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World AIDS Day 2021: 40 सालों के बाद भी क्यों नहीं बन पायी AIDS की vaccine ?

World AIDS Day 2021

World AIDS Day 2021: लगभग 40 सालों से पूरी दुनिया 1 दिसंबर को विश्व AIDS दिवस के रूप में मना रही है, इसकी रोकथाम को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाया जाता रहा है और काफी हद तक इसे कंट्रोल भी किया जा चूका है, लेकिन आज तक वैज्ञानिक इसकी Vaccine इजात नहीं कर पाए हैं, इसके प्रभाव को कम करने के लिए Antiretroviral Therapy और दवाओं का इस्तेमाल तो किया जाता है. लेकिन इस संक्रमण की चपेट में आने के बाद इसे जड़ से ख़त्म करने वाली दवा किसी के पास नहीं है.

जानकारी के लिए बता दें कि 1980 में पहली बार इस बीमारी का पता लगा था, जिसके बाद 1984 में अमेरिका के Health and Human Service विभाग ने कहा भी था कि वे दो साल के भीतर इसकी वैक्सीन (AIDS Vaccine) तैयार कर लेंगे. लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी असफलता ही हाथ लगी. इसकी तुलना में अगर उदाहरण के तौर पर Covid-19 के Vaccine की बात करें तो दुनिया भर में इस महामारी के फैलने के कुछ महीनों के बाद ही इसकी वैक्सीन इजात कर ली गयी. ऐसे में ये जानना ज़रूरी हो जाता है कि इतने सालों के बाद भी AIDS की वैक्सीन बनाने में वैज्ञानिक क्यों असफल रहे हैं. आखिर इसका कारण क्या है? आइए जानते हैं.

दो मायनों में इस असफलता को अब तक देखा जाता रहा है, पहला वैज्ञानिक कारण दूसरा राजनितिक इच्छा शक्ति.

पहले वैज्ञानिक कारणों को जानते है –

1. HIV में Immune का रिस्पॉन्स- वैक्सीन डेवलपर कहते हैं कि इंसान के शरीर में रोगों से लड़ने वाला Immune System HIV (Human Immunodeficiency Virus) वायरस के खिलाफ प्रतिक्रिया नहीं देता है. रोगी के शरीर में इम्यून एंटीबॉडी प्रोड्यूस तो करता है, लेकिन वो सिर्फ रोग की गति को धीमा करती है, उसे रोक नहीं पाती.

2. इम्यून का खराब रिएक्शन- एचआईवी के संपर्क में आने के बाद मरीज की रिकवरी होना लगभग असंभव है. HIV पर इम्यून का कोई रिएक्शन न दिखने की वजह से वैज्ञानिक वैक्सीन नहीं बना सकते जो शरीर में एंटीबॉडी के प्रोड्यूस होने की नकल कर सके.

3. DNA में छिपा वायरस- शरीर में एचआईवी संक्रमण फैलने की एक लंबी अवधि होती है. इस दौरान वायरस इंसान के डीएनए में छिपकर रहता है. शरीर के लिए डीएनए में छिपे वायरस को खोजकर उसे नष्ट करना मुश्किल काम है. वैक्सीन के मामले में भी ऐसा ही होता है.

antiretroviral therapy
antiretroviral therapy

4. नष्ट हो चुके वायरस- वैक्सीन बनाने में ज्यादातर कमजोर या नष्ट हो चुके वायरस का ही इस्तेमाल होता है, लेकिन एचआईवी के मामले में नष्ट हो चुका वायरस शरीर में इम्यून को सही ढंग से रिस्पॉन्स नहीं कर पाता है. इस वायरस के किसी भी जीवित रूप का इस्तेमाल भी बेहद खतरनाक है.

5. वायरस का नेचर- ज्यादातर वैक्सीन ऐसे वायरस से इंसान की सुरक्षा करती है जो रेस्पिरेटरी और गैस्ट्रो-इंटसटाइनल सिस्टम से दाखिल होते हैं. जबकि एचआईवी का संक्रमण जननांग या खून के जरिए शरीर में फैलता है.

6. जानवरों का मॉडल- जानवरों पर टेस्ट करने के बाद ही किसी वैक्सीन को इंसान के लिए तैयार किया जाता है. लेकिन दुर्भाग्यवश एचआईवी के लिए जानवरों का एक भी ऐसा मॉडल नहीं है जिसकी तर्ज पर इंसानों के लिए एड्स की वैक्सीन तैयार की जा सके

7. रूप बदलने वाला HIV- एचआईवी वायरस बड़ी तेजी से रूप बदलता है. जबकि वैक्सीन वायरस के एक विशेष रूप को ही टारगेट बना सकती है. वायरस के रूप बदलते ही उस पर वैक्सीन का असर काम करना बंद कर देता है. ये सभी वजह हैं जिनके कारण आज तक एचआईवी की वैक्सीन तैयार नहीं की जा सकी है.

अब आखिर में राजनीति इसमें क्या किरदार निभा रही है:

एचआईवी के विज्ञान को समझना जटिल तो था ही लेकिन कोविड-19 वैक्सीन के विकास पर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण भारी निवेश को देखकर ये लगता है कि एड्स के टिके के मामले में गायब ही रहा है।मौजूदा समय में भी एड्स के टीके के अनुसंधान के लिए भार निवेश नहीं आ रहा है।
फ्रांसीसी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मेडिकल रिसर्च के एक शोध निदेशक निकोलस मैनल का कहना है कि फार्मास्युटिकल समूहों के लिए बाजार बहुत कमजोर है और निवेश की भारी कमी है। कई शोधकर्ता टीके के निर्माण को लेकर बहुत प्रेरित होते हैं, लेकिन उन्हें निवेश की कमी का सामना करना पड़ता है।

World AIDS Day 2021

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