रांची में झारखंड के सबसे बड़े प्रकृति पर्व सरहुल का शुभारंभ आज से हो गया है। राजधानी समेत पूरे राज्य में उत्सव और आस्था का माहौल है। चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वितीया के अवसर पर आज शाम सरना स्थलों पर विशेष पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठान किए जाएंगे।
‘केकड़ा पकड़ाई’ और ‘जल रखाई’ की परंपरा
सरहुल के पहले दिन पारंपरिक रूप से ‘केकड़ा पकड़ाई’ और ‘जल रखाई’ की रस्म निभाई जाती है।
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परिवार का एक सदस्य उपवास रखता है
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शाम को जलाशय से दो नए घड़ों में पानी भरकर सरना स्थल पर रखा जाता है
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इन घड़ों के जल स्तर के आधार पर आने वाले वर्ष की वर्षा और फसल का अनुमान लगाया जाता है
यह परंपरा प्रकृति और जीवन के गहरे संबंध को दर्शाती है।
दुल्हन की तरह सजी राजधानी
सरहुल को लेकर रांची पूरी तरह सज-धज कर तैयार है। शहर के प्रमुख सरना स्थलों और सड़कों को रंग-बिरंगी लाइटों और पारंपरिक सजावट से सजाया गया है।
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सिरमटोली सरना स्थल को विशेष रूप से पारंपरिक पेंटिंग और लोक कला से सजाया गया है
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हातमा कचहरी रोड से लेकर सुजाता चौक तक का इलाका रोशनी से जगमगा रहा है
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अल्बर्ट एक्का चौक पर स्वागत मंच तैयार किए गए हैं, जहां खोड़हा दलों का अभिनंदन होगा
शनिवार को निकलेगी भव्य शोभायात्रा
सरहुल का मुख्य आकर्षण शनिवार को निकलने वाली भव्य शोभायात्रा होगी। राजधानी के करीब 298 सरना स्थलों से श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते शामिल होंगे।
मांदर और ढोल की थाप से पूरा शहर गुंजायमान रहेगा।
‘प्रकृति 2026’ कला शिविर का भी आगाज
इसी मौके पर 20 से 22 मार्च तक ‘प्रकृति 2026’ अखिल भारतीय बसंत कला शिविर का आयोजन भी किया जा रहा है। यह कार्यक्रम वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, झारखंड द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
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थीम: Back to Nature – प्रकृति की ओर लौटें
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स्थान: जाप परिसर स्थित शौर्य सभागार
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देशभर के कलाकार लेंगे भाग
इस कला शिविर का उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है।
लाइव पेंटिंग बनेगी आकर्षण
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण लाइव पेंटिंग होगी, जिसमें कलाकार मौके पर ही चित्र बनाकर प्रकृति संरक्षण का संदेश देंगे।
यह आयोजन वर्ल्ड स्पैरो डे, इंटरनेशनल डे ऑफ फॉरेस्ट्स और वर्ल्ड वाटर डे के अवसर पर किया जा रहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है।
प्रकृति से जुड़ने का संदेश
प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख संजीव कुमार ने कहा कि यह आयोजन कला और पर्यावरण के बीच मजबूत संबंध स्थापित करेगा और लोगों को प्रकृति के करीब लाने में सहायक होगा।
सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आदर, संतुलन और सह-अस्तित्व का संदेश देने वाला पर्व है, जो हर साल लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ता है।