समाचार प्लस
Breaking देश फीचर्ड न्यूज़ स्लाइडर

सफाईकर्मी गिद्धों की घटती संख्या ने पारसी समुदाय को डाला संकट में, अंतिम-संस्कार में हो रही दिक्कत

The decreasing number of scavenger vultures put the Parsi community in trouble

Vultures: ‘क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।।‘ इस दोहे का तात्पर्य है कि हमारा शरीर पांच तत्वों से मिल कर बना है। इतना ही नहीं, जीव की उत्पत्ति इन्हीं पांच तत्वों से हुई है और मृत्यु के उपरान्त ये पांचों तत्व अपने-अपने स्थान वापस चले जाते हैं। इन्हीं पंचतत्वों के ही इर्द-गिर्द विश्व की तमाम संस्कृतियों के अंतिम-संस्कार बंधे हैं। इन्हीं पंच तत्वों में ही विलीन होने की सोच के साथ अंतिम-संस्कार किये जाने की परम्पराएं विकसित हैं। भारतीय संस्कारों में अंतिम-संस्कार की पांच विधियां बतायी गयी हैं, जो पंच-तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। विश्व में फैली तमाम प्राचीन और नवीन संस्कृतियां शव को जलाकर, जल में प्रवाहित कर, दफना कर, गिद्धों के भोजन के लिए खुले में छोड़कर, ममीकरण कर और गुफा में छोड़कर अंतिम संस्कार सम्पन्न करती हैं। इन्हीं में खुले में शव को छोड़कर गिद्धों का भोजन बनाने का अंतिम संस्कार पारसी समुदाय में प्रचलित है।

पारसियों की अंतिम-संस्कार की ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’ परम्परा

भारत में पारसी धर्म के अनुयायी मृत शवों के निराकरण के लिए परंपरागत रूप से गिद्धों पर निर्भर करते हैं। इसलिए, सदियों से भारत के गिद्ध पारसी धर्म के लोगों के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवा प्रदान कर रहे हैं। पारसी समुदाय में शवों के निराकरण को ‘आकाश में दफन’ करने की परम्परा माना जाता है जो ‘टावर ऑफ साइलेंस’ के नाम से विख्यात है। इस तरह के अंतिम संस्कार में शव को एक निर्धारित ऊंचे स्थान पर खुला छोड़ दिया जाता है, जिन्हें गिद्ध अपना आहार बना लेते हैं। सदियों से पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार की यही परम्परा प्रचलित है। लेकिन पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने के कारण गिद्धों की संख्या घटी है, जिसके कारण पारसी समुदाय के सामने इस तरह से अंतिम संस्कार करने पर समस्या उत्पन्न हो गयी है। जिससे पारसी समुदाय को अंतिम-संस्कार का तरीका बदलने लगा है।

उद्योगपति साइरस मिस्त्री के अंतिम-सस्कार से उपजे सवाल

पारसी समुदाय की अंतिम संस्कार की विधि ‘टॉवर ऑफ साइलेंस’ फिर से एक बार चर्चा में है। हाल में कार दुर्घटना में विख्यात उद्योगपति सायरस मिस्त्री की मौत और उनके अंतिम संस्कार ने इस परम्परा पर आये संकट को एक बार फिर उजागर किया है। देश में एक प्रतिशत से भी कम पारसी समुदाय की संख्या है। पारसी समुदाय के लोगों की संख्या में भी तेजी से गिरावट आ रही है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में केवल 57,264 पारसी थे। पारसी समुदाय में इसी तरह से अंतिम-संस्कार की परम्परा प्रचलित है। गिद्धों की घटती आबादी के चलते पारसी समुदाय को शवों के अंतिम संस्कार के तरीकों में बदलाव करना पड़ा है। इसीलिए टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री का अंतिम-संस्कार पारम्परिक रस्मों को निभाने के बाद मुम्बई स्थित इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में किया गया है।

गिद्धों की घटती संख्या से पर्यावरणीय और सामाजिक परम्परा पर संकट

गिद्ध पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी हैं। ये मृत और सड़ रहे पशुओं के शवों को अपना भोजन बना कर पर्यावरण को साफ रखने में अपना योगदान करते हैं। ऐसा होने से मिट्टी में खनिजों की वापसी की प्रक्रिया भी जारी रहती है। यही नहीं, मृत शवों को समाप्त करके गिद्ध संक्रामक बीमारियों को फैलने से भी बचाते हैं। गिद्धों की अनुपस्थिति में मूषक और आवारा कुत्तों जैसे पशुओं द्वारा रेबीज जैसी बीमारी के प्रसार को बढ़ाने की संभावना बढ़ी है। इसे हाल के वर्षों में कोरोना के साथ कई अन्य वायरसों के हुए प्रसार से अच्छी तरह समझा जा सकता है। लेकिन समाज को कई तरह से बचाने वाले गिद्धों को ‘हमने’ बचने नहीं दिया। रिपोर्ट के अनुसार, 1980 के दशक में गिद्धों की आबादी अच्छी-खासी थी। बताया जाता है कि उस समय देश में गिद्धों की संख्या 4 करोड़ थी, लेकिन 2017 आते-आते तक घटकर 19,000 रह गई।

इसी गिद्धों की घटती हुई संख्या ने पारसी समुदाय को अंतिम-संस्कार का तरीका बदलने को विवश कर दिया है। गिद्धों की आबादी के घटने के कई कारण है। इनमें मवेशियों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली सूजन-रोधी दवा ‘डाइक्लोफेनाक’ जिम्मेदार है। इसका कारण यह बताया गया है कि यह दवा दिये जाने के बाद पशुओं के गुर्दे लम्बे समय तक दवा के अंश को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाते। इसलिए मृत्यु के बाद भी यह पशुओं के शरीर में मौजूद रहता है। चूंकि गिद्ध मुर्दाखोर होते हैं और इसलिए वे मृत पशुओं के शवों को भोजन के तौर पर ग्रहण तो कर लेते हैं। लेकिन डिक्लोफेनाक संदूषित मांस का सेवन करने के बाद उनके गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं और उनकी मौत हो जाती है। इसी कारण गिद्धों की आबादी देशभर में प्रभावित हुई। है। हालांकि साल 2006 में इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन तब तक यह दवा अपना विनाशकारी प्रभाव गिद्धों पर दिखा चुकी थी। गिद्धों की घटती आबादी ने पर्यावरण की स्वच्छता के लिए बड़ा खतरा तो बन ही गयी है, पारसियों के लिए भी एक विकट चुनौती पेश की है। गिद्ध जहां कुछ ही घंटे में ही शरीर का मांस साफ कर देते हैं, वहीं कौवे और चील बहुत कम मांस खा पाते हैं, जिसके चलते कई शवों को खत्म होने में महीनों लग जाते हैं। सरकार ने गिद्धों की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए राष्ट्रीय गिद्ध संरक्षण कार्य योजना 2020-25 के माध्यम से एक पहल शुरू की है, हालांकि इसके परिणाम आने अभी बाकी हैं।

यह भी पढ़ें: एशिया कप: अब पाकिस्तान दोनों मैच हारे तो कुछ बात बने, भारत के फाइनल में पहुंचने का गणित हो चुका है टेढ़ा

Related posts

Happy Kiss Day: छू लेने दो नाज़ुक होंठों को… फोरहेड से फ्रेंच तक, हर Kiss का है अलग मतलब

Manoj Singh

दलीय आधार पर नगर निगम चुनाव करा लें CM, पता चल जाएगा जनाधार – दीपक प्रकाश

Manoj Singh

अमित शाह को ‘हत्यारा’ कहने वाले मामले में राहुल गांधी को झारखंड हाई कोर्ट से राहत

Pramod Kumar