चाईबासा। झारखंड के इतिहास में 8 सितंबर का दिन एक ऐसी दर्दनाक घटना की याद दिलाता है, जिसे आज भी गुवा गोलीकांड के नाम से जाना जाता है। 8 सितंबर 1980 को तत्कालीन अविभाजित बिहार और वर्तमान झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के गुवा में पुलिस और आदिवासी आंदोलनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद अस्पताल परिसर में हुई गोलीबारी ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। इस घटना में कई आदिवासी आंदोलनकारी मारे गए और गुवा गोलीकांड झारखंड अलग राज्य आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बन गया।

जल, जंगल और जमीन के अधिकार को लेकर चल रहा था आंदोलन

1970 और 1980 के दशक में छोटानागपुर और कोल्हान क्षेत्र में आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों, जल-जंगल-जमीन की रक्षा, वन विभाग से जुड़े मुद्दों और स्थानीय स्तर पर शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहा था। झारखंड अलग राज्य की मांग भी इसी दौर में लगातार मजबूत हो रही थी।

गुवा क्षेत्र में वन विभाग की कार्रवाई, खनन गतिविधियों से जुड़े स्थानीय मुद्दे और रोजगार समेत कई सवालों को लेकर आदिवासी समुदाय में नाराजगी थी। 8 सितंबर 1980 को इन्हीं मांगों को लेकर बड़ी संख्या में आंदोलनकारी गुवा में जुटे थे।

गुवा में जुटी थी हजारों की भीड़

8 सितंबर को गुवा हवाई पट्टी के आसपास बड़ी संख्या में आदिवासी आंदोलनकारी एकत्र हुए। आंदोलन से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में सभा और प्रदर्शन की तैयारी थी। इसी दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तनाव बढ़ गया।

विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, पुलिस ने आंदोलन से जुड़े नेताओं को गिरफ्तार करने की कोशिश की, जिसके बाद स्थिति बिगड़ गई। पुलिस की ओर से आंसू गैस और गोलीबारी की कार्रवाई हुई, जबकि आंदोलनकारियों की ओर से तीर-धनुष समेत पारंपरिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया। इस झड़प में दोनों पक्षों के लोग मारे गए और कई घायल हुए।

घायल आंदोलनकारी पहुंचे गुवा अस्पताल

झड़प के बाद घायल आदिवासियों को इलाज के लिए गुवा अस्पताल ले जाया गया। यहीं से इस घटना का सबसे भयावह अध्याय शुरू हुआ।

विभिन्न ऐतिहासिक और समाचार स्रोतों के अनुसार, बिहार मिलिट्री पुलिस के जवान अस्पताल परिसर में पहुंचे और वहां इलाज करा रहे घायल आंदोलनकारियों को बाहर निकालकर गोली मार दी। कई रिपोर्टों में बताया गया है कि आठ घायल आदिवासियों को अस्पताल से बाहर निकालकर गोली मारी गई। गुवा गोलीकांड में कुल 11 आदिवासियों के शहीद होने का उल्लेख झारखंड में होने वाले शहादत कार्यक्रमों और स्थानीय स्मृति में मिलता है।

अस्पताल परिसर में हुई इस कार्रवाई को मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के रूप में देखा गया। इस घटना ने पूरे कोल्हान और छोटानागपुर क्षेत्र में आक्रोश पैदा कर दिया।

झारखंड आंदोलन को मिली नई धार

गुवा गोलीकांड के बाद झारखंड अलग राज्य की मांग को एक नई ताकत मिली। यह घटना आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है। गुवा की घटना ने आदिवासी अधिकारों, जल-जंगल-जमीन और अलग राज्य की मांग को व्यापक स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला दिया।

समय के साथ झारखंड आंदोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे और आखिरकार 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड देश का 28वां राज्य बना।

हर साल 8 सितंबर को शहीदों को किया जाता है नमन

गुवा गोलीकांड की याद में हर साल 8 सितंबर को गुवा में शहादत दिवस मनाया जाता है। इस दिन गोलीकांड में जान गंवाने वाले आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि दी जाती है और उनके संघर्ष को याद किया जाता है। झारखंड सरकार की ओर से भी गुवा गोलीकांड के शहीदों की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं।

गुवा की शहादत झारखंड के इतिहास का वह अध्याय है, जिसने आदिवासी अधिकारों और अलग राज्य की मांग के संघर्ष को एक नई दिशा दी। 8 सितंबर 1980 की घटना आज भी झारखंड के सामूहिक स्मृति में संघर्ष, शहादत और अधिकारों की लड़ाई के प्रतीक के रूप में दर्ज है।