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‘अबकी बार 75 पार’, वाकई दम है सीएम Hemant Soren के बयान में

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jharkhand politics: झारखंड की हेमंत सोरेन (CM Hemant) सरकार ने राज्य में आरक्षण की ऊपरी सीमा को 60 फीसदी से बढ़ाकर 77 फीसदी करने का विधेयक शुक्रवार को विधानसभा से पारित करा लिया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (CM Hemant) ने शुक्रवार को एक तीर से कई शिकार किए। विधानसभा के विशेष सत्र में अपनी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा की सर्वाधिक पुरानी मांग 1932 के खतियान के आधार पर राज्य की स्थानीय नीति परिभाषित करने को लागू करने संबंधी विधेयक पारित कराया, तो ओबीसी का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के साथ-साथ अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के भी आरक्षण का दायरा बढ़ाया।

क्षेत्रवाद बनाम राष्ट्रीय राजनीति

राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे हमेशा से हावी रहे हैं। इसी को आधार बनाकर राजनीतिक पार्टियां अपनी रणनीति तय करती हैं। झारखंड भी इससे अछूता नहीं है। यहां भी राज्यस्तरीय मुद्दे हावी रहते हैं। स्थानीय मुद्दों को राजनीतिक मुद्दा बना चुनाव लड़े जाते हैं और इसका खासा प्रभाव चुनाव परिणाम में देखने को भी मिलता है। 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति के सदन से पास होने से यहां की राजनीति में क्षेत्रवाद हावी होती दिख रही है।

बीजेपी को उठाना पड़ सकता है नुकसान! 

स्थानीय नीति और ओबीसी आरक्षण के बिल के पारित होने से क्षेत्रवाद की राजनीति की जड़ें झारखण्ड में अब और गहरी होती दिख रही है. अबतक बीजेपी को केंद्र सरकार के कार्यों से ही ज्यादातर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में फायदा मिलता दिखा है, लेकिन शुक्रवार को प्रदेश की सरकार ने जो ऐतिहासिक फैसला लिया है, उसके काफी दूरगामी प्रभाव दिख सकते हैं और बीजेपी को आगामी चुनावों में मुंह की खानी पड़ सकती है।

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”जेल में रहकर भी भाजपा का सूपड़ा साफ कर देंगे”

मुख्यमंत्री ने ईडी के समन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों पर भी पलटवार करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे हर हाल में राजनीति के मैदान में मजबूती से डटे रहेंगे। दोनों विधेयक बहुमत से पारित होने के बाद उन्होंने ललकारते हुए कहा कि ईडी और सीबीआइ से डराने की जरूरत नहीं है। जेल में रहकर भी वे भाजपा का सूपड़ा साफ कर देंगे। बीजेपी जो विगत चुनाव में चिल्लाती रही “अबकी बार 65 पार”, उसी के तर्ज पर हेमंत सोरेन ने भी कहा है -अबकी बार हम 75 की संख्या में रहेंगे। उनके  इस दावे में दम भी नजर आ रहा है क्योंकि इन दो बिलों के पारित होने से बीजेपी के एसटी और ओबीसी बैंक में सेंधमारी हो जाएगी जिसका भारी नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ सकता है। ओबीसी वर्ग झारखण्ड में बीजेपी का बहुत बड़ा वोट बैंक रहा है। रही बात आदिवासी वोटर्स की तो भूमि अधिग्रहण बिल और पत्थलगड़ी आन्दोलन के दौरान बीजेपी सरकार के रवैए से अधिकांश आदिवासी और  आदिवासी संगठन नाराज हैं। जिसका खामियाजा 2000 के विधान सभा में भाजपा को भुगतना पड़ा था, जब उसकी सत्ता से विदाई हो गई थी।अब हेमंत सोरेन ने स्थानीयता का दांव चलकर आदिवासी हितैषी होने का सन्देश आदिवासी समाज तक पहुंचा दिया है। इसका फायदा आगामी चुनावों में JMM को मिलता दिखेगा।

जो काम बीजेपी राज्य में नहीं कर सकी, उसे हेमंत सरकार ने किया  

झारखंड को बने 22 साल हो गए। इस दौरान आदिवासी बहुल इस राज्य पर ज्यादा समय तक बीजेपी ने ही शासन किया है, लेकिन बीजेपी की सरकारें एसटी-एससी समेत ओबीसी का आरक्षण नहीं बढ़ा सकीं। स्थानीयता और आरक्षण संबंधी विधेयक पर सदन के भीतर भाजपा बैकफुट पर दिखी। बीजेपी ने भी सदन में बिल की का समर्थन किया है, क्योंकि वह ऐसा कर राज्य के एक बड़े वर्ग का समर्थन नहीं खोना चाहती थी, उसके साथ राजनीतिक मजबूरी थी। झारखण्ड में बीजेपी को बाहरी वोटर्स का जबरदस्त समर्थन रहा है। ऐसे में हेमंत सोरेन और यूपीए सरकार ने यह कदम उठाते हुए राज्य में यह जताने की कोशिश की है कि आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों के हित के लिए सिर्फ हेमंत सरकार ही सोचती है।

गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दिया

हेमंत सोरेन ने इस बिल को पास कराकर एक तीर से कई निशाना साधा है। पहला उन्होंने  आरक्षण की सीमा बढ़ाकर अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दिया है। अगर केंद्र सरकार उसे नौवीं अनुसूची में शामिल नहीं करा पाती है, तो तमाम विपक्षी पार्टियां इसका दोष सीधे-सीधे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और बीजेपी पर मढ़ेंगी और आमजन के बीच यह राय बनाने की कोशिश करेगी कि बीजेपी आरक्षण विरोधी है और दलितों-पिछड़ों की हिमायती नहीं है।

 2024 के आम चुनाव पर पड़ेगा असर 

इस बिल के पारित हो जाने से  आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के बीच 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के खिलाफ हवा बन सकती है।झारखण्ड में बीजेपी के साथ  पिछड़े वर्ग का बहुत बड़ा वोट बैंक है जिसकी बदौलत व लगातार दो लोकसभा चुनावों में उसे बहुत फायदा मिला था। लेकिन इस बार हेमंत के मास्टर स्ट्रोक ने बीजेपी के सामने बहुत बड़ा रोड़ा खड़ा कर दिया है। उसे आगामी लोकसभा और विधान सभा के चुनावों में भारी खामियाजा उठाना पड़ सकता है।

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