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भारत पर इतना बढ़ा विश्व बैंक का कर्ज, तेजी से बढ़ रही है बेरोजगारी

न्यूज़ डेस्क/ समाचार प्लस -झारखंड -बिहार

मोदी सरकार में भारत पर कर्ज का बोझ दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. अब तो कर्ज इतना बढ़ गया है कि भारत का प्रति व्यक्ति लगभग 70000 रुपये की कर्जदारी हो गई है.लेकिन मोदी सरकार फिर से कर्ज लिए जा रही है. विश्व बैंक ने भारत सरकार की MSME सेक्टर की मदद के लिए पहल को समर्थन देने वाले 500 मिलियन डॉलर के कार्यक्रम को मंजूरी दे दी. सरकार ने 30 मई को अपनी 3 लाख करोड़ रुपये की इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) को तीन महीने बढ़ाने का एलान किया था. इस स्कीम को 30 जून 2021 से बढ़ाकर 30 सितंबर 2021 कर दिया गया था या जब तक 3 लाख करोड़ रुपये की राशि जारी होती है.

वाणिज्यिक ऋण बढ़ने से देश पर बाहरी कर्ज बढ़ा है

यह पहली बार नहीं है कि वर्ल्ड बैंक ने मदद का हाथ बढ़ाया है. इससे पहले जुलाई 2020 में भी 750 मिलियन डॉलर की वित्तीय मदद की थी. अगर बात करें कि भारत के ऊपर कितना कर्ज है तो मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में भारत का विदेशी कर्ज मुद्रा मूल्यांकन प्रभाव और वाणिज्यिक उधारी NRI के डिपॉजिट्स के कारण बढ़ा कर 558.5 अरब डॉलर रहा. देश का कुल बाहरी कर्ज मार्च 2020 के अंत तक 2.8 प्रतिशत से बढ़कर 558.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया. वित्त मंत्रालय के मुताबिक वाणिज्यिक ऋण बढ़ने से देश पर बाहरी कर्ज बढ़ा है.

सरकार बजट से बाहर भी लेती है उधार 

इसके अलावा कुछ उधार ऐसा होता है जिसे ऑफ बजट कहते हैं, ये सीधे केंद्र सरकार नहीं लेती, इसलिए इसका असर राजकोषीय घाटे में नहीं दिखाया जाता. इसकी बजट में चर्चा नहीं होती. ये कुछ सार्वजनिक कंपनियों, सरकारी संस्थाओं के लोन या डेफर्ड पेमेंट के रूप में होते हैं. ऐसा माना जाता है कि ये लोन संस्थान सरकार के निर्देश पर ही लेते हैं, लेकिन इसे चुकाने की जवाबदेही सरकार पर नहीं होती इसलिए इसे बजट में शामिल नहीं किया जाता.

उदाहरण के लिए इस साल सरकार ने राशन बांटने में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडि‍या का जो सब्सिडी बिल है उसका आधा ही आवंटित किया है, बाकी पैसा उसे नेशनल स्मॉल सेविंग फंड्स से उधार लेने को कहा गया है. इसी तरह फर्टिलाइजर सब्सिडी के लिए कुछ हिस्सा सरकारी बैंकों से लोन के रूप में दिलाया गया.

चरम पर बेरोज़गारी

भारतीय अर्थव्यवस्था, आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश करने के बाद भी पूरी तरह चरमरायी हुई ही है. भले ही हमारी सरकार लोगों के जीवन स्तर को सुधारने और उन्हें उपयुक्त रोजगार मुहैया कराने का दम भरती हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है. 2011-12 से भारत की सबसे बड़ी चुनौती निवेश में मंदी रही थी. लेकिन सत्ता बदलने के बाद 2016 से देश ने कई आर्थिक झटके झेले हैं. नोटबंदी, जीएसटी और रुक-रुककर लगाए गए लॉकडाउन ने रोज़गार को कम कर दिया.

अंतिम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 में बेरोज़गारी बीते 45 सालों में सबसे अधिक यानी 6.1% पर थी. CMIE के हाउसहोल्ड सर्वे के अनुसार यह दर तब से अब तक लगभग दोगुनी हो चुकी है. प्यू रिसर्च के अनुसार, 2021 की शुरुआत से अब तक 2.5 करोड़ से अधिक लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं और 7.5 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा पर पहुंच चुके हैं, जिनमें 10 करोड़ मध्यम वर्ग का एक तिहाई शामिल है. हर साल देश की अर्थव्यवस्था को 2 करोड़ नौकरियां चाहिए, लेकिन भारत में बीते दशक में हर साल केवल 43 लाख नौकरियां ही पैदा हुईं.

लॉकडाउन का असर अब रोजगार पर पड़ रहा

देश में कोरोना केस और कई राज्‍यों में लॉकडाउन का असर अब रोजगार पर पड़ रहा है. भारत के साथ ही कई राज्‍यों में बेरोजगारी दर लगातार बढ़ती जा रही है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी के जारी आंकड़े जारी आंकड़े के अनुसार मई (2021) के महीने में भारत की बेरोजगारी दर 11.90 फीसदी रही . सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत के बजाय शहरी क्षेत्रों में ज्‍यादा बेरोजगारी पनपी है. मई में जहां शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी दर 14.9 फीसदी है. वहीं ग्रामीण क्षेत्र में यह 10.6 फीसदी है.

कई राज्यों में लॉकडाउन की वजह से हालात सामान्य नहीं हो सके हैं

कोरोना महामारी के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ा है. इस महामारी की वजह से लोग बेरोजगार हो रहे हैं. हालांकि, कोरोना वैक्सीन की सहायता से इस महामारी पर काबू पाने की कोशिश लगातार जारी है. विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना की वजह से काफी चीजों पर असर पड़ा है. कई राज्यों में लॉकडाउन की वजह से हालात सामान्य नहीं हो सके हैं.

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