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अपनी ‘बेरोजगारी’ से याद आयी देश की बेरोजगारी, खुद कभी रोजगार को न समझ सकी कांग्रेस समझा रही बेरोजगारी की परिभाषा

The country's unemployment was remembered by its 'unemployment', Congress is explaining unemployment

किसकी सरकार में सबसे ज्यादा रही बेरोजगारी दर, तीन दशकों की हकीकत

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

देश में ‘बेरोजगार’ हो चुकी कांग्रेस आज देश को बेरोजगारी की परिभाषा समझाने निकली है। बहाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन है। कांग्रेस प्रतीकात्मक रूप से ही सही देश में बेरोजगारी दिवस मना रही है। कांग्रेस के अनुसार देश में कोविड के पहले ही 45 वर्षों में सबसे शीर्ष स्तर पर बेरोज़गारी पहुंच गयी थी और इस समय बेरोज़गारी एक साल में सबसे ऊपर 8.3 प्रतिशत के स्तर पर है। ये आंकड़े कहां से कांग्रेस को प्राप्त हुए हैं, यह तो वही जाने लेकिन 2020-21 में नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस के आखिरी बेरोजगारी सर्व में देश की बेरोजगारी दर सबसे कम 4.6 है।

कांग्रेस यह भी कह रही है कि पीएम मोदी से आशा थी कि उनके वादे के मुताबिक 8 साल में 16 करोड़ नौकरियां मिल जानी चाहिए थीं। लेकिन इन 8 वर्षों में नौकरी के आवेदन आए 22 करोड़ और रोज़गार मात्र 7 लाख लोगों को मिले। बेरोज़गारी की मार तो सबसे ज़्यादा महिलाओं पर पड़ी है। कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी 26 प्रतिशत से गिरकर 15 प्रतिशत पर चली गयी है।

कांग्रेस से ही नहीं, तमाम विपक्षी पार्टियों यहां तक कि खुद भाजपा से भी यह सवाल है कि वे रोजगार से तात्पर्य क्या निकालती हैं। क्या रोजगार का मतलब सरकारी नौकरी है? अगर रोजगार का मतलब सचमुच सरकारी नौकरी है तो भारत ही नहीं, विश्व के तमाम अपने देश के कितने प्रतिशत लोगों को सरकारी नौकरी दें कि उन्हें बेरोजगार देश नहीं माना जाये। भारत में लम्बे समय तक राज करने वाली कांग्रेस भी तो मनरेगा या उस जैसी कई योजनाओं में अस्थायी रोजगार देकर उन्हें ‘बेरोजगार नहीं’ होना मान लेती थी। बेरोजगारी की समस्या तो उसके राज में भी खूब रही है।

आजाद देश की कुछ सच्चाइयां

इस समस्या पर लम्बी चर्चा करने से बेहतर है कि देश की कुछ सच्चाइयों को जान लिया जाये ताकि विरोध की सच्चाई को अच्छी तरह से समझा जा सके-

जनसंख्या

1947 – 34 करोड़ (अनुमानित)

1951 – 36.10 करोड़ (देश में पहली बार हुई जनगणना)

1971 – 54.81 करोड़

1991 – 84.64 करोड़

2011 – 121.08 करोड़

2022 – 127.29 करोड़ (अनुमानित)

प्रति व्यक्ति सालाना आमदनी

1950-51 – 127 रुपये

1970-71 – 823 रुपये

1990-91 –  6,270 रुपये

2010-11 – 58,534 रुपये

2021-22 – 1,50,326 रुपये

गरीबी रेखा से नीचे आबादी

1947 – 25 करोड़ (80%)

1956-57 – 21.5 करोड़ (65%)

1987-88 – 30.70 करोड़ (39%)

2004-05 – 40.72 करोड़ (37%)

2011-12 – 26.97 करोड़ (22%)

2021-22 – 27.00 करोड़ (21.9%)

बेरोजगारी दर

1972-73 – 8.35% (नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस द्वारा पहला सर्वे)

1993-94 – 6.06%

2004-2005 – 8.28%

2020-21 – 4.20% (नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस आखिरी सर्वे)

जो समस्याएं हैं, उससे नजरें नहीं चुराई जा सकतीं। समस्याएं हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन समस्याओं का समाधान निकालने का प्रयास बिलकुल न किया जाये तब उसे गलत माना जा सकता है। देश में बेरोजगारी की तस्वीर का स्वरूप अलग-अलग काल में अलग-अलग रहा है। आजादी के बाद देश में अवसरों की काफी कमी थी। खेती और दुकान ही रोजगार के साधन थे, समय के साथ रोजगार के अवसर बढ़े हैं और यह क्रम आज भी जारी है। इस प्रयास को पीछे ढकेलने में जनसंख्या सबसे बड़ी सहायक है। हर पार्टी महंगाई, बेरोजगारी खत्म करने का आज सिर्फ ढोंग ही करती है, जनसंख्या कम करने के सवाल पर मौन हो जाती है, क्योंकि जनसंख्या बढ़ेगी तो उनके वोटर बढ़ेंगे। हर पार्टी देश की समस्याओं के निराकरण के लिए ईमानदार हैं तो वे देश की जनसंख्या पर कैसे नियंत्रण लगे, इस पर उतनी ही ईमानदारी से प्रयास भी करें तब समझा जायेगा कि देश के वे सच्चे हितैषी हैं।

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