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Parliament में हंगामा : लोकतंत्र की तस्वीर को तार- तार करने से बाज नहीं आते माननीय, जनता की भावनाओं और देश के पैसे से होता है खिलवाड़

हमारे देश में संसदीय कार्यवाही का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। हमारे माननीय लोकतंत्र की तस्वीर को तार- तार करने से बाज नहीं आ रहे। चाहे वह Parliament house का लोकसभा या राज्यसभा का सदन हो या फिर राज्यों के विधान सभा के सदन, सत्र के दौरान सांसद, विधायकों को लोकतंत्र की गरिमा को तार-तार करते देखा जाता है।  संसद में हंगामा गाली-गलौज करने से उनके विरुद्ध अदालती कार्रवाई नहीं हो सकती इसलिए जो चाहे बोलते हैं और टीवी पर मनोरंजन का साधन बन जाते हैं। संसद में तर्क-वितर्क तो होने ही चाहिए लेकिन अब कुतर्क अधिक होते हैं। कई बार हंगामा प्रश्नकाल में होता है तो कई बार किसी विधेयक पर चर्चा के दौरान होता है। कई बार संसद परिसर के अंदर अलग-अलग मुद्दों पर विपक्ष का धरना प्रदर्शन भी होता है।

स्थगित करनी पड़ती है कार्यवाही 

अक्सर देखा गया है कि दूसरे देशों के प्रतिनिधियों के सामने ही सांसद अभद्र भाषा से लेकर कुर्सियों की उठा-पटक शुरू कर देते हैं, जिससे स्पीकर को हार मानकर कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है। यह सोचने वाली बात है कि देश के अतिरिक्त व्यय में कटौती करके जिस तरह उम्मीदों का बजट पेश किया जाता है, वहीं बहस और उससे उत्पन्न विवाद से स्थगित होने के दौरान कितना पैसा बर्बाद होता है।

संसद सत्र के एक मिनट की कार्यवाही पर इतना होता है खर्च

संसद सत्र के एक मिनट की कार्यवाही का खर्च लगभग 2.6 लाख रुपये का आता है। हर सत्र में लगभग 18 या 20 दिन संसद की कार्यवाही चलती है। राज्यसभा में हर दिन पांच घंटे का और लोकसभा में छह घंटे का काम होता है।

चलता रहता है आरोप – प्रत्यारोप का सिलसिला

राज्य हो या केंद्र, सरकार को सदन में विपक्ष के विरोध का सामना करना पड़ता है। बहस मारपीट में बदल जाती है और स्पीकर को सदन स्थगित करना पड़ जाता है। जिस दल की सरकार होती है, वह विपक्ष पर सदन में कार्यवाही नहीं चलने देने का आरोप मढ़ देती है, लेकिन वह भूल जाते हैं कि जब उनकी पार्टी विपक्ष में होती है तब उनके द्वारा भी ऐसा ही किया गया था। जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तब भारतीय जनता पार्टी जो विपक्ष में बैठी थी, ने कई मौकों पर संसद में सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न कर सदन से बॉयकॉट किया था। उस वक़्त कांग्रेस ने बीजेपी को लोकतंत्र की गरिमा याद दिलाई थी, अब बीजेपी विपक्ष को लोकतंत्र की गरिमा बचाये रखने की नसीहत दे रही है।

संसद में हंगामा करने के लिए किस तरह  बहाने ढूंढे जाते हैं. जब मकसद हर हाल में हंगामा करना ही हो, तो फिर बहाने खोजना कठिन काम नहीं। कायदे से हंगामा करने वाले सांसदों के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए, लेकिन जब भी ऐसा होता है, तब हंगामा करके अपने निलंबन को निमंत्रण देने वाले सांसद यह रोना रोने लगते हैं कि उन्हें बोलने से रोका जा रहा है। इतने से भी संतोष नहीं होता तो आपातकाल लग जाने या फिर तानाशाही कायम हो जाने का शोर मचाया जाने लगता है। इन दिनों ऐसा ही हो रहा है।

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हैरत नहीं कि हंगामा करके संसद न चलने देने वाले सांसद यह मानकर चल रहे हों कि वे अपने उद्देश्य में सफल हैं। बड़ी बात नहीं कि उनके नेताओं की ओर से उन्हें शाबाशी भी मिल रही हो। चूंकि राजनीतिक दल संसद में हंगामा करने को एक तरह की उपलब्धि मानने लगे हैं, इसलिए संसदीय कार्यवाही का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। यदि इस गिरावट को रोका नहीं गया तो ऐसी भी स्थिति बन सकती है कि संसद के चलने या न चलने का कोई महत्व न रह जाए।

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