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सादगी और साहस की प्रतिमूर्ति लाल बहादुर शास्त्री ने जब पाकिस्तान के सदर अयूब को बतायी उसकी औकात

लाल बहादुर शास्त्री ने जब पाकिस्तान के सदर अयूब को बतायी उसकी औकात

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज 2 अक्टूबर है। देश महात्मा गांधी की 152वीं जयंती मनाने में मशगूल है। लेकिन आज ही के दिन जन्मे देश के सच्चे ‘लाल’ लाल बहादुर शास्त्री को नहीं भूल सकते। लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में शारदा प्रसाद और रामदुलारी देवी के घर हुआ था। देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की भी आज ही जयंती है। लाल बहादुर शास्त्री 9 जून 1964 में भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने थे। शास्त्रीजी अपनी सादगी के लिए तो जाने ही जाते थे, लेकिन साहस उनमें कूटकूट कर भरा था। लाल बहादुर शास्त्री ने ही देश को ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था।

स्वतंत्रत्रा संग्राम के आन्दोलन में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

लाल बहादुर शास्त्री का स्वाधीनता संग्राम में भी अहम योगदान रहा है। वह पहली बार 1920 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। इसके बाद स्वाधीनता संग्राम के विभिन्न आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। शास्त्रीजी महात्मा गांधी के कई आन्दोलनों का भी हिस्सा रहे हैं। 1921 में असहयोग आंदोलन, 1930 में दांडी मार्च, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

चीन जीता तो भ्रम में पड़ कर हमला करने वाले पाकिस्तान को सिखाया सबक

1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया था। इस युद्ध में भारत को हार झेलनी पड़ी थी। भारत की इस हार से पाकिस्तान को गलतफहमी हो गयी। पाकिस्तान को भ्रम हो गया कि भारत की सेना में दम नहीं है। फिर क्या था, 1965 में भारत पर आक्रमण कर दिया। लेकिन पाकिस्तान को यह गुमान नहीं था कि उसका मुकाबला छोटे कद के दिखने वाले, मगर आसमान से ऊंचे इरादे रखने वाले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से है। शास्त्री जी की सूझबूझ व रणनीति का पाकिस्तान के पास कोई जवाब नहीं था। फिर क्या था, पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। बता दें, भारत की पाकिस्तान की इस जीत का जश्न तो हर साल हम मनाते ही हैं, मगर पाकिस्तान में ही अपने ही देश की इस नादानी पर खूब किरकिरी होती है।

पाकिस्तान पर जीत के बाद रामलीला मैदान में हुंकार

भारत- पाकिस्तान युद्ध 26 सितंबर 1965 को खत्म हुआ था। इस युद्ध की समाप्ति के 4 दिनों बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों लोगों के सामने भारत की जीत का जयघोष किया। इधर लाल बहादुर शास्त्री बोले जा रहे थे, उधर तालियों की गड़गड़ाहट रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं। शास्त्री ने उस वक्त ऐलान किया-

“सदर अयूब ने कहा था कि वह दिल्ली तक चहलकदमी करते हुए पहुंच जाएंगे। वह इतने बड़े आदमी हैं। लहीम शहीम हैं। मैंने सोचा कि उन्हें दिल्ली तक चलने की तकलीफ़ क्यों दी जाये। हम ही लाहौर की तरफ़ बढ़ कर उनका इस्तकबाल करें।”
पाकिस्तान के सदर अयूब को मजाक उड़ाने का मिला अच्छा जवाब

भारत-पाकिस्तान युद्ध के साल भर पहले सदर अयूब ने लाल बहादुर शास्त्री के कद को लेकर मजाक उड़ाया था। बता दें, लाल बहादुर शास्त्री का कद 5 फीट 2 इंच था। लेकिन सदर अयूब लाल बहादुर के कद से कहीं ज्यादा उनके बुलंद हौसलों को आंकने में भूल कर बैठा। वैसे यह सदर अयूब की आदत में शुमार था कि वह हमेशा लोगों का आकलन, आचरण की जगह, उसके बाहरी स्वरूप से किया करता था। लेकिन भारत से मिली मात ने उसे समझा दिया था कि यह 5 फीट 2 इंच का व्यक्ति क्या चीज है।

लाल बहादुर शास्त्री के जीवन के अनकहे किस्से
  • बचपन में ही पिता की मौत के बाद जी माता अपने पिता के घर मिर्जापुर रहने लगीं, जहां लाल बहादुर शास्त्री जी की प्राथमिक शिक्षा आरंभ हुई। परिस्थितियां अच्छी ना होने के कारण कहा जाता है कि लाल बहादुर शास्त्री रोजाना नदी तैरकर स्कूल जाया करते हैं।
  • देश में फैली जातिप्रथा का विरोध करते हुए 12 वर्ष की आयु में लाल बहादुर शास्त्री ने अपने उपनाम ‘श्रीवास्तव’ को त्याग दिया था। बीए की डिग्री पूरी करने के बाद लाल बहादुर को ‘शास्त्री’ की उपाधि से नवाजा गया। जिसका अर्थ होता है ‘विद्वान’।
  • स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में लाल बहादुर शास्त्री पुलिस एवं परिवहन मंत्री बने और उन्होंने अपने पहले कार्यकाल के दौरान महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की थी। साथ ही उन्होंने अनियमित भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज की बजाय पानी के जेट का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया था।
  • इलाहाबाद से दो बार सांसद रहे लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा यमुना पार में उरुवा में एक सभा के दौरान दिया था। बाद में यह नारा देशभक्ति का प्रतीक बन गया। उनका यह नारा इतना चर्चित हुआ कि बाद में हर सभा का हिस्सा बन गया।
  • लाल बहादुर शास्त्री जब साल भर के थे। माता-पिता उन्हें अपने साथ मकर संक्रांति के दिन संगम लेकर गये थे। मां-बाप का ध्यान हटने के बाद एक गो पालक उन्हें उठा ले गया। बेटे के गुम होने से परेशान पिता ने संगम की पुलिस चौकी में रिपोर्ट दर्ज करा दी। संगम क्षेत्र में एनाउंस होने लगा। इसी बीच किसी ने बताया कि एक बच्चा नाव में रखी टोकरी में रो रहा है। माता-पिता उस नाव के पास पहुंचे और गो पालक से बच्चा दिखाने के लिए कहने लगे। लेकिन वह बच्चा देने को तैयार नहीं हुआ। कुछ देर को उसके साथ झगड़ा भी हुआ।

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