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UP Election 2022: अबकी बार, वोट प्रतिशत बढ़ने के आसार, चुनाव मशीनरी कमर कस कर तैयार

UP Election 2022: अबकी बार, वोट प्रतिशत बढ़ने के आसार

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

2022 में उत्तर प्रदेश में वोट का प्रतिशत कैसे बढ़ाया जाये, चुनाव मशीनरी उसके प्रयास में अभी से लग गयी है। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में 61 प्रतिशत वोट पड़े थे। लेकिन चुनाव आयोग नहीं चाहता कि इस बार भी वैसा हो। चुनाव आयोग इस बार वोटों का प्रतिशत 70 से 75 प्रतिशत करने के प्रयास में लगा हुआ है। ऐसा अक्सर देखा जाता है कि दक्षिण भारतीय राज्यों की तुलना में उत्तर भारत के राज्यों में वोट प्रतिशत कम रहता है। उप चुनावों में तो यह प्रतिशत और भी घट जाता है। 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश की 11 सीटों के लिए जब उपचुनाव हुए तो उसमें 47% ही वोट पड़े थे।

चुनाव मशीनरी ने बनायी योजना

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस बार वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग कई ठोस कदम उठाने जा रहा हैं। चुनाव आयोग ने इस बार मतदान प्रतिशत 70 से 75 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा है। वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए चुनाव मशीनरी ने जो स्पेशल प्लान तैयार किया है उसमें प्रदेश की आशा बहुओं, एनएएम, पंचायत अधिकारियों, शिक्षा मित्रों और शिक्षकों आदि को शामिल किया जाएगा। निर्वाचन आयोग आगामी चुनावों के लिए उन विधानसभा क्षेत्रों, मतदान केंद्रों और जिलों पर फोकस कर रहा है जहां पिछले विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत काफी कम रहा था।

क्या है चुनाव आयोग की प्लानिंग?

आगामी विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने जो योजना बनायी है उसमें सबसे ऊपर है लोगों को जागरूक करना। क्योंकि जागरूकता की कमी के कारण ही लोग मतदान के प्रति उदासीन रहते हैं। इसलिए पिछले विधानसभा चुनावों में जहां वोटों का प्रतिशत कम रहा था वहां बूथ अवेयरनेस ग्रुप, मतदाता जागरूकता क्लब, शिक्षण संस्थाएं स्थापित कर चुनाव आयोग लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित करेगा। इस काम में निर्वाचन साक्षरता साथी भी मदद करेंगे। एक बात और, पिछली बार ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, शहरी क्षेत्रों में भी मतदान प्रतिशत कम रहा था। इस लिए वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए सिर्फ ग्रामीण ही नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों पर भी चुनाव आयोग ध्यान देगा। साथ ही उन क्षेत्रों पर भी खास ध्यान दिया जाएगा जहां पर महिला और पुरुष मतदाताओं का अनुपात कम है। सभी क्षेत्रों में सर्विस मतदाताओं की संख्या भी बढ़ाई जाएगी। बता दें, 2017 में 184 विधानसभा सीटों में 51 से 61 फीसदी तक मतदान हुआ था। वहीं 12 सीटें ऐसी हैं जहां 40 से 50 प्रतिशत ही वोट पिछले चुनाव में पड़े थे।

केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के निर्देश के बाद बढ़ी है सक्रियता

विधानसभा चुनावों को लेकर केंद्रीय निर्वाचन आयोग में एक वर्कशॉप का आयोजन किया गया था। इस वर्कशॉप में उन सभी राज्यों के निर्वाचन आयोगों को मतदान प्रतिशत बढ़ाने का निर्देश दिया गया था। इस वर्कशॉप में उत्तर प्रदेश सहित उन पांच राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी व अन्य अफसर शामिल हुए जहां अगले साल मार्च-अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने हैं। सभी को मतदान प्रतिशत बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

2019 के लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर 40-50% ही वोट पड़े थे

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव में भी वोट प्रतिशत कम रहा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में 21 सीटें ऐसी हैं, जहां 40 से 50 फीसदी के बीच मतदान हुआ था। इस बार चुनाव आयोग की पूरी कोशिश है कि लोगों को घरों से बाहर वोट डालने के लिए निकाला जा सके। दिव्यांगों को मतदान केंद्र पर कैसे लाया जाये, इसे लेकर भी काम हो रहा है।

वोट प्रतिशत में आगे हैं ये राज्य

लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा चुनाव देश के कई राज्य ऐसे हैं जहां वोट का प्रतिशत हमेशा ज्यादा रहता है। पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़ों से भी इसे समझा जा सकता है। पिछली बार के विधानसभा चुनावों में छोटे राज्यों में त्रिपुरा में 91%, मेघालय में 88%, सिक्किम में 81%, पुडुचेरी में 86% और मणिपुर में 84% वोटिंग हुई थी। वहीं बड़े राज्यों में पश्चिम बंगाल में 83%, असम में 79% और आंध्र प्रदेश में 75% वोट पड़े थे।

उत्तर प्रदेश में वोटों का प्रतिशत कम होने के कारण

उत्तर प्रदेश में वोटों का प्रतिशत कम होने के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण इस क्षेत्र का पिछड़ापन और जागरूकता की कमी है। उत्तर प्रदेश के चुनावों में जातिगत समीकरण भी बहुत काम करता है। अपने पसंद की जाति का उम्मीदवार नहीं होने की स्थिति में भी लोग घरों से बाहर नहीं निकलते हैं। उत्तर प्रदेश में इन दिनों सड़कों का जाल बिछा है, लेकिन इसके बाद भी कई इलाके ऐसे हैं जो यातायात के हिसाब से दुर्गम ही कहे जायेंगे। यातायात के साधन कम होने की वजह से भी मतदाता अपने केन्द्र तक नहीं पहुंच पाते हैं। इस कारण भी वोटों का प्रतिशत कम होता है। यही नहीं, वोटिंग के प्रति लोगों की अनिच्छा भी वोट प्रतिशत कम करने का काम करती है। ऐसा ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी देखा जाता है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऊंची जातियों और दबंगों का वर्चस्व बहुत है। एक समय था जब बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं यहां खूब होती थीं। दबंगों के प्रभाव के कारण आम लोग वोट नहीं डाल पाते थे। समाज में निचले तबके के लोग प्रभावी तौर पर मतदान नहीं कर पाते थे। ये दबंग ही तय करते थे कि वोटिंग कैसे और किसे हो। 1995 के बाद से स्थिति बदली है। टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद से निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई है। चुनाव प्रक्रिया में बदलाव जरूर आया है, लेकिन समाज की सोच नहीं बदली है। निचले तबके को लोगों के मन में अब भी दबंगों और बूथ कैप्टरिंग की धारणा वही बनी हुई है। इसके कारण वे वोटिंग के प्रति निष्क्रिय रहते हैं।

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