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Vasant Panchami: जब चैत्र से होती है वसंत ऋतु की शुरुआत, फिर क्यों पहले मनायी जाती है ‘वसंत पंचमी’

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न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज देश से साथ दुनिया के दूसरे देशों में भी वसंत पंचमी का पर्व धूमधाम से मां सरस्वती की आराधना करके मनाया जा रहा है। मां सरस्वती की आराधना और वसंत पंचमी एक दूसरे से जुड़े हैं, किन्तु जिस दिन वसंत पंचमी मनायी जाती है, वह समय वसंत ऋतु का नहीं होता। फिर इस दिन को वसंत पंचमी क्यों कहा जाता है? वसंत की शुरुआत चैत्र माह से होती है, जबकि वसंत पंचमी पर्व माघ मास के शुक्लपक्ष की पांचवीं तिथि को मनायी जाती है। ऋतुओं के वर्गीकरण के अनुसार माघ और फाल्गुन मास में शिशिर ऋतु रहती है। यानी इस समय शिशिर ऋतु है। तब सवाल उठता है कि माघ मास के शुक्लपक्ष की पांचवीं को वसंत पंचमी क्यों कहते हैं? ज्योतिषी भी मानते हैं कि पिछले हजारों सालों में वसंत पंचमी पर कभी वसंत ऋतु शुरू हुई ही नहीं। इस दिन देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं। इस दिन को श्री पंचमी भी कहा जाता है।

वसंत राग से मिला वसंत पंचमी नाम

भारतीय संस्कृति विभिन्न परम्पराओं का मेल है। वैसे ही किसी एक पर्व या त्योहार को मनाने के पीछे भी कई परम्पराएं होती हैं। वसंत पंचमी नाम के पीछे ऋतुओं में होने वाला परिवर्तन एक कारण है। माघ महीने के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि से मौसम में बदलाव की शुरुआत हो जाती है। प्रकृति वसंत ऋतु की ओर बढ़ने लगती है। वसंत आने की खुशी में इस दिन वसंत राग गाने की परंपरा भी है। शास्त्रीय संगीत में इस राग को उमंग, उल्लास और खुशी से जोड़ा गया है। माघ शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि से वसंत राग गाने की शुरुआत होने के कारण ही इसे वसंत पंचमी कहा जाता है। वसंत राग ही ऐसा राग है जो ऋतु के आने से पहले ही गाया जाता है, बाकी राग ऋतुओं के शुरू होने पर ही गाये जाते हैं।

वसंत पंचमी नाम के पीछे दूसरी धारणा है कि वसंत राग पंचवक्त्र शिव यानी पंचमुखी शिव के पांचवें मुख से निकला है। वसंत राग श्री पंचमी यानी वसंत पंचमी से हरिशयनी एकादशी तक गाया जा सकता है, लेकिन कुछ संगीतज्ञों का मानना है कि इसे सिर्फ वसंत ऋतु में ही गाना चाहिए। चूंकि यह राग शिव के पांचवें मुख से निकला था इसलिए इस दिन को श्री पंचमी भी कहा जाता है।

मां सरस्वती के प्राकट्य से जुड़ी है वसंत पंचमी

चैत्र महीने के शुक्लपक्ष की पहली तिथि पर ब्रह्माजी ने सृष्टि बनाई। परन्तु कुछ समय पश्चात उन्हें लगा कि दुनिया के जीव नीरसता से जी रहे हैं। उनमें कोई उल्लास या उत्साह नहीं है। तब उन्होंने अपने कमंडल के जल से माता सरस्वती को प्रकट किया। मां सरस्वती सफेद कपड़े पहने, हाथ में वीणा लिए प्रकट हुईं। उन्हीं के साथ धरती पर विद्या और ज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ। वह दिन वसंत पंचमी का दिन था। माघ मास शुल्क पक्ष की पंचमी तिथि पर देवी सरस्वती के प्रकट होने से देवताओं और ऋषि-मुनियों में उल्लास और आनंद छा गया था। फिर सभी ने वेदों की ऋचाओं से देवी की स्तुति की। चूंकि संस्कृत में उल्लास और आनंद की स्थिति को ही वसंत कहा गया है। इसलिए देवी सरस्वती के प्रकट होने पर इस दिन को वसंत पंचमी कहा जाने लगा।

कब-कब, कौन-कौन-सी ऋतुएं

हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले से भारतीय मौसम के अनुसार 6 ऋतुएं निर्धारित की हैं। जिनका प्रभाव सीधे तौर पर हमारे ऊपर पड़ता है। इन ऋतुओं को विभाजित करने के पीछे कई कारण हैं। आप हर ऋतु के बदलने पर पाएंगे कि हमारे आसपास की हर एक चीज, जैसे- पृथ्वी का तापमान, दिन और रात का समय, सूर्योदय व सूर्यास्त का समय, पेड़-पौधों व जीव-जंतुओं इत्यादि में परिवर्तन हो रहा है।

वसंत ऋतु

छह ऋतुओं में प्रथम है- वसंत ऋतु। इसी के साथ हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत होती है। वसंत ऋतु को सभी ऋतुओं में सबसे महान तो बताया ही गया है, इसे ऋतुराज की संज्ञा भी प्राप्त है। वसंत ऋतु की शुरुआत हिंदू माह के प्रथम माह चैत्र से होती है व समाप्ति द्वितीय माह वैशाख में होती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह मार्च से अप्रैल महीने के बीच का होता है। वसंत ऋतु में चैत्र नवरात्र, वसंत पंचमी, राम नवमी, हनुमान जयंती, वैसाखी, बुद्ध पूर्णिमा इत्यादि पर्व पड़ते हैं।

ग्रीष्म ऋतु

वसंत ऋतु की समाप्ति के बाद ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत होती है। यह हिंदू कैलेंडर के तीसरे माह ज्येष्ठ से शुरू होकर चौथे माह आषाढ़ तक रहती हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह कालखंड मई से जून महीनों के बीच का है। इस ऋतु में वट सावित्री व्रत, जगन्नाथ रथयात्रा, निर्जला एकादशी आदि त्योहार पड़ते हैं।

वर्षा ऋतु

तीसरी ऋतु वर्षा ऋतु है। यह ऋतु भीषण गर्मी से त्रस्त पृथ्वी की प्यास बुझाती है। यह हिंदू माह के पांचवें माह श्रावण से शुरू होकर छठे माह भाद्रपद तक रहती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जुलाई से सितंबर महीनों के बीच यह ऋतु रहती है। इस ऋतु के प्रमुख त्यौहार तीज, नागपंचमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, रक्षाबंधन, गायत्री जयंती व राधाष्टमी हैं।

शरद ऋतु

शरद ऋतु वर्षा ऋतु के बाद आती हैं। यानी न ज्यादा गर्मी और न ज्यादा सर्दी। एक तरह से यह ऋतु वसंत ऋतु के समान है। अंतर यह है, वसंत से गर्मी की शुरुआत होती है और शरद से सर्दी की। यह ऋतु हिंदू माह के सातवें माह अश्विन से शुरू होकर आठवें माह कार्तिक तक रहती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इसका कालखंड सितंबर से अक्टूबर के बीच रहता है। इस ऋतु में शारदीय नवरात्र, विजयादशमी, श्राद्ध पक्ष, दुर्गाष्टमी, शरद पूर्णिमा, करवाचौथ, महानवमी, अहोई अष्टमी इत्यादि त्योहार मनाये जाते हैं।

हेमंत ऋतु

हेमंत शीत ऋतु है। हेमंत ऋतु में ठंड का आगमन हो जाता हैं किन्तु वह इतनी तीव्र नही होती हैं। हेमंत ऋतु का कालखंड हिंदू माह के नवे माह मार्गशीर्ष से दसवें माह पौष तक होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इसका कालखंड नवंबर माह से जनवरी के बीच का होता है। इस ऋतु में, धनतेरस, रूप चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा, कालभैरव जयंती, तुलसी विवाह, कार्तिक पूर्णिमा, गीता जयंती त्योहार आते हैं।

शिशिर ऋतु

शिशिर ऋतुओं में अंतिम ऋतु हैं जिसमें भीषण ठंड पड़ती है। यह ऋतु हिंदू माह के ग्याहरवें माह माघ से शुरू होकर अंतिम अर्थात बारहवें माह फाल्गुन में समाप्त होती हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इसका कालखंड जनवरी से फरवरी माह के बीच का रहता है। इस समय शिशिर ऋतु चल रही है। इस ऋतु के प्रमुख त्यौहारों में लोहड़ी, पोंगल, मकर संक्राति, महाशिवरात्रि प्रमुख हैं।

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