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World Meteorological Day: बदल गयी है मौसम की चाल, बेमौसम हुईं गर्मी, सर्दी और बारिश

Weather has changed, unseasonal heat, winter and rain have changed

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

दुनिया आज ‘विश्व मौसम विज्ञान दिवस’ मना रही है। विश्व मौसम विज्ञान दिवस मौसम में लगातार हो रहे परिवर्तनों के प्रति लोगों को जागरूक करने और उसमें उनकी क्या भागीदारी है यह समझाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। 1950 से हम विश्व मौसम विज्ञान दिवस मनाते आ रहे हैं, लेकिन सच कह जाये तो अन्य दिवसों की तरह यह भी हमारे लिए मात्र एक ‘दिवस’ बन कर रह गया है, जिसे मना कर हम इतिश्री कर लेते हैं। जबकि हम थोड़ा सचेत हो जायें तो मौसम की मार से सचमुच बच सकते हैं। इसके लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। 2020 में कोरोना की शुरुआत  के बाद विश्व भर में लगे लॉकडाउन ने सुधरे पर्यावरण का जो नजारा दिखाया था, वह एक अविस्मरणीय पहलू है। कोरोना के इस काल में यह साबित हो गया कि हम मौसम में दुरुस्त करने के बारे में जो सोचते हैं, वैसा किया जा सकता है। लेकिन परेशानियां झेलने के बाद भी सचेत नहीं हो रहे हैं।

इस समय जाड़े का मौसम पूरे देश में लगभग समाप्त हो गया है। गर्मी की शुरुआत हो चुकी है। लेकिन देश के कई राज्यों से जो खबरें आ रही हैं, उससे लगता है कि मार्च महीना ही जून का अहसास कराने लगा है। यह बदलते या बदल चुके मौसम का ही असर है। सर्दी, गर्मी या बारिश समय पर नहीं होतीं। सर्दी देर से आने लगी है, गर्मी जल्द पड़ने लगती है, और बारिश बेमौसम हो जाती है। इसका असर खेती और अर्थव्यवस्था पर भी सीधे तौर से पड़ने लगता है।

इस उतार-चढ़ाव भरे मौसम की कई वजहें हो सकती हैं। एक है, प्रकृति और दूसरी है नृकृति यानी मानव जनित। सामान्य तौर पर पश्चिमी विक्षोभ से मौसम में बदलाव होते हैं। अचानक ठंडी हवाएं चलने लगती हैं  तो ठंड बढ़ जाती है। हम सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग की बात तब करते हैं, जब तापमान बढ़ रहा हो। स्थानीय कारण और क्लाइमेट चेंज भी बड़ी वजह है। मानव जनित कारकों में फैक्टरियां, वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण कार्य अन्य वजहों से स्थानीय स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों के अधिक उत्सर्जन से भी ऐसा होता है।

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि मौसम परिवर्तन के पीछे मानवीय गतिविधियां ही हैं। हम अपने भौतिक सुखों को दिन-ब-दिन बढ़ाते जा रहे हैं, और अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के परिणाम किसी एक जगह नहीं, पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है। सबसे दुःखद स्थिति तो यह है कि जिन देशों का वैश्विक तापमान बढ़ाने में सबसे कम योगदान है, उन्हें भी यह पीड़ा झेलनी पड़ रही है। विश्व के बड़े देशों की चौधराहट का दुष्परिणाम छोटे देशों को भुगतना पड़ रहा है। करना न होगा, भविष्य में मौसम परिवर्तन का सबसे बुरा असर दुनिया के निर्धन इलाकों को झेलना पड़ेगा। मौसम की अनियमितता से करोड़ों लोगों को कहीं पानी नहीं मिलेगा, कहीं फसलें चौपट होंगी और अधिकांश जगह बीमारियां फैलेंगी।

यह भी पढ़ें:  World Meteorological Day 2022: जानें विश्व मौसम विज्ञान दिवस का महत्व और कब हुई थी इसकी शुरुआत

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