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स्वामी स्वरूपानंद जी को श्रद्धांजलि: आजादी की लड़ाई भी लड़ी और जेल भी गए, क्रांतिकारी से ऐसे बने शंकराचार्य

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विश्व के सबसे बड़े धर्म प्रवर्तकों में एक द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद (Swaroopanand Saraswati) जिन्होंने जीवन पर्यन्त सनातन धर्म की रक्षा और उसके विस्तार का प्रयास किया, अपने ओजस्वी वाणी के माध्यम से सनातन धर्म का संदेश जन जन तक घर-घर तक पहुंचाया, का निधन रविवार को हो गया। स्वामी स्वरूपानंद (Swaroopanand Saraswati) की उम्र 99 साल थी। उन्होंने मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में आखिरी सांस ली।

मध्य प्रदेश में सिवनी जिले में हुआ था जन्म 

मध्य प्रदेश में सिवनी जिले के छोटे से गांव दिघोरी में दो सितंबर 1924 को जन्मे स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती के माता पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा था। महज नौ साल की उम्र में ही स्वामी स्वरूपानंद ने घर छोड़ दिया और आध्यात्मिक यात्रा शुरू कर दी। स्वामी स्वरुपानंद कम उम्र में घर छोड़कर वह काशी आ गए और यहां वेद की शिक्षा हासिल की। देश की आजादी के लिए उन्होंने लड़ाई भी लड़ी।देश के तमाम हिंदू तीर्थ स्थलों का भ्रमण करने के बाद वह काशी (वाराणसी) पहुंचे। यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज से वेद-वेदांग, शास्त्रों और धर्म की शिक्षा ग्रहण की।

अंग्रेजों के खिलाफ  चलायी थी मुहिम

वर्ष 1947 में देश आजाद तो हो गया,  लेकिन कुरीतियों का बोलबाला और धर्म पर संकट छाया रहा था। इसे देखते हुए वर्ष 1948 में स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा स्थापित पार्टी अखिल भारतीय रामराज्य परिषद की कमान संभाली। इसमें रामराज्य लाने का प्रयास तो था ही हिंदुओं को उनके राजनैतिक अस्तित्व का बोध कराने का उद्देश्य भी समाहित था। साल 1942 की बात है। तब स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की उम्र महज 19 साल थी। उस वक्त पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का आंदोलन चल रहा था। स्वामी स्वरूपानंद भी इसमें शामिल हुए। उन्होंने आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम चलाई। तब स्वामी स्वरूपानंद क्रांतिकारी साधु के रुप में प्रसिद्ध हुए थे। अंग्रेजों के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए उन्हें पहले वाराणसी की जेल में नौ महीने और फिर मध्य प्रदेश की जेल में छह महीने रहना पड़ा। इस दौरान वह करपात्री महाराज के राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी रहे।

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राम मंदिर, गंगा मुक्ति, रामसेतु समेत विभिन्न मुद्दों को  नेतृत्व दिया 

1950 में ज्योतिष्पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती की शरण में आए। 1950 में स्वामी स्वरूपानंद दंडी संन्यासी बनाये गए। शास्त्रों के अनुसार दंडी संन्यासी केवल ब्राह्मण ही बन सकते हैं। दंडी संन्यासी को गृहस्थ जीवन से दूर रहना पड़ता है। उस दौरान उन्होंने ज्योतिषपीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-संन्यास की दीक्षा ली थी। इसके बाद से ही उनकी पहचान स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती के रूप में हुई। 1981 में स्वामी स्वरूपानंद को शंकराचार्य की उपाधि मिली। शंकराचार्य स्वरूपानंद ने राम मंदिर, गंगा मुक्ति, रामसेतु समेत विभिन्न मुद्दों का नेतृत्व किया।

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शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को नेहरु-गांधी परिवार का काफी करीबी माना जाता था।  इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तक स्वामी स्वरूपानंद का आशीर्वाद ले चुके हैं। अक्सर गांधी परिवार स्वामी स्वरूपानंद के दर्शन के लिए मध्य प्रदेश जाता रहता था।

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