भारतीय सिनेमा के उन कलाकारों में शुमार दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को गोवा स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें तड़के कार्डियक अरेस्ट आया। उन्हें तत्काल मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने की कोशिश की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने निधन की पुष्टि की है।

नाना पाटेकर का जाना सिर्फ बॉलीवुड के लिए नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के उस दौर का अंत है, जिसमें अभिनेता अपनी आवाज, आंखों, संवाद अदायगी और चेहरे के भावों से पूरे किरदार को जीवंत कर देता था। हिंदी और मराठी फिल्मों में अपनी गहरी छाप छोड़ने वाले नाना ने नायक, खलनायक, चरित्र अभिनेता और कॉमेडी—हर तरह की भूमिकाओं में अपनी अलग पहचान बनाई।

मुंबई में जन्म, संघर्षों से निकली अभिनय की राह

नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र में हुआ था। उनका वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था। सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले नाना ने बेहद कम उम्र से ही संघर्ष का सामना किया। यही संघर्ष आगे चलकर उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बना।

उनकी रुचि अभिनय और रंगमंच में थी। उन्होंने थिएटर से अपने अभिनय की शुरुआत की और मंच पर काम करते हुए अभिनय की बारीकियां सीखीं। उस दौर में रंगमंच किसी कलाकार के लिए केवल काम करने की जगह नहीं, बल्कि अभिनय की कठोर पाठशाला माना जाता था। नाना ने इसी पाठशाला में संवाद, भाव, शरीर की भाषा और किरदार में उतरने की कला सीखी।

फिल्मों में उनका प्रवेश 1978 की फिल्म 'गमन' से हुआ। शुरुआत में उन्हें बड़े सितारों जैसी लोकप्रियता नहीं मिली, लेकिन लगातार काम करते हुए उन्होंने अपनी पहचान बनानी शुरू की। शुरुआती दौर में उन्होंने हिंदी के साथ मराठी फिल्मों में भी काम किया।

'सलाम बॉम्बे' और 'परिंदा' ने बदली पहचान

नाना पाटेकर के करियर में बड़ा मोड़ 1980 के दशक के अंत में आया। 1988 में आई मीरा नायर की चर्चित फिल्म 'सलाम बॉम्बे!' में उनके अभिनय ने दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान खींचा। इसके बाद 1989 में आई विधु विनोद चोपड़ा की 'परिंदा' ने उन्हें एक अलग मुकाम पर पहुंचा दिया।

'परिंदा' में उन्होंने अन्ना सेठ का किरदार निभाया था। उनका खलनायक बेहद डरावना होने के साथ-साथ मानवीय जटिलताओं से भरा था। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यहीं से नाना पाटेकर को भारतीय सिनेमा के गंभीर और दमदार अभिनेताओं में गिना जाने लगा।

उनकी खासियत यह थी कि वह संवाद बोलते नहीं थे, बल्कि उसे किरदार की मानसिकता के साथ जीते थे। उनकी आवाज में मौजूद ठहराव और अचानक बदलता स्वर दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ता था।

सेना से जुड़ाव और 'प्रहार' की कहानी

नाना पाटेकर के जीवन का एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष उनका सेना से जुड़ाव भी रहा। बहुत कम लोग जानते हैं कि अभिनय के अलावा उनका भारतीय सेना से भी गहरा जुड़ाव रहा।

फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' की तैयारी के दौरान नाना ने भारतीय सेना के साथ लंबे समय तक प्रशिक्षण लिया। उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ लगभग तीन साल तक सैन्य प्रशिक्षण और जीवन का अनुभव लिया था। इस अनुभव ने उन्हें सैनिकों की जिंदगी और अनुशासन को करीब से समझने का मौका दिया। बाद में उन्होंने इसी अनुभव को अपनी फिल्म 'प्रहार' में इस्तेमाल किया।

1991 में आई 'प्रहार' नाना पाटेकर के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि उन्होंने इसमें अभिनय के साथ निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली। फिल्म में सैनिकों के प्रशिक्षण, अनुशासन और युद्ध की परिस्थितियों को वास्तविक तरीके से दिखाने की कोशिश की गई थी।

कारगिल युद्ध के दौरान सेना के साथ पहुंचे मोर्चे पर

नाना पाटेकर का सेना से जुड़ाव केवल फिल्म तक सीमित नहीं रहा। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वह भारतीय सैनिकों के बीच पहुंचे और अग्रिम क्षेत्र में कुछ समय बिताया।

नाना ने बाद में बताया था कि उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से संपर्क कर कारगिल जाने की अनुमति मांगी थी। शुरुआत में इसकी अनुमति आसान नहीं थी, लेकिन सेना के साथ पहले से प्रशिक्षण और उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें वहां जाने की अनुमति मिली। वह अगस्त 1999 में दो सप्ताह से अधिक समय तक नियंत्रण रेखा के करीब रहे। इस दौरान उन्होंने सैनिकों के साथ समय बिताया और बेस अस्पताल में भी काम किया। उन्होंने क्विक रिस्पॉन्स टीम के साथ रहने का अनुभव भी साझा किया था।

उन्होंने एक बातचीत में बताया था कि जब वह श्रीनगर पहुंचे थे तो उनका वजन करीब 76 किलो था और लौटते समय यह करीब 56 किलो रह गया था। कारगिल का यह अनुभव उनके जीवन के सबसे अलग अध्यायों में शामिल रहा।

'क्रांतिवीर' ने बना दिया राष्ट्रीय स्तर का स्टार

1990 के दशक में नाना पाटेकर का करियर लगातार ऊंचाई पर पहुंचता गया। 'राजू बन गया जेंटलमैन', 'अंगार', 'तिरंगा', 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'खामोशी: द म्यूजिकल' जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए।

1994 की फिल्म 'क्रांतिवीर' उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में उनके अभिनय को दर्शकों ने बेहद पसंद किया और इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान मिला। फिल्म के संवाद और नाना की संवाद अदायगी आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार हिस्सों में गिनी जाती है।

इसके बाद 1996 में 'अग्निसाक्षी' में उनके अभिनय के लिए उन्हें एक और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसी दौर में 'खामोशी: द म्यूजिकल' में भी उन्होंने बेहद प्रभावशाली अभिनय किया।

गंभीर अभिनेता से कॉमेडी के उस्ताद तक

नाना पाटेकर की खासियत यह थी कि उन्हें किसी एक तरह के किरदार में बांधा नहीं जा सका। जिन फिल्मों में उन्होंने गंभीर, हिंसक या भावनात्मक किरदार निभाए, वहीं बाद के दौर में उन्होंने कॉमेडी में भी दर्शकों को खूब हंसाया।

'वेलकम' में उदय शेट्टी का किरदार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अनिल कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने फिल्म को यादगार बना दिया। उदय शेट्टी के किरदार में उनकी संवाद अदायगी, गुस्सा और कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी लोकप्रिय बना दिया।

इसी तरह 'अब तक छप्पन' में पुलिस अधिकारी साधु आगाशे की भूमिका ने उनके अभिनय का एक अलग रूप सामने रखा। इस किरदार में उन्होंने पुलिस व्यवस्था, अपराध और एक अधिकारी की व्यक्तिगत जिंदगी के तनाव को प्रभावशाली ढंग से पेश किया।

मराठी सिनेमा से रिश्ता और 'नटसम्राट'

नाना पाटेकर का रिश्ता मराठी रंगमंच और सिनेमा से भी बेहद गहरा रहा। उन्होंने मराठी फिल्मों में भी कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। 'नटसम्राट' उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल रही।

इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे रंगमंच कलाकार का किरदार निभाया, जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में परिवार, अकेलेपन और अपने अतीत से जूझता है। इस भूमिका में नाना ने उम्रदराज कलाकार की पीड़ा को जिस तरह पर्दे पर उतारा, उसे उनके करियर की यादगार प्रस्तुतियों में माना जाता है।

तीन राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्मश्री

नाना पाटेकर को अपने अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। उन्हें 'परिंदा' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, 'क्रांतिवीर' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और 'अग्निसाक्षी' के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय सम्मान मिला। इसके अलावा उन्हें कई फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले।

भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया। वह अभिनेता होने के साथ-साथ लेखक, निर्देशक और सामाजिक कार्यों से जुड़े व्यक्ति के रूप में भी सक्रिय रहे।

'वनवास' तक जारी रहा अभिनय का सफर

उम्र बढ़ने के बावजूद नाना पाटेकर ने अभिनय से दूरी नहीं बनाई। वह लगातार फिल्मों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आते रहे। उनकी हालिया चर्चित फिल्मों में 'वनवास' शामिल है, जो 2024 में रिलीज हुई थी। इसके अलावा उनके नाम से 2025 और 2026 में भी कई प्रोजेक्ट जुड़े रहे।

उनकी खासियत यह रही कि वह स्टारडम के पीछे भागने के बजाय किरदार को प्राथमिकता देते थे। यही वजह है कि उनके निभाए कई किरदार फिल्मों की कहानी से अलग अपनी स्वतंत्र पहचान बना गए।

एक ऐसी आवाज जो हमेशा याद रहेगी

नाना पाटेकर का अभिनय केवल संवादों तक सीमित नहीं था। उनकी आंखों की कठोरता, चेहरे के भाव, बोलने का अंदाज और अचानक ऊंचा होता स्वर उनके अभिनय की पहचान बन गए थे। वह उन कलाकारों में थे जिन्हें पर्दे पर आते ही पहचान लिया जाता था।

एक तरफ 'परिंदा' का खतरनाक अन्ना, 'क्रांतिवीर' का विद्रोही प्रताप नारायण तिलक, 'अब तक छप्पन' का पुलिस अधिकारी और दूसरी तरफ 'वेलकम' का उदय शेट्टी—इन सभी किरदारों में अभिनेता एक ही था, लेकिन हर चरित्र का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था।

यही नाना पाटेकर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

आज जब वह 75 वर्ष की उम्र में दुनिया से विदा हो गए हैं, तो उनके पीछे फिल्मों की एक लंबी विरासत है। रंगमंच से शुरू हुआ उनका सफर हिंदी और मराठी सिनेमा के बड़े पर्दे तक पहुंचा, सेना के प्रशिक्षण से लेकर कारगिल के मोर्चे तक गया और फिर अभिनय की दुनिया में लौटकर उन्होंने ऐसे किरदार दिए जिन्हें आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी।

नाना पाटेकर का जीवन केवल एक अभिनेता की कहानी नहीं था। यह संघर्ष, अनुशासन, अभिनय, राष्ट्रसेवा से जुड़ाव और अपनी शर्तों पर जीवन जीने वाले एक कलाकार की कहानी थी। भारतीय सिनेमा में उनका नाम उन कलाकारों में हमेशा दर्ज रहेगा, जिन्होंने स्टार बनने से ज्यादा अभिनेता बने रहने को महत्व दिया।