उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाने लगा, जो चुनावी माहौल को समझने के साथ संगठन की कमजोरियों और संभावनाओं को भी पहचानते थे।
कल्पना सोरेन की राजनीति में एंट्री से जुड़ी रणनीति
हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद झारखंड की राजनीति में जब बड़ा बदलाव आया, तब कल्पना सोरेन के सक्रिय राजनीति में आने का दौर भी शुरू हुआ।
कल्पना सोरेन के लिए गांडेय विधानसभा सीट को लेकर बनाई गई राजनीतिक रणनीति में सुदिव्य सोनू की अहम भूमिका बताई जाती है। बाद में गांडेय से कल्पना सोरेन की जीत ने इस रणनीति को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया।
यह घटनाक्रम सुदिव्य सोनू की उस छवि को और मजबूत करता है, जिसमें उन्हें झामुमो की चुनावी और संगठनात्मक रणनीति के महत्वपूर्ण चेहरों में गिना जाता था।
पद बड़ा हुआ, लेकिन ‘सोनू भैया’ नहीं बदले
मंत्री बनने के बाद भी गिरिडीह में उनकी लोकप्रिय पहचान 'सोनू भैया’ की ही रही।
कार्यकर्ताओं से सीधे मिलना, स्थानीय लोगों के बीच मौजूद रहना और संगठन के छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क बनाए रखना उनकी शैली का हिस्सा था। शायद यही वजह रही कि राजनीतिक पद बढ़ने के बावजूद उनकी जमीनी छवि बनी रही।
अचानक थम गया तीन दशक का सफर
एक ऐसा राजनीतिक सफर, जिसकी शुरुआत एक प्राथमिक सदस्य के रूप में हुई थी, तीन दशक से ज्यादा समय बाद कैबिनेट मंत्री के पद तक पहुंचा। इस सफर में आंदोलन था, संगठन था, चुनावी हार थी, जीत थी और सत्ता की जिम्मेदारी भी।
लेकिन 6 सितंबर 2026 को सुदिव्य कुमार सोनू के आकस्मिक निधन के साथ यह सफर अचानक थम गया।
गिरिडीह ने अपना एक लोकप्रिय नेता खोया, झामुमो ने अपना एक अनुभवी संगठनकर्ता और रणनीतिकार खोया और झारखंड की राजनीति ने एक ऐसा चेहरा खो दिया, जिसने लंबे समय तक पर्दे के पीछे और सामने—दोनों स्तरों पर अपनी भूमिका निभाई।
'सोनू भैया’ की सबसे बड़ी पहचान शायद यही रही कि उन्होंने राजनीति को सिर्फ पद तक सीमित नहीं रखा। कार्यकर्ता के रूप में शुरू हुई उनकी यात्रा ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया, लेकिन उनकी जड़ें आखिरी समय तक गि
गीरिडीह की उसी जमीन से जुड़ी रहीं, जहां से उन्होंने अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था।**