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जहां हिन्दू कम है वहां मिलेगा उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा, जानिए SC में केंद्र ने क्‍या दलील दी

Hindus will get minority status

राज्य सरकारें अपने राज्य में हिंदुओं को या किसी भी धार्मिक और भाषाई समुदायों को अल्पसंख्यक (MINORITY)घोषित कर सकती हैं। केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका के जवाब में दिया है। उपाध्याय ने अपनी अर्जी में धारा-2 (एफ) की वैधता को चुनौती देते हुए देश के विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशानिर्देश तय करने के निर्देश देने की मांग की है। उनकी दलील है कि देश के 10 राज्यों में हिंदू भी अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उन्हें अल्पसंख्यकों की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है।

महाराष्ट्र सरकार  यहूदियों को अल्पसंख्यक घोषित कर चुकी है 

उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। इस पर अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने कोर्ट में कहा- हिंदू, यहूदी, बहाई धर्म के अनुयायी किसी भी राज्य में अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना कर सकते हैं और उन्हें चला सकते हैं। कानून कहता है कि राज्य सरकार उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकती हैं। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की सीमा में यहूदियों को अल्पसंख्यक घोषित किया है, जबकि कर्नाटक सरकार ने उर्दू, तेलुगु, तमिल, मलयालम, मराठी, तुलु, लमणी, हिंदी, कोंकणी और गुजराती भाषी समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया है।

शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और संचालन का अधिकार मिले 

केंद्र ने कहा- याचिकाकर्ता का आरोप है कि यहूदी, बहाई और हिंदू धर्म के लोग लद्दाख, मिजोरम, लक्षद्वीप, कश्मीर, नगालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, पंजाब और मणिपुर में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन अपनी पसंद से शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और संचालन नहीं कर सकते हैं। यह गलत है।

सुप्रीम कोर्ट को लेना है फैसला

मंत्रालय ने यह भी कहा, ‘यदि यह विचार स्वीकार किया जाता है- अल्पसंख्यकों के मामलों पर कानून बनाने का अधिकार केवल राज्यों को है तो ऐसी स्थिति में संसद इस विषय पर कानून बनाने की उसकी शक्ति से वंचित कर दी जाएगी जो संविधान के विरोधाभासी होगा।’केंद्र ने कहा- ‘अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम-1992 न तो मनमाना है या न ही अतार्किक है और न ही संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करता है।’ वकील की याचिका और मंत्रालय के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट को इस केस पर फैसला लेना है ।

क्या अधिकार और सुविधाएं मिलती हैं अल्पसंख्यकों को?

संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के जो भी प्रावधान हैं वे सभी अल्पसंख्यकों के लिए भी हैं. इसके अलावा अल्पसंख्यकों को अपने हिसाब से शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करने का और उन्हें चलाने का अधिकार है. इस तरह के संस्थानों को सरकारी मदद में भेदभाव से संरक्षण भी मिलता है.

कौन हैं अल्पसंख्यक?

भारत के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द का उल्लेख तो है लेकिन परिभाषा नहीं है. छह समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है. ये हैं, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन. इनमें से पारसी, मुस्लिम, ईसाई, सिख और बौद्ध को 1993 में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर अल्पसंख्यक घोषित किया और जैनों को 2014 में एक अलग अधिसूचना जारी कर केअल्पसंख्यक घोषित किया गया.

अश्विनी उपाध्याय ने इन्हीं अधिसूचनाओं को रद्द करने की अपील की थी, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया था .

कैसे आई अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यवस्था?

1978 में केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक प्रस्ताव में अल्पसंख्यकों के लिए एक आयोग की बात की गई थी. उस प्रस्ताव में कहा गया था कि “संविधान में दिए गए संरक्षण और कई कानूनों के होने के बावजूद, देश के अल्पसंख्यकों में एक असुरक्षा और भेदभाव की भावना है”. इसी भावना को मिटाने के लिए अल्पसंख्यक आयोग का जन्म हुआ. 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून आया जिसके प्रावधानों के तहत ही 1993 की अधिसूचना आई.

आयोग का मुख्य उद्देश्य

आयोग का मुख्य उद्देश्य है अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों का संरक्षण करना, उनके हालात का समय समय पर जायजा लेना, उनके विकास के लिए सरकार को सुझाव देना, उनकी शिकायतें सुनना और उनका निवारण करना.इस व्यवस्था में हर राज्य में एक राज्य अल्पसंख्यक आयोग बनाने का भी प्रावधान रखा गया.

क्या इस व्यवस्था में कुछ कमी है?

2017 में सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की गई थी जिसका उद्देश्य था जम्मू और कश्मीर राज्य में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करना. उस याचिका में दलील दी गई थी कि अल्पसंख्यक आयोग कानून राज्य में लागू ना होने के वजह से कई विसंगतियां आ गई थीं. याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि 2007-08 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों के लिए 20,000 छात्रवृत्तियां निकाली थीं पर जम्मू और कश्मीर में इस योजना के तहत आईं 753 छात्रवृत्तियों में से 717 मुसलमानों को मिलीं, जो वहां अल्पसंख्यक नहीं थे.

क्या कहता है प्रधानमंत्री का  15-सूत्रीय कार्यक्रम

हालांकि ऐसा ना हो इसके लिए प्रावधान पहले से है. अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री के 15-सूत्रीय कार्यक्रम के बारे में केंद्र सरकार के दिशा निर्देशों में साफ लिखा हुआ है कि अगर किसी राज्य में राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक अधिसूचित किया गया समुदाय राज्य स्तर पर बहुसंख्यक है तो अलग अलग योजनाओं के लक्ष्यों का आवंटन उसके अलावा दूसरे अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के लिए होना चाहिए.

स्पष्ट है कि जहां ऐसा नहीं हो रहा है वहां दिशानिर्देशों का उल्लंघन हो रहा है और इसे रोकने के लिए कदम उठाये जाने चाहिए.

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