बिहार में लागू शराबबंदी कानून एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। एक ओर जहां सरकार इसे सामाजिक सुधार का बड़ा कदम बताती रही है, वहीं दूसरी ओर अब इसकी समीक्षा की मांग तेज होती जा रही है। कई नेता और सामाजिक कार्यकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह कानून अपने मकसद में सफल हो पाया है या नहीं।
🍶 2016 से लागू है शराबबंदी कानून
बिहार में साल 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने पूर्ण शराबबंदी लागू की थी। इस फैसले का मकसद समाज में शराब से होने वाले दुष्प्रभावों को रोकना और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।
⚠️ शराबबंदी के बावजूद जारी है अवैध कारोबार
शराबबंदी लागू होने के बावजूद:
- राज्य में अवैध शराब की बिक्री जारी है
- सूखे नशे (ड्रग्स) का कारोबार बढ़ा है
- समय-समय पर बड़ी मात्रा में शराब की खेप पकड़ी जाती है
ये तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कानून के बावजूद खपत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
🗣️ नेताओं के बयान से बढ़ी सियासत
उपमुख्यमंत्री के एक बयान के बाद इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया है। उन्होंने कहा कि:
“कानून का उल्लंघन हर जगह होता है, इसका मतलब यह नहीं कि कानून खत्म कर दिया जाए।”
इस बयान पर समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने तीखी प्रतिक्रिया दी।
📚 अमेरिका का उदाहरण देकर उठाए सवाल
शिवानंद तिवारी ने कहा कि:
- 1920 में अमेरिका में भी शराबबंदी लागू हुई थी
- लेकिन 1933 में इसे वापस लेना पड़ा
- अवैध शराब के कारण अपराधी गिरोह मजबूत हो गए थे
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई कानून अपने उद्देश्य में सफल नहीं होता है, तो उसमें बदलाव करना समझदारी होती है, न कि कमजोरी।
💰 राजस्व से शराबबंदी तक का सफर
दिलचस्प बात यह है कि:
- एक समय बिहार में शराब से सरकार को 300 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था
- कुछ वर्षों में यह बढ़कर 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया
आलोचकों का कहना है कि पहले सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए शराब को बढ़ावा दिया, और बाद में अचानक पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी।
👩 महिलाओं के विरोध के बाद बदला फैसला
गांव-गांव में शराब की बढ़ती खपत से सामाजिक हालात बिगड़ने लगे थे। महिलाओं ने इसके खिलाफ बड़ा आंदोलन किया। इसके बाद सरकार ने पहले देसी शराब पर प्रतिबंध लगाया और फिर कुछ ही दिनों में पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी।
❓ क्या फैसला था जल्दबाजी में लिया गया?
आलोचकों का मानना है कि:
- इस फैसले के लिए कोई विशेषज्ञ समिति नहीं बनाई गई
- राजस्व नुकसान की भरपाई पर कोई ठोस योजना नहीं बनी
- निर्णय अचानक और बिना व्यापक अध्ययन के लिया गया
🔍 अब क्या होनी चाहिए अगली रणनीति?
मौजूदा हालात को देखते हुए कई लोग यह मांग कर रहे हैं कि:
- एक स्वतंत्र और निष्पक्ष समिति बनाई जाए
- जमीनी स्तर पर कानून की समीक्षा हो
- रिपोर्ट के आधार पर आगे की नीति तय की जाए