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World Nature Day: जल, जंगल, जमीन बचेगी तभी बचेंगे हम

World Nature Day: Water, forest, land will be saved only then we will be saved

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस  – झारखंड-बिहार

आज 3 अक्टूबर विश्व प्रकृति दिवस है। यह कैसा संयोग है कि इस समय नवरात्रि चल रही है, नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना की जाती है। मां दुर्गा साक्षात प्रकृति का स्वरूप हैं अर्थात नवरात्रि में आराधना का मतलब प्रकृति की पूजा है। प्रकृति और प्राणी एक दूसरे से जुड़े हैं। इसलिए प्रकृति से जुड़ा कोई भी दिवस मात्र किसी एक दिन मनाने का विषय नहीं है, यह हर दिन का विषय है। प्रकृति जल, जंगल और जमीन से जुड़ा विषय है। प्रकृति के विषय में सकारात्मक सोच रखना ही जल, जंगल और जमीन की सही चिंता है। पर्यावरण अर्थात वनस्पतियों, प्राणियों और मानव जाति सहित सभी सजीवों और उनके साथ संबंधित भौतिक परिसर को पर्यावरण कहते हैं। वास्तव में पर्यावरण में वायु, जल, भूमि, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, मानव और उसकी विविध गतिविधियों के परिणाम आदि सभी का समावेश हैं।

मनुष्य की नादानियों से प्रकृति का दिनोदिन विनाश हो रहा है। कई प्रजातियां, जंतु-जंतु एवं वनस्पतियां लगातार विलुप्त हो रहे हैं, यह मनुष्य के लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। जीव-जंतुओं के साथ वनस्पतियों की रक्षा करने का स्मरण दिलाने के साथ प्रकृति संरक्षण का संकल्प लेने के लिए ही हर वर्ष विश्व प्रकृति दिवस मनाया जाता है। विश्व में सबसे समृद्ध देश वही हुए हैं, जो प्राकृतिक रूप से सम्पन्न हैं। वैसे भारत को प्रकृति का उपहार दिल खोलकर मिला है। मगर जंगल, वन्य जीवों से परिपूर्ण रहने के बावजूद अपनी आबादी लगातार बढ़ाकर देश प्राकृतिक संसाधनों को लगातार खत्म किये जा रहा है। मनुष्य अपनी संतानों को, अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए धन-सम्पदा जोड़ना चाहता है, लेकिन उसके लिए प्राकृतिक सम्पदा छोड़ने में वह पिछड़ गया है। जबकि हम जानते हैं कि मानव, प्रकृति और वन्य जीवों का पारस्परिक संबंध है। यदि जल, जंगल, जमीन के साथ वन्य जीव भूमंडल पर न रहें, तो पर्यावरण पर तथा मनुष्य के सम्पूर्ण विकास पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।

विकास या विनाश

मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है कि विज्ञान के क्षेत्र में असीमित प्रगति तो उसने कर ली, लेकिन यह उसके लिए वरदान से ज्यादा अभिशाप बन गयी है। इस कारण प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। वैज्ञानिक उपलब्धियों से मानव प्राकृतिक संतुलन की लगातार उपेक्षा किये जा रहा है। जनसंख्या की निरंतर वृद्धि, औद्योगीकरण एवं शहरीकरण की तीव्र गति के लिए प्रकृति के दोहन से हरेभरे क्षेत्र समाप्त होते जा रहे हैं।

जरूरी है सकारात्मक पहल

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए तो कई प्रयास किये गये हैं। यह पहल लगातार जारी भी है, लेकिन ये ऊपरी स्तर पर ही नहीं सतही स्तर पर इस पर अमल नहीं होने की वजह से यह प्रयास बेमानी बनता जा रहा है। 1992 में ब्राजील में विश्व के 174 देशों का ‘पृथ्वी सम्मेलन’ आयोजित किया गया। इसके पश्चात सन् 2002 में जोहान्सबर्ग में पृथ्वी सम्मेलन आयोजित कर विश्व के सभी देशों को पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देने के लिए अनेक उपाय सुझाए गये। इन सम्मेलनों में दुनिया को सचेत किया गया कि किन-किन कारणों से प्रकृति का विनाश हो रहा है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तो जिम्मेदार कारक है ही, आणविक विस्फोटों से रेडियोधर्मिता का आनुवांशिक प्रभाव, वायुमण्डल का तापमान बढ़ना, ओजोन परत की हानि, भू-क्षरण के भी घातक दुष्प्रभाव हैं। बड़े कारखानों से विषैला अपशिष्ट बाहर निकलने से तथा प्लास्टिक आदि के कचरे से प्रदूषण की मात्रा उत्तरोत्तर बढ़ रही है।

प्रकृति संरक्षण तो मनुष्य के हाथ में है

अगर मनुष्य चाह ले तो प्रकृति में ह्रास को वह रोक सकता है। कोराना काल में दुनिया ने इसका साक्षात्कार भी कर लिया है। लॉकडाउन के दौरान जब सड़कों से मोटर गाड़ियों गायब हो गयीं, तुनिया भर की फैक्टरियों ने धुआं उगलना बंद कर दिया, लोग सारी गतिविधियां बंद कर घरों में दुबक गये, ऐसे में थोड़े ही समय के लिए सही अपना स्वरूप बदल लिया था। मगर दुर्भाग्य है कि इस बात का अनुभव करने के बाद भी मनुष्य नहीं सुधरा। उसकी गतिविधियां पहले की तरह ही फिर से जारी हो गयीं।

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