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World Mother Language Day: …ताकि पैदा न हो भाषा विवाद, झारखंड में भाषा विकास से ज्यादा विवाद का प्रसार

Controversy spread in Jharkhand than language development

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

हर वर्ष भारत ही नहीं, पूरे विश्व में अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देना। वैसे तो 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को ने इस दिवस को स्वीकृति दी थी, लेकिन इस घोषणा से काफी पहले ही बांग्लादेश में ‘भाषा आन्दोलन दिवस’ मनाया जाता रहा है। इसी को ही अन्तरराष्ट्रीय मान्यता दी गयी है। बांग्लादेश में भाषा आन्दोलन दिवस 1952 से ही मनाया जाता रहा है। बांग्लादेश में आज के दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है।

हर भाषा का अपना एक, भूगोल होता है। संविधान भी जगह के हिसाब से भाषा  को सम्मान देता है। फिर भी भाषा को लेकर विवाद है। भारत का हर राज्य अपने राज्य की भाषा का सम्मान करता है, लेकिन झारखंड में असमंजस की स्थिति है। जिस प्रकार भारत विविध संस्कृतियों का देश है, झारखंड भी अपने आप में एक छोटा भारत है। चूंकि यहां विविध जनजातियों के साथ अन्य लोग भी निवास करते हैं, इसलिए यहां अनेक भाषाएं बोली जाती हैं। सरकारी कामकाज की राजभाषा हिंदी है, लेकिन दूसरे राज्यों की तरह भाषा विवाद यहां भी यदा-कदा उठता रहा है। लेकिन इस समय यह मुद्दा विशेष रूप से उठ (उठाया) गया है। इस राज्य का दुर्भाग्य यह भी है यहां सरकार बदलने पर भी दूसरी नीतियों की तरह भाषा नीति भी बदल जाती है। जो झारखंड की गति पर ब्रेक लगाये हुए है।

राज्य एक, बोलियां अनेक

झारखंड जनजातीय विविधता वाला राज्य है। इसलिए यहां की जनजाति एवं क्षेत्रीय भाषाओं में अत्यधिक विविधता है। झारखंड में लगभग 26 जनजातियां हैं और इनकी अपनी भाषाएं भी  हैं। इसके बावजूद करीब 27 फीसदी जनजातियों की दूसरी जनजाति से संपर्क भाषा हिन्दी, बांग्ला एवं नागपुरी है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे राज्य के शिक्षा संस्थानों में अपने ही राज्य की समस्त भाषाओं की पढ़ाई नहीं होती है।

झारखंड में तीन भाषा परिवारों की भाषाएं बोली जाती हैं। यूरोपीय भाषा परिवार, द्रविड़ भाषा परिवार एवं आस्ट्रिक भाषा परिवार। जानकारी के अनुसार, इन तीन परिवारों की लगभग 25 भाषाएं एवं उपभाषाएं बोलचाल में हैं।

  • आस्ट्रिक परिवार की भाषाएं – संताली, मुंडारी, हो, खड़िया, खेखार, सावरा, खोड़।
  • द्रविड़ परिवार की भाषाएं – कुड़ुख, कोरबा और माल्तो।
  • यूरापीय परिवार – नागपुरी, खोरठ, पंच परगनिया, कुरमाली, अंगिका, भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला, उड़िया, मगही, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत एवं अंग्रेजी।
2000 में जारी आंकड़े बताते हैं झारखंड की भाषा की क्या है स्थिति
  • संताली – 20,75000
  • करमाली – 1,82000
  • कोरा – 2,500
  • महीसी – 8,600
  • कोल – 3,300
  • मुंडारी – 6,67,645
  • खड़िया – 1,10000
  • हो – 6,50000
  • भूमिज – 9,000
  • मुंडारी – 13,000
  • माल्टो – 1,03,500
  • कुरुख – 6,50000
  • कोरबा – 1000
झारखंड में भाषा विवाद कुर्सी की खातिर

किसी भी प्रदेश में वहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलना संविधान सम्मत है। लेकिन अब इस पर राजनीति होने लगी है। इसका सीधा मकसद जातीय ध्रुवीकरण कराकर बुनियादी सवालों से दूर भागना है। वर्तमान में झारखंड में भाषा को जो विवाद चल रहा है, यह ऐसा विवाद है जिसकी आग में हर पार्टी झुलस रही है। ऐसा नहीं है कि हेमंत सोरेन में राज्य में भाषा का नया राग अलापा तो झामुमो के सारे नेता उससे पूरी तरह से सहमत हैं। चूंकि उनके नेताओं का भी अपना जातीय आधार है, इसलिए झामुमो के कई विधायक ऐसा नहीं होने देना चाहते जो हो रहा है। वहीं, इस भाषा विवाद में प्रमुख विरोधी भाजपा के नेता भी इस भाषा प्रकरण से सहमत और असहमत हैं। यही हाल कांग्रेस का भी है। जाहिर है सबका अपना-अपना स्वार्थ है। कोई भी अपने मतदाताओं को नाराज करने का रिस्क नहीं लेना चाहता।

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