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गांधीजी की फिल्मों में नहीं थी रुचि, पर फिल्मकारों ने ली खूब रुचि, दर्शकों को भी भाये ‘गांधी’

गांधीजी की फिल्मों में नहीं थी रुचि पर फिल्मकारों ने ली खूब रुचि

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तित्व और उनके महान कार्यों को किसी एक फिल्म में समेट पाना सहज काम नहीं है, फिर भी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर फिल्मकारों की निगाहें रही हैं। आजादी से पहले और आजादी के बाद गांधी के व्यक्तित्व और विचारों को फिल्मों के जरिये उकेरने का प्रयास किया जाता रहा है। गांधीजी पर बनीं कुछ फिल्में गुमनाम रहीं तो कुछ फिल्मों दर्शकों ने सिर-माथे पर लिया। इन फिल्मों को दर्शकों की खूब सराहना मिली। इन फिल्मों में रिचर्ड एटनबेरो द्वारा बनायी गयी फिल्म ‘गांधी’ को दर्शक आज भी नहीं भूले हैं। यह फिल्म 1982 में आयी थी। भारत सरकार के सहयोग से बनी ‘गांधी’ गांधीजी पर बनी सर्वाधिक चर्चित और देखी गयी फिल्म है। फिल्म में हॉलीवुड एक्टर बेन किंस्ले गांधी के रोल में नजर आये थे।

‘गांधी’ फिल्म के अलावा भी कुछ फिल्में भारतीय दर्शकों को प्रभावित करती रही हैं।

गांधी माई फादर

‘गांधी माई फादर’ फिल्म फिरोज अब्बास खान ने बनायी थी। इस फिल्म में गांधीजी और उनके बेटे हरीलाल गांधी के रिश्ते को पर्दे पर दिखाया गया था। इस फिल्म में दर्शन जरीवाला महात्मा गांधी के रोल में नजर आये। अक्षय खन्ना ने उनके बेटे हीरालाल का रोल किया था।

लगे रहो मुन्ना भाई

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ गांधीजी के ऊपर बनायी गयी फिल्म नहीं थी, लेकिन इस फिल्म में गांधीजी की विचारों को दिखाया गया था। ‘गांधीगीरी’ शब्द इसी फिल्म की देन है।

द मेकिंग ऑफ महात्मा

श्याम बेनिवाल ने ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ नाम से फिल्म बनायी थी। फिल्म में महात्मा गांधी के जीवन को दर्शाया गया था। इस फिल्म में महात्मा गांधी के उस दौर को दिखाया जब वह बैरिस्टर के रूप में दक्षिण अफ्रीका में प्रैक्टिस कर रहे थे।

हे राम

डायरेक्टर कमल हासन ने गांधीजी की हत्या और देश के बंटवारे के बाद हुए दंगों को फिल्म ‘हे राम’ में दिखाया था। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने महात्मा गांधी का किरदार निभाया था। वहीं फिल्म में नसीरुद्दीन शाह के साथ अतुल कुलकर्णी, रानी मुखर्जी, गिरीश कर्नाड और शाहरुख खान मुख्य रूप से नजर आये थे।

ब्रिटिश काल में भी गांधीजी पर बनी फिल्में

गांधीजी की सिनेमा में कोई रुचि नहीं थी, इसके बावजूद फिल्मकारों ने गांधीजी में रुचि ली। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भी गांधीजी की राजनीतिक सक्रियता से प्रभावित थे। इसी वजह से वह कुछ फिल्मकारों के प्रिय रहे। गांधीजी के करिश्माई व्यक्तित्व का प्रभाव और भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अपना कुछ योगदान कर पाने के उद्देश्य से भी फिल्मकारों ने गांधी को भी अपनी फिल्मों के इर्द-गिर्द रखा। ब्रिटिश सरकार ने भी गांधीजी के डॉक्यूमेंटेशन में कोताही नहीं की। लेकिन अंग्रेजों ने अपने अंदाज में गांधीजी को पेश किया। ब्रिटिश पाथे की ‘न्यूजरील’ में गांधीजी को ‘कुख्यात आंदोलनकारी’ कहा गया। तब ब्रिटिश सरकार के लिए वह ‘कुख्यात’ और ‘आंदोलनकारी’ ही थे, लेकिन भारतीय फिल्मकारों की निगाह में उनका दर्जा अलग था।

भारतीय फिल्मकारों की चालाकियां अंग्रेजों की नजरों से नहीं बचीं

ब्रिटिश सरकार फिल्मों के व्यापक असर से वाकिफ थी। उस समय सेंसरशिप की सख्ती थी। यही वजह है कि 1921 में प्रदर्शित मूक फिल्म ‘भक्तविदुर’ को प्रतिबंधित करते हुए अंग्रेजों ने कहा, ‘यह विदुर नहीं है। यह गांधी है और हम इसकी अनुमति नहीं देंगे।’ इस फिल्म में द्वारकानाथ संपत ने विदुर की भूमिका निभाई थी। उन्होंने बाद में एक संस्मरण में लिखा था कि दर्शकों को कुछ नहीं बताया गया था कि विदुर में गांधीजी की छवि है। लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने भांप लिया। ऐसा ही कुछ वी. शांताराम के साथ हुआ। ब्रिटिश अधिकारियों के आदेश पर उनको फिल्म ‘महात्मा’ (1935) का शीर्षक बदल कर ‘धर्मात्मा’ करना पड़ा था। आजादी के पहले की कुछ और फिल्मों को भी सेंसर का कोपभाजन बनना पड़ा।

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