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बदल गई किस्मत भगवान के वंशज की या चमक रही है सियासत

Sukhram Munda

ब्रजेश राय, संपादक समाचार प्लस , झारखंड बिहार

भगवान बिरसा मुंडा के पोते सुखराम मुंडा को अब राज्य की हेमंत सोरेन से लेकर केंद्र की मोदी सरकार हाथोहाथ लेने लगी है… 15 नवंबर धरती आबा की जयंती पर राज्य सरकार ने भगवान के वंशज सुखराम मुंडा को जमीन के पट्टे के साथ कई योजनाओं के लाभ से लाभान्वित किया तो दूसरी तरफ केंद्र की मोदी सरकार ने 15 नवंबर की तारीख को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को “जनजातीय गौरव दिवस” घोषित कर दिया। फिर 16 नवंबर को सुखराम मुंडा को दिल्ली बुलाकर नामी-गिरामी हस्तियों के सामने तवज्जो देते हुए “आदि महोत्सव” का उद्घाटन करवाते हुए फीता कटवाया.

आदिवासी समुदाय के हीरो और आंदोलनकारी नेता रहे झारखंड में भगवान का दर्जा पा चुके भगवान बिरसा मुंडा के वंशजों के प्रति एकाएक राज्य और केंद्र दोनों की सरकार ने जो आदर, सम्मान और प्रेम की बरसात की है, उसके मायने ढूंढने के लिए राजनीतिक विश्लेषकों को इस सर्दी में सियासत की आंच को महसूस करना ही होगा। दरअसल, वर्तमान समय मे राजनीति की परिभाषा यही है कि , “येन-केन-प्रकारेण सत्ता की प्राप्ति…” और, प्रदेश से लेकर देश की सियासत में सत्ता तक पहुंचने के फार्मूले पर हर रोज हो रहे प्रयोग से आप और हम आंखें नहीं चुरा सकते।
भाजपा के लिए एक मजबूत गढ़ के तौर पर पहचान रखने वाले प्रदेश झारखंड से जब 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पांव उखड़ गये तो मोदी, अमित शाह के साथ संघ परिवार के होश भी फाख्ता हो गए। इन्हें समझ में नहीं आया कि तत्कालीन पार्टी के चेहरा रहे रघुवर दास ने गलतबयानी की या फिर सत्ता पर काबिज हुए महागठबंधन के युवा नेता हेमंत सोरेन ने कमाल दिखा दिया… क्यों और कैसे आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 में से महज 2 सीट पर भाजपा सिमट कर रह गई..? इस सवाल का जवाब भाजपा आज भी ढूंढ रही है और आगामी दिनों के लिए रास्ता तैयार करने की जुगत में लगी भी है। और, शायद यही वजह है कि न केवल झारखंड, बल्कि पड़ोस के आदिवासी पहचान वाले प्रदेश में भी सत्ता तक पहुंचने के रास्तों की तलाश में बीजेपी ने कमर कस लिया है। आने वाली सियासत का रास्ता तो बहुत कुछ हद तक उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा के चुनाव परिणाम ही तय करेंगें… भाजपा या फिर कांग्रेस, सहयोगी दलों की पिट्ठू बनकर बीजेपी के तिलस्म को धक्का देने में कितना मजबूत होती है?

बहरहाल, बात झारखंड की करें तो मतलब साफ है कि प्रदेश के सबसे बड़े आंदोलनकारी परिवार भगवान बिरसा मुंडा के नाम को भुनाने और बटर लगाने में न तो झारखंड मुक्ति मोर्चा और न ही भाजपा पीछे रहना चाहते हैं। अब सरकारी योजनाओं से भगवान के वंशजों को लाद देने के लिए प्रदेश से लेकर देश तक की सरकार आपस में दौड़ लगा रही है जो बेहद दिलचस्प है… तो, देखते रहिये, झारखंड में चल रही सियासत की इस बेहद खास दौड़ को।

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