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अपने फायदे-नुकसान की किसानों को चिंता, देश को हुए हजारों करोड़ की भरपाई करेगा कौन?

अपने फायदे-नुकसान की किसानों को चिंता हजारों करोड़ की भरपाई करेगा कौन?

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

कृषि कानूनों के विरोध में ‘भारत बंद’ होना था, हो गया। हालांकि इस बंद का असर पूरे देश में नहीं था। इसका सर्वाधिक असर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमा पर ही रहा। और यहीं के लोग ज्यादा परेशान भी रहे। देश के दूसरे हिस्सों से बंद की छिटपुट खबरें आयीं। कुछ जगह ट्रेनों को रोका गया, कुछ जगह यातायात बाधित किया गया, कुछ जगह शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया गया तो कुछ जगह हुड़दंगियों ने तोड़फोड़ का प्रयास किया।

आजाद भारत में अपनी बात कहने की आजादी सबको है। लेकिन सवाल उठता है कि अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की आजादी छीनने का हक किसी को भी क्यों है? कहा जाता है कि आपकी आजादी वहीं तक है, जहां तक आपकी नाक है। उसके बाद दूसरों की आजादी शुरू हो जाती है। इस लिहाज से आज पूरे देश में जो भी हुआ उसे दूसरों की आजादी छीनने का प्रयास कहा जायेगा।

अभी सवाल यह नहीं है कि 10 महीनों से कृषि कानूनों के विरोध में पूरे देश में सिर्फ एक ही जगह पर किसान आन्दोलन क्यों कर रहे हैं। सवाल यह है कि किसानों को अपने लाभ-हानि की चिंता तो है, लेकिन देश की चिंता हरगिज नहीं। कहा जाता है जब भी ‘भारत बंद’ होता है तो देश को 30 हजार करोड़ का नुकसान होता है। यातायात बाधित होने से, ट्रेनों को रोके जाने से जो परेशानियां लोगों को होती हैं, वह अलग। देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो रोज कमाते और रोज खाते हैं। ऐसे लोगों के उस दिन की कमाई मारी जाती है। और उन्हें हुए इस घाटे की कोई भरपाई नहीं होती। क्या आन्दोलनकारियों को इन लोगों को हुए नुकसान की भरपाई नहीं करनी चाहिए?

भारत बंद से पहले ही देश के सभी व्यापारियों और व्यापारिक संगठनों ने यह बंद न करने की अपील की थी। उनका कहना था कि देश पहले ही कोरोना की वजह काफी नुकसान उठा चुका है, अब प्रदर्शनकारी व्यापारियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

लेकिन हजार बात की एक बात है, किसी भी मुद्दे को लेकर किये जाने वाले आन्दोलकारियों को ये सारी बातें समझ क्यों नहीं आतीं? किसी मुद्दे पर विरोध है तो विरोध का तरीका होना चाहिए। सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध उचित नहीं है। 10 महीनों से दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा पर हो रहा आन्दोलन भी सही नहीं है। यह आन्दोलन कौन लोग कर रहे हैं, इस मुद्दे पर नहीं जाना चाहता। लेकिन सवाल तो किया जा सकता है कि किसान सिर्फ हरियाणा, पंजाब और दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश में ही आन्दोलन क्यों कर रहे  हैं? अगर वाकई कृषि कानून गलत हैं तो फिर पूरे देश में आन्दोलन क्यों नहीं चल रहे हैं? आज तो हद हो गयी, कई लोगों को यह कहते सुना गया कि यह ‘काला कानून’ है। लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि आखिर काला क्या है और इसका मतलब क्या होता है?

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