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जब सैंया, देवर की हो गयी मुश्किल, फिर भाभीजी की कुर्सी की राह कैसे होगी आसान? आरोप तो उन पर भी हैं कई!

Kalpana Soren

Kalpana Soren: झारखंड की राजनीति पल-पल बदल रही है, चुनाव आयोग की अनुशंसा कभी भी आ सकती है, इसके बाद की सम्भावना को लेकर झारखंड में राजनीतिक खेल शुरू हो चुका है। सबसे बड़ी सम्भावना तो यही है कि हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। फिर कौन हो सकता है- झारखंड का अगला मुख्यमंत्री। जाहिर है झामुमो भी दूसरी कई पार्टियों की तरह पारिवारिक पार्टी है और वह भी परिवार के बाहर सोच नहीं सकता। तो ऐसे में जो नाम सबसे ज्यादा उछला है, वह है- हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन का नाम। दो दिनों पहले झारखंड की राजनीति पर नजदीकी नजर रखने वाले गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे भी इसी नाम की सम्भावना जता चुके हैं। हालांकि निशिकांत दुबे ने साथ में उपचुनाव के लिए तैयार रहने का आह्वान भी किया है, इसके भी गहरे राजनीतिक मायने हैं।

अगर हेमंत सोरेन अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाते हैं तो यह 25 साल बाद बिहार में लालू प्रसाद यादव के अपनी पत्नी राबड़ी देवी को कुर्सी पर बिठाये जाने की पुनरावृत्ति होगी। याद होगा लालू यादव ने 1997 में जेल जाने की नौबत आयी तब उन्हें राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था।

क्या होगा, क्या नहीं होगा, यह अभी भविष्य के गर्त में है, क्योंकि हेमंत सोरेन के भाग्य का फैसला चुनाव आयोग के फैसले पर निर्भर है। फिर भी राज्य में सियासी हलचल तो है तभी शनिवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में सीएम हाउस में यूपीए विधायकों की बैठक बुलाई गई है, जिसमें सुखाड़ पर चर्चा के बहाने राज्य की वर्तमान राजनीतिक स्थित पर चर्चा कर ली गयी। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि बैठक से बाहर आने के बाद अधिकांश नेताओं ने यही कहा कि ‘गठबंधन में सब ठीक है’। अगर चर्चा सुखाड़ पर थी तब राजनीति पर बयान देने की क्या जरूरत थी?

कल्पना सोरेन की राह क्यों है मुश्किल?

किसी अन्य राजनीतिक अंदेशे को नकार कर यह मान कर चला जाये कि इसी गठबंधन की सरकार आगे चलती रहेगी, सिर्फ मुख्यमंत्री बदल जायेगा। मुख्यमंत्री के नाम पर कल्पना सोरेन की चर्चा तो है, लेकिन क्या उनका मुख्यमंत्री बन पाना इतना आसान होगा? इस स्थिति में किसी पारिवारिक विवाद को किनारे भी कर दे तब भी कुछ मुश्किलें हैं। यह सबको पता है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन खनन लीज मामलों के साथ शेल कंपनियों के मामले में भी फंसे हैं। कल्पना सोरेन का नाम भी खनन लीज और शेल कम्पनियों से जुड़ा हुआ है। इतना ही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास तो उन पर फर्जीवाड़ा कर आदिवासी जमीन खरीदने का आरोप लगा चुके हैं। तो फिर जिस भाजपा के कारण मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन की गर्दनें फंस गयी हैं, वह भाजपा इन्हीं मुद्दों पर क्या कल्पना सोरेन को बचकर निकलने देगी?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत उनके परिजनों और सहयोगियों पर खनन पट्टा, कथित फर्जी कंपनियों के माध्यम से करोड़ों रुपये के धनशोधन समेत विभिन्न मामले चल रहे हैं। उन पर अवैध खनन से पैसे की उगाही कर शेल कंपनियों में निवेश करने और देश के अन्य भागों में संपत्ति खरीदने के आरोप हैं। पत्नी कल्पना सोरेन, प्रेस सलाहकार अभिषेक प्रसाद उर्फ पिंटू, सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा, व्यवसाय सहयोगी अमित अग्रवाल और सुरेश नागरे आदि लोगों के भी नाम है। इनमें हेमंत, बसंत समेत कई लोगों पर कार्रवाइयां भी चल रही हैं।झारखंड के पूर्व सीएम और बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास ने 2009 के एक केस को लेकर कल्पना सोरेन पर हमला बोल चुके हैं। उन्होंने कल्पना सोरेन पर आदिवासियों की सैकड़ों एकड़ जमीनों को फर्जीवाड़ा करके खरीदने का आरोप लगाया है। बीजेपी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रघुवर दास ने आरोप लगाया था कि हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन ने झारखंड राज्य के कई जिलों में खुद को उसी संबंधित थाने का निवासी बताते हुए सैकड़ों एकड़ जमीनें खरीदी हैं। जबकि कल्पना मुर्मू सोरेन ओडिशा राज्य की आदिवासी वर्ग से आती हैं।

हेमंत सोरेन अभी तो मुख्यमंत्री हैं, सारी परिस्थितियां उनके बस में है। जैसे ही उनकी कुर्सी जायेगी, परिवार में ही कुर्सी के कई दावेदार पैदा हो जायेंगे। तब इस परिस्थिति हेमंत के लिए सम्भालना आसान हो पायेगा? लालू प्रसाद की बात और भी, तब लालू ही राजद का पर्याय थे, लेकिन आज का झामुमो कई ध्रुवों में बंटा हुआ है। परिवार में ही होने वाला टकराव हेमंत सोरेन को नहीं देखना है, उनके नहीं रहने से गठबंधन की गांठों के भी कमजोर पड़ने की सम्भावना है।

यह भी पढ़ें: Jharkhand में भी होगा ‘खेला’? CM Hemant Soren की कुर्सी पर मंडरा रहा खतरा! तेज हुईं सियासी अटकलें

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