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World Food Day: आज 7 अरब को खिलाने के लिए नहीं है अनाज, 9 अरब का कैसे भरेंगे पेट?

World Food Day

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

संकल्प
अनाज का एक दाना आसानी से नहीं मिलता है। हमें दृढ़ता के साथ बर्बादी का विरोध करना चाहिए और हर अनाज को बचाना चाहिए। हर अनाज को मूल्यवान समझना अपने भविष्य के लिए जिम्मेदार है। 41वें विश्व खाद्य दिवस के आगमन के मौके पर आइए, हम एक साथ बर्बादी को रोकें।

आज यानी शनिवार को विश्व के लोगों तक भोजन की पहुंच बनाने की जागरूकता फैलाने के लिए ‘विश्व खाद्य दिवस’ (World Food Day)  मनाया जा रहा है। बीते गुरुवार को ग्लोबल हंगर इंडेक्स (Global Hunger Index) ने भुखमरी की वैश्विक स्थिति पर रिपोर्ट पेश की थी। दूसरे दिन यानी बीते शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जनसंख्या के असंतुलन पर चिंता व्यक्त थी। देखा जाये तो तीनों बातें एक दूसरे से जुड़ी हैं। इनके मूल में जनसंख्या है। प्रकृति यदा-कदा अपना रौद्र रूप दिखाकर जनसंख्या कम कर दे तो कर दे, इनसान में तो यह इच्छाशक्ति ही नहीं है कि वह अपने और अपने आने वाली पीढ़ियों के भले के बारे में सोच सके।

खैर, पहले तो ‘विश्व खाद्य दिवस’ (World Food Day) की अनिवार्यता पर चिंता करना आवश्यक है। पिछले 41 वर्षों से विश्व में लोगों तक भोजन की पहुंच में आकाश और पाताल की आयी असमानता पाटने का हर वर्ष निरर्थक प्रयास किया जाता है। 1980 से प्रत्येक वर्ष 16 अक्टूबर को ‘विश्व खाद्य दिवस’ (World Food Day) के नाम पर यह प्रयास किया जा रहा है। कहने को तो विश्व में लोगों को खाद्यान्न की महत्ता समझाने और उसकी बर्बादी रोकने के लिए प्रेरित करने के लिए यह दिवस मनाया जाता है, लेकिन होता कुछ नहीं है।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व की समस्या है खाद्यान्न

खाद्यान्न की आपूर्ति की जब बात आती है तब सबसे पहले भारत की समस्या ही सामने आ जाती है। यह सही है कि भारत में खाद्यान्न और लोगों तक इसकी पहुंच की समस्या विकट है, लेकिन अकेला भारत ही इससे नहीं जूझ रहा है। विश्व के विकासशील देशों के साथ विकसित देश भी इस समस्या से जूझ रहे हैं। इस समस्या की जड़ में कई कारण है, लेकिन पूरी दुनिया में सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती महंगाई लोगों के मुंह का निवाला छीनते का काम कर रही है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन’ के अनुसार खाद्यान्न की लोगों तक पहुंच का संकट 2002 के बाद से ज्यादा बढ़ा है। क्योंकि यहां से खाद्यान्नों की कीमतों में भारी-भरकम वृद्धि शुरू हुई है। महंगाई का ही असर है कि 2007 से 40 देशों को खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ रहा है।

विकसित हों या विकासशील खाद्यान्न की समस्या से सब बेहाल

विश्व खाद्य दिवस (World Food Day) मनाते हुए दुनिया को 41 साल हो गये हैं। फिर भी समस्या है कि खत्म होती भी नहीं। खत्म हो भी तो कैसे, विश्व खाद्य दिवस मनाने के संकल्प से ज्यादा विश्व की जनसंख्या बढ़ाने का संकल्प हमने ले रखा है। मानों विश्व की जनसंख्या बढ़ जायेगी तो सारी समस्या का समाधान हो जायेगा। ज्यादा बच्चे पैदा कर्म करते उन्हें भूखे सोने का अधर्म तो हम कर ही रहे हैं। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भुखमरी से जूझ रहे हैं। इस मामले में विकासशील या विकसित देशों में किसी तरह का कोई फर्क नहीं है। विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी लोग विकासशील देशों में रहेंगे। जब आज सात अरब की आबादी का पेट ठीक से नहीं भर पा रहा है तब जब 2050 में विश्व की आबादी 9 अरब हो जायेगी तब सबके लिए किस तरह खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की पायेगी, यह एक बड़ा प्रश्न है।

दुनिया भर में 72 से 81 करोड़ लोग भूख

संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा जारी 2021 विश्व खाद्य सुरक्षा और पोषण स्थिति की रिपोर्ट से पता चलता है कि 2020 में, दुनिया भर में 72 से 81 करोड़ लोग भूख का सामना कर रहे थे। 2019 की तुलना में 16.1 करोड़ की वृद्धि है। 2020 में, लगभग 2.37 अरब लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता। और केवल एक ही वर्ष में 32 करोड़ की वृद्धि हुई। दुनिया का कोई भी क्षेत्र इससे बच नहीं सकता। यह रिपोर्ट कोविड-19 महामारी के प्रकोप के बाद जारी की गई इस तरह की पहली वैश्विक मूल्यांकन रिपोर्ट है। भूख हमसे दूर नहीं है!

चोंचलों के नाम पर फसलों और खाद्यान्न की बर्बादी

‘गार्जियन’ में छपी विश्व बैंक की एक गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार अमीर देशों द्वारा जैव ईंधन के इस्तेमाल से खाद्य के दामों में 75 फीसदी की वृद्धि हुई है। मक्का से एथेनोल बनाने वाले अमेरिका ने पिछले तीन साल के दौरान दुनिया के कुल मक्का उत्पादन का 75 प्रतिशत हिस्सा हड़प कर लिया। कनाडा में कीमत कम होने की वजह से 1,50,000 सूअरों को मारने पर 5 करोड़ डॉलर खर्च किए गए। भारत की सरकारी व्यवस्था भी पीछे नहीं है। ‘भारतीय खाद्य निगम’ ने माना है कि उसके गोदामों में हर साल 50 करोड़ रुपये का 10.40 लाख मीट्रिक तन अनाज ख़राब हो जाता है। यह अनाज हर साल सवा करोड़ लोगों की भूख मिटा सकता है! दुनिया में खाने-पीने की कमी नहीं, बल्कि उनके सही बँटवारे की कमी है।

भारत में खाद्यान्न की समस्या

खाद्यान्न की कमी ने विश्व के सर्वोच्च संगठनों और सरकारों को भी सोचने पर विवश कर दिया है। भारत में हाल ही में “खाद्य सुरक्षा बिल” लाया गया है, लेकिन इस बिल का पास होना या ना होना इसकी सफलता नहीं है। सब जानते हैं कि भारत में खाद्यान्न की कमी कोई ख़ास मुद्दा नहीं है, बल्कि सार्वजनिक आपूर्ति प्रणाली और खाद्यान्न भंडारण की समस्या असली समस्या है। भारत में लाखों टन अनाज खुले में सड़ रहा है। यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब करोड़ों लोगों को भूखे पेट सोना पड़ रहा है। अर्जुन सेन गुप्ता कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 77 प्रतिशत फीसदी लोग 20 रुपये रोजाना से कम में अपना गुजारा करते हैं। सोचा जा सकता है कि 15 रुपये किलो आटा और 18 रुपये किलो चावल भी इस तबके के लिए काफी महंगा है।

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