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Ramdayal Munda Birthday Special: आदिवासी साहित्य पुरोधा रामदयाल मुंडा का भारत में ‘आदिवासी दिवस’ शुरू कराने में बड़ा योगदान

Ramdayal Munda

आदिवासियों और दबे-कुचले समाज का स्वाभिमान रामदयाल मुंडा

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

Ramdayal Munda: डॉ. रामदयाल मुंडा अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविद्, समाजशास्त्री और आदिवासी बुद्धिजीवी और साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि वह देश और देश के बाहर आदिवासियों की आवाज भी थे। रांची के तमाड़ के दिउड़ी गांव में 23 अगस्त, 1939 के जन्मे रामदयाल मुंडा जीवन भर ज्ञान अर्जित करने और आदिवासी अधिकारों के लिए बिहार (झारखंड समेत), देश से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों तक आवाज उठाने में बीता। आदिवासी समाज लिए उन्होंने जो कुछ किया उसके लिए उन्हें कई सम्मान भी मिले। 2010 में राज्यसभा सदस्य  बनाये गये। लेकिन 2010 में ही पद्मश्री देकर देश धन्य हुआ। 9 अगस्त को दुनिया वर्षों से ‘International Day of the World’s Indigenous People’ मनाती थी, इसी दिन पर भारत में आदिवासी दिवस की शुरुआत रामदयाल मुंडा ने करवाई थी।

रामदयाल मुंडा के बड़े योगदानों में 1982 में तत्कालीन संभागीय आयुक्त व रांची विश्वविद्यालय के कुलपति कुमार सुरेश सिंह के सहयोग से रांची विश्वविद्यालय में आदिवासी और क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना है। यह देश के किसी भी विश्वविद्यालय में आदिवासी भाषा-साहित्य का पहला विभाग था। डा. रामदयाल मुंडा अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविद्, समाजशास्त्री, आदिवासी बुद्धिजीवी और साहित्यकार के साथ एक अप्रतिम आदिवासी कलाकार भी थे। उन्होंने मुंडारी, नागपुरी, पंचपरगनिया, हिंदी, अंग्रेजी में गीत-कविताओं के अलावा गद्य साहित्य रचा है। उनकी संगीत रचनाएं बहुत लोकप्रिय हुई हैं और झारखंड की आदिवासी लोक कला, विशेषकर ‘पाइका नाच’ को वैश्विक पहचान दिलाई है। वह भारत के दलित-आदिवासी और दबे-कुचले समाज के स्वाभिमान थे और विश्व आदिवासी दिवस मनाने की परंपरा शुरू करने में उनका अहम योगदान रहा है।

आदिवासियों की अलग पहचान के पक्षधर

रामदयाल मुंडा आदिवासियों के स्वतंत्र पहचान के पक्षधर थे और इसके लिए वह धर्म को सबसे महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने आदिवासियों के पारंपरिक धर्म को ‘आदि धरम’ के रूप में खड़ा किया और उसे प्रतिष्ठित करने की दिशा में काम किया। वे मानते थे कि आदिवासियों का जो धर्म है, वह मुख्यधारा के सभी धर्मों तथा इस्लाम, हिंदू और ईसाई धर्म से अलग है। उन्होंने ‘आदि धरम’ नामक पुस्तक लिखी।

रामदयाल मुंडा की  रचनाएं

नागपुरी, मुंडारी, हिन्दी व अंग्रेजी में भारतीय आदिवासियों के भाषा, साहित्य, समाज, धर्म व संस्कृति, विश्व आदिवासी आंदोलन और झारखंड आंदोलन पर उनकी 10 से अधिक पुस्तकें तथा 50 से ज्यादा निबंध प्रकाशित हैं। इसके अतिरिक्त हिन्दी, संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी में भी उन्होंने कई पुस्तकों का अनुवाद व संपादन किया है।

डॉ. रामदयाल मुंडा की कुछ प्रमुख प्रमुख पुस्तकें

  • आदि धर्म
  • सरहुल मंत्र/ ब(हा) बोंगा
  • विवाह मंत्र/आड़ान्दि बोंगा
  • जादुर दुराङको
  • हिसिर
  • सेलेद
  • आदिवासी अस्तित्व और झारखंडी अस्मिता के सवाल
  • The Jharkhand movement: Indigenous Peoples Struggle for Autonomy in India
  • The Language of Poetry
  • Sosobonga: the ritual of reciting the creation story and the Asur story prevelant among the Mundas
  • Goneh paromena bonga: adidharamanusara sraddha-mantra

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Ramdayal Munda

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