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शिव को प्रिय है सावन, मात्र जल-अर्पण से ही प्रसन्न हो जाते हैं भगवान भोलेनाथ

Savan is dear to Shiva, Lord Bholenath becomes happy only by offering water.

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज बुधवार को गुरु पूर्णिमा है। भारतीय परम्पराओं में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। ऋषि व्यास से जुड़ा यह दिन गुरुओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का दिन है। भारत में विभिन्न समुदाय गुरु पूर्णिमा को अलग-अलग रूपों में मनाते है। गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे आखिर मान्यता क्या है? चूंकि व्यास ऋषि चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे और आज उनकी जयंती है, इसलिए आज उनकी पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यास जी ही थे। अत: वे हमारे ‘आदिगुरु’ हुए। उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए हम गुरुओं को व्यासजी का अंश मानकर उनकी पूजा की जाती है।

यह कैसा संयोग है कि गुरु पूर्णिमा के दूसरे दिन से श्रावण मास की शुरुआत होती है। यह पूरा महीना उन्हें समर्पित है जो समस्त प्राणियों के गुरु हैं। शिव ही सबके गुरु हैं। सभी गुरुओं के गुरु हैं। बता दें, आज रात 12.08 बजे के बाद से श्रावण मास की शुरुआत हो रही है। श्रावण मास भगवान भोलेनाथ का सबसे प्रिय महीना है। देवाधिदेव भोलेनाथ ऐसे देव हैं जो विशेष पूजा के बगैर भी शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। शिव मात्र जलार्पण करने से ही खुश हो जाते हैं। वैसे तो भारत में सालों भर पर्वों का मेला लगा रहता है, लेकिन श्रावण मास ही ऐसा महीना है जब पूरे एक मासभर किसी एक देव की पूजा की जाती है। इसलिए श्रावण मास का हर दिन महत्वपूर्ण है, लेकिन श्रावण मास में सोमवार का विशेष महत्व है। श्रावण मास में भगवान भोलेनाथ का पूजन-अर्चन करने तथा जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, जप इत्यादि का विशेष फल है। जलार्पण के साथ बिल्वपत्र एवं दूध-दही, घी, शहद, गन्ने का रस इत्यादि से भोलेनाथ का अभिषेक करने से  भोलेनाथ उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

सावन में शिव को जलार्पण क्यों प्रिय

मान्यता है जब समुद्र मन्थन हुआ तब उससे निकले हलाहल विष से सृष्टि जलने लगी तब भगवान भोलेनाथ ने इसका पान कर इसे अपने गले में धारण कर लिया था। शिवजी इसके बाद जलन से व्याकुल हो उठे। तब सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया। जिससे हलाहल विष के प्रभाव से शिवजी को शांति मिली। इसी कारण भगवान शिव को जलाभिषेक करने का विशेष महत्व है।

एक पौराणिक मान्‍यता यह भी है कि भगवान शिव और माता सती का पुर्नमिलन इसी महीने में हुआ था। इसलिए भगवान शिव को सावन का महीना बेहद प्रिय है। पौराणिक कथा है कि राजा दक्ष की पुत्री माता सती ने एक शाप की वजह से अपने जीवन को त्‍याग कर कई वर्षों तक शापित जीवन व्यतीत किया था। उसके बाद अगले जन्‍म में हिमालय पुत्री पार्वती के रूप में उनका जन्‍म हुआ। पार्वतीजी ने पिछले जन्‍म के पति भगवान शिव को पाने के लिए सावन के महीने में कठोर तप किया। इससे प्रसन्‍न होकर भगवान शिव ने उनकी मनोकामना पूरी की और उन्‍हें पत्‍नी का स्‍थान दिया था।

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