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सत्ता के लिए आपस में भिड़ गये तालिबानी-हक्कानी, चली गोली, अब्दुल गनी बरादर घायल

सत्ता के लिए आपस में भिड़ गये तालिबानी-हक्कानी, चली गोली, अब्दुल गनी बरादर घायल

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

तालिबान का अफगानिस्तान (पंजशीर को छोड़कर) पर कब्जा हो गया, अमेरिकी सेना भी वापस चली गयी, लेकिन अफगानिस्तान में सरकार गठन सन्नी देओल का डायलॉग हो गया है- ‘तारीख पर तारीख’। सरकार न बन पाने की वजह यहां ‘गण’ तंत्र नहीं, ’गन’ तंत्र का है। तभी तो सरकार गठन के सवाल पर गोलियां चल गयी हैं। जी हां, अफगानिस्तान में सत्ता की कुर्सी को लेकर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क आपस में ही भिड़ गये हैं। अफगानिस्तान की वेबसाइट ‘पंजशीर ऑब्जर्वर’ की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान के सह-संस्थापक अब्दुल गनी बरादर और हक्कानी गुट के बीच खूनी झड़प हुई है और, इस झड़प में अब्दुल गनी बरादर को गोली लगी है।

तालिबान का ‘ताव’ और ‘हक्कानी’ का हक नहीं बनने दे रहा सरकार

तालिबान और हक्कानी गुट में छिड़ा सत्ता संघर्ष ही अफगानिस्तान में सरकार नहीं बनने दे रहा है। अब तो यह सत्ता संघर्ष हिंसा में भी तब्दील हो गया है। अफगानिस्तान की वेबसाइट ‘पंजशीर ऑब्जर्वर’ ने हक्कानी गुट के कुछ नेताओं और तालिबान के सह-संस्थापक अब्दुल गनी बरादर उर्फ मुल्ला बरादर के बीच गोलीबारी की रिपोर्ट छापकर इस खबर की पुष्टि भी कर दी ‘पंजशीर ऑब्जर्वर’ के मुताबिक अनस हक्कानी की गोली से मुल्ला बरादर घायल हो गया है, जिसका इलाज पाकिस्तान में चल रहा है। गोली हक्कानी गुट की ओर से चलायी गयी थी।

रक्षामंत्री समेत कई अहम पद चाहता है हक्कानी

तालिबान राज में हक्कानी रक्षामंत्री समेत कई महत्वपूर्ण पदों की मांग कर रहा है। इसी रार के कारण अफगानिस्तान में सरकार के गठन में देरी हो रही है। बंदरों की लड़ाई के बीच में आयी बिल्ली की तरह तालिबान और हक्कानी गुट में बढ़ते विवाद को खत्म कराने के लिए पाकिस्तान ने आईएसआई चीफ लेफ्टीनेंट जनरल फैज हमीद को काबुल भेजा, लेकिन विवाद नहीं सुलझा। यह विवाद सुलझाना आईएसआई के वश में है भी नहीं। क्योंकि जो बात सारी दुनिया जानती है, वह तालिबान को पता न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। हक्कानी आईएसआई का पसंदीदा गुट है। इसलिए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अपनी पसंद के हक्कानी गुट के जरिये आईएसआई तालिबान सरकार पर अपना वर्चस्व बनाना चाहता है।

पाकिस्तानी हरकतों पर पीएम मोदी की है नजर

ऐसा नहीं कि मोदी सरकार अफगानिस्तान में तालिबान राज में चल रही पाकिस्तान हरकतों पर मूक दर्शक बनी हुई है। पीएम मोदी ‘इंतजार करो’ की नीति पर भले चल रहे हैं, साथ-साथ रणनीतिक चालें भी चल रहे हैं। तालिबान पर कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समेत कई मुस्लिम व खाड़ी देशों से लगातार बातचीत कर रहा है। अमेरिका, रूस सहित अन्य प्रभावशाली देशों के भी भारत संपर्क में है। भारत का प्रयास यही है कि अफगानिस्तान में आकार लेने वाली तालिबान की नयी सरकार में सभी समूहों को प्रतिनिधित्व हो और इसमें पाकिस्तान का असर कम से कम हो। मोदी सरकार कतई नहीं चाहती कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान की आईएसआई के छद्म नेतृत्व तले कठपुतली सरकार बने। भारत के हक में अच्छी बात यह है कि तालिबान पर मुस्लिम देशों में भी एका नहीं हैं। इस्लामिक कानूनों के नाम पर कट्टरपंथ को लेकर इनकी राय अलग-अलग है।

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