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Shahadat Divas:  ‘मैं रहूं या ना रहूं’! लौह महिला इंदिरा गांधी का वह आखिरी दिन!

Indira Gahdhi

न्यूज डेस्क/ समाचार डेस्क – झारखंड-बिहार

एक जनसभा में इंदिरा गांधी बोलीं थीं- ‘मैं आज यहां हूं। कल शायद यहां न रहूं. मुझे चिंता नहीं, मैं रहूं या न रहूं। मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा।’

31 अक्तूबर, 1984 का वह मनसूह दिन, इंदिरा गांधी के जीवन का आखिरी दिन था। लौह महिला और भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ‘ब्लू स्टार ऑपरेशन’ की बलि वेदी की भेंट चढ़ा दी गयीं। इंदिरा अपने सिद्धांतों के प्रति हमेशा अटल रहने वाली महिला थीं, तभी जब उन्हें अपनी सुरक्षा से जुड़ी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट मिली तो वह काफी नाराज हुईं और उन्होंने फाइल पर ‘आरंट वी सेकुलर?’ लिखकर अपने गुस्से का इजहार किया था। दरअसल, फाइल में यह सलाह दी गयी थी कि प्रधानमंत्री के आवास से सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को हटा लिया जाये। हालांकि इसके बाद इतनी व्यवस्था कर दी गयी थी कि इंदिरा गांधी की सुरक्षा में दो सिख सुरक्षाकर्मियों को एक साथ न रखा जाये। देश की शीर्ष हस्तियों की सुरक्षा में भी बड़ी चूकें होती हैं, इंदिरा गांधी की हत्या इसका एक बड़ा उदाहरण है। जिस दिन ने इंदिरा गांधी को हमसे छीन लिया, सिर्फ उस दिन जितनी गलतियां सामने आयीं, वह यह बताने के लिए काफी है कि इस घटना को होने से रोका जा सकता था।

बता दें, 31 अक्तूबर के दिन इंदिरा गांधी की सुरक्षा में दो सिख सुरक्षाकर्मी साथ थे। सतवंत सिंह ने बहाना किया था कि उसका पेट खराब है। इसलिए उसे शौचालय के नजदीक तैनात किया जाये। अगर सतवंत सिंह को ड्यूटी दे ही दी गयी थी, फिर बेअंत सिंह को ड्यूटी पर रखने की क्या जरूरत थी? दोनों उस दिन साथ रहे, योजना तो पहले से तैयार थी और दोनों इंदिरा गांधी से ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ का बदला ले लिया।

वह मनहूस सुबह

उस दिन सुबह साढ़े सात बजे तक इंदिरा गांधी तैयार हो चुकी थीं। केसरिया रंग की साड़ी पहने हुए। शायद नियति ने पहले से तय कर रखा था कि देश की सच्ची सपूत को अपने रंग में रंगने से पहले ही उस रंग में उन्हें रंग दिया था। नौ बजकर 10 मिनट पर जब इंदिरा गांधी बाहर आयीं तो खुशनुमा धूप खिली हुई थी। उन्हें धूप से बचाने के लिए सिपाही नारायण सिंह छाता लेकर साथ चल रहे थे। उनसे कुछ कदम पीछे आरके धवन और निजी सेवक नाथू राम थे। धवन उन्हें एक कार्यक्रम की रूपरेखा समझा रहे थे। ये बातें हो ही रही थीं कि अचानक वहां तैनात सुरक्षाकर्मी बेअंत सिंह ने अपनी रिवॉल्वर निकालकर इंदिरा गांधी पर फायर कर दिया। गोली उनके पेट में लगी। इसके बाद बेअंत ने प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से दो और फायर किये। ये गोलियां उनकी बगल, सीने और कमर में घुस गयीं। तब तक सतवंत सिंह अपनी टॉमसन ऑटोमैटिक कारबाइन के साथ पास खड़ा था। इंदिरा गांधी को गिरते हुए देख वह इतनी दहशत में आ गया कि अपनी जगह से हिला तक नहीं। तभी बेअंत ने चिल्लाकर कहा- गोली चलाओ। इसके बाद सतवंत ने तुरंत अपनी ऑटोमैटिक कारबाइन की सभी गोलियां इंदिरा गांधी के शरीर के अंदर डाल दीं।

इंदिरा गांधी को नीचे गिरता देख रामेश्वर दयाल ने उनकी ओर दौड़ लगायी।  लेकिन सतवंत की गोलियां उनकी जांघ और पैर में लगीं और वह वहीं ढेर हो गये।

इसके बाद वहां कोहराम मच गया। सभी एक दूसरे को आदेश देते नजर आने लगे। बेअंत सिंह और सतवंत सिंह दोनों ने अपने हथियार नीचे डाल दिए। बेअंत सिंह ने कहा, “हमें जो कुछ करना था हमने कर दिया। अब तुम्हें जो कुछ करना हो तुम करो।” दोनों हमलावरों को गार्ड रूम से निकले आईटीबीपी के जवानों ने अपने घेरे में ले लिया। इसके बाद इंदिरा गांधी को अस्पताल एम्स पहुंचाया गया। वहां डॉक्टरों ने नाउम्मीद होने के बाद भी इंदिरा गांधी को बचाने का प्रयास किया। मगर…

एम्स में जिंदगी बचाने की जंग

फोन कर एम्स के वरिष्ठ कार्डियॉलॉजिस्ट को इसकी सूचना दी गयी। मिनटों में वहां डॉक्टर गुलेरिया, डॉक्टर एमएम कपूर और डॉक्टर एस बालाराम पहुंच गये। एलेक्ट्रोकार्डियाग्राम में इंदिरा के दिल की मामूली गतिविधि दिखाई दे रही थी, लेकिन नाड़ी में कोई धड़कन नहीं मिल रही थी। उनकी आंखों की पुतलियां फैली हुई थीं, जो संकेत था कि उनके दिमाग को क्षति पहुंची है। इंदिरा को 80 बोतल खून चढ़ाया गया जो उनके शरीर की सामान्य खून मात्रा का पांच गुना था।

डॉक्टर गुलेरिया बताते हैं, “मुझे तो देखते ही लग गया था कि वह इस दुनिया से जा चुकी हैं। उसके बाद हमने इसकी पुष्टि के लिए ईसीजी किया। फिर मैंने वहां मौजूद स्वास्थ्य मंत्री शंकरानंद से पूछा कि अब क्या करना है? क्या हम उन्हें मृत घोषित कर दें? उन्होंने कहा- नहीं। फिर हम उन्हें ऑपरेशन थियेटर में ले गये।”

ये साफ था कि इंदिरा इस दुनिया से जा चुकी थीं, लेकिन तब भी उन्हें एम्स की आठवीं मंजिल स्थित ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया। डॉक्टरों ने देखा कि गोलियों ने उनके लीवर के दाहिने हिस्से को छलनी कर दिया था, उनकी बड़ी आंत में कम से कम बारह छेद हो गये थे और छोटी आंत को भी काफी क्षति पहुंची थी। उनके एक फेफड़े में भी गोली लगी थी और रीढ़ की हड्डी भी गोलियों के असर से टूट गई थी। सिर्फ उनका हृदय सही सलामत था। अपने अंगरक्षकों द्वारा गोली मारे जाने के लगभग चार घंटे बाद दो बजकर 23 मिनट पर इंदिरा गांधी को मृत घोषित किया गया।

लापरवाहियां जो दिखीं
  1. 31 अक्टूबर, 1984 के दिन की घटना हो जाने के लिए जो लापरवाहियां नजर आयीं, उनमें सबसे बड़ी लापरवाही बेअंत सिंह और सतवंत सिंह, दो सिख सुरक्षाकर्मियों की एक साथ ड्यूटी रही है, जबकि खुफिया एजेंसियों की ‘सिख सुरक्षाकर्मियों को हटा लेने’ की चेतावनी के बाद, दो सिख सुरक्षाकर्मियों को एक साथ ड्यूटी न देने की व्यवस्था कर दी गयी थी। उस दिन की विवशता के बाद भी, दो सिख सुरक्षाकर्मियों को एक साथ ड्यूटी देने से बचा जा सकता था।
  2. प्रधानमंत्री के आवास पर हर समय एक एंबुलेंस खड़ी रहती थी, लेकिन उस दिन उसका ड्राइवर वहां से नदारद था। क्या प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था इतनी तंग है कि एक ड्राइवर न रहे तो दूसरा ड्राइवर की व्यवस्था न हो सके? राजनीतिक सलाहकार माखनलाल फोतेदार फोतेदार ने कार से इंदिरा गांधी को अस्पताल पहुंचवाया।
  3. एक, सफदरजंग रोड से किसी ने भी एम्स को फोन कर नहीं बताया था कि इंदिरा गांधी को गंभीर रूप से घायल अवस्था में वहां लाया जा रहा है। यह कैसे सम्भव हुआ?
  4. इमरजेंसी वार्ड का गेट खोलने और इंदिरा को कार से उतारने में तीन मिनट लग गये। वहां पर एक स्ट्रेचर तक मौजूद नहीं था। किसी तरह एक पहिए वाले स्ट्रेचर का इंतेजाम किया गया। जब उनको कार से उतारा गया तो इंदिरा को इस हालत में देखकर वहां तैनात डॉक्टर घबरा गए।
  5. एक गलती तो खुद इंदिरा गांधी ने की, उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों की बात नहीं मानी। काश, उन्होंने खुफिया एजेंसियों की बात मान ली होती….!

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