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Survey: अलोकप्रिय हो चुके हैं बिहार के सीएम नीतीश कुमार! क्यों देख रहे पीएम बनने का सपना?

Bihar CM Nitish

Bihar CM Nitish: नीतीश कुमार को ‘अपनी ही सोच की राजनीति’ भले पसन्द हो, लेकिन उनकी यह सोच जनता को कम पसन्द आने लगी है। ‘पलटू राम’ का तमगा नीतीश कुमार को भले पसन्द आ रहा हो, लेकिन लोगों को बार-बार राजनीतिक साथी बदलने की उनकी सोच बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है। लोगों में उनकी एक ही छवि बन रही है कि सत्ता में बने रहने के अलावा उनकी कोई ‘एक राजनीतिक सोच’ नहीं है। सभी जानते हैं कि भाजपा और राजद दो अलग-अलग ध्रुवों पर चलने वाली पार्टियां हैं। जदयू का भी तो कोई राजनीतिक सिद्धांत है, ऐसे में नीतीश कुमार ही जवाब दें कि उनकी पार्टी की जो विचारधारा है, उसके हिसाब से वह कुछ-कुछ दिनों में ‘क्षणैः रुष्टा क्षणैः तुष्टा, रुष्टा तुष्टा क्षणैः क्षणैः’ कैसे हो जा रहे हैं।

21 महीना पहले जब बिहार विधानसभा चुनाव हुए थे तब जनता ने किसी को स्पष्ट जनादेश नहीं दिया था, फिर भी अगर एक पार्टी की बात करें तो तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद को जनता का प्यार सबसे ज्यादा मिला था। उस लिहाज से उस समय ही नहीं, आज भी सत्ता पर पहला अधिकार राजद का ही है। जब भाजपा के सहयोग से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उन्हें बड़ा अच्छा लगा। आज जब उन्होंने पाला बदल लिया तो किस हक से वह मुख्यमंत्री बने रहना स्वीकार कर रहे हैं, उन्होंने भाजपा का हाथ झटका, चलिए यह तो ठीक है, लेकिन ताज तो उन्हें अपने सर पर नहीं रखना चाहिए था। अगर उनकी राजनीतिक नीयत पाक-साफ है तो उन्हें यह ताज तेजस्वी के माथे धरना चाहिए था।  नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते गठबंधन की सरकार में रहना राजद और कांग्रेस को लिए गलत नहीं है। उन्होंने नीतीश को ही मुख्यमंत्री स्वीकार किया तो इसमें इन दोनों पार्टियों को उतना दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि ये दोनों पार्टियां राजनीति से दूर थीं, और ‘बिल्ली के भाग में छींका टूटने’ की तरह सत्ता इनकी झोली में आ गिरी। इसलिए जो मिल रहा है, उनके लिए यही बहुत है, इनकी ओर  ज्यादा हील-हुज्जत का नहीं किया जाना समझा जा सकता है। मगर ‘स्वार्थी’ तो नीतीश कुमार निकले।

नीतीश कुमार खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार देखते हैं। अगर उनके सपने बड़े हैं, तो राजनीति में अपना कद भी बड़ा करते। बार-बार की ‘उछलकूद’ से वह अपनी लोकप्रियता ही खो रहे हैं। उनसे अच्छी तो पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी हैं, जो तमाम आलोचनाओं के बावजूद अपने दृढ़ निश्चयों से नहीं डिगतीं। अपने प्रतिद्वन्द्वियों पर उसी तरह आक्रामक रहती हैं। लेकिन नीतीश कुमार तो मन में कुंठा पाल कर जीते रहे हैं और आगे भी इसी तरह जियेंगे।

यह निश्चित है कि महागठबंधन में बनने वाली नीतीश कुमार की सरकार पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत होगी, अगर कमजोर कोई होगा तो वह हैं खुद नीतीश कुमार। पूरे देश की बात छोड़ दीजिए, बिहार की आम जनता को ही वह कम पसंद आने लगे हैं। उनके मुकाबले युवा नेता तेजस्वी यादव को लोग ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। हिंदी न्यूज चैनल ‘एबीपी न्यूज और सी-वोटर’ की सर्वे रिपोर्ट भी यही कहती है। बिहार के ताजा घटनाक्रम पर ताजा सर्वे नीतीश कुमार को अपना पसंदीदा मुख्यमंत्री नहीं मानता। इस सर्वे में करीब 56 फीसदी लोगों ने नीतीश कुमार की जगह आरजेडी नेता और लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव को सीएम पद की पसंद बताया। नीतीश कुमार को 44 फीसदी लोगों ने सीएम पद के लिए ठीक बताया। सर्वे रिपोर्ट भले ही ताजा है, और नीतीश कुमार को नापसंद करने वालों की बढ़ी संख्या बता रही है, की उनकी लोकप्रियता तो पहले से ही घटने लगी है। उनकी यह अलोकप्रियता भाजपा के साथ रहने के कारण नहीं है। राजद के साथ सरकार में रहते हुए भी थी और राजद के साथ बने रहने पर भी रहेगी। जब नीतीश अपने बिहार के लोगों को ही पसंद नहीं हैं। उनकी पार्टी की बिहार के बाहर कोई पहचान नहीं है, तो किस बूते वह देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। राजनीति में हर कोई अपने आप को ‘शेर’ समझता है, शायद वह भी समझ रहे हों।

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