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Qutub Minar: विजय विक्रमादित्य की, बनाया वराहमिहिर ने, मिहिर के नाम पर है मिहरौली, विष्णु स्तंभ पर ठप्पा ‘मेड इन अरब’ का

Qutub Minar: Victory of Vikramaditya, 'Made in Arabia' stamp on Vishnu pillar

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

देश की राजधानी दिल्ली के मिहरौली में खड़े कुतुब मीनार का नाम बदल कर विष्णु स्तंभ करने की मांग उठी है। न ही यह मांग नयी है और न ही यह जानकारी कि कुतुब मीनार विष्णु स्तंभ है। यह कोई नयी जानकारी नहीं, बल्कि वर्षों से इसकी चर्चा हो रही है कि दिल्ली के मिहरौली में खड़ा कुतुब मीनार भारतीयों के महान पूर्वज का बनाया हुआ विष्णु स्तम्भ है। आक्रमणकारियों ने तो इसे नष्ट-भ्रष्ट करने का काम किया है। महान भारतीय सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की विजय का प्रतीक है विष्णु स्तम्भ, जिसे महान खगोलशास्त्री वराहमिहिर ने बनवाया था।

देश में कई ऐसे स्मारक हैं जिनके लिए कहा जा रहा है कि ये हिन्दू विरासत हैं, मगर उन्हें प्रमाणित करने की विवशताएं हैं। विवशता यह है कि साक्ष्य उन स्थानों पर खड़ा कर दी गयी संरचनाओं के अंदर हैं और उन्हें बिना ध्वस्त किये सच सामने नहीं आ सकता, लेकिन कुतुबमीनार परिसर के चारों ओर बिखरे साक्ष्य स्वतः प्रमाण देते हैं कि यह हिंदू संरचना है। आक्रमणकारियों ने इन्हें सिर्फ नष्ट-भ्रष्ट करने का काम किया, वहां खड़ी संरचनाओं पर मुलम्मा चढ़ा कर ‘अपना’ कहने का प्रयास तो किया गया, लेकिन ये सब कुछ सच को छुपाने का असफल प्रयास भर हैं। वहां पर बिखरे साक्ष्यों के बीच चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की विजय का प्रतीक लौह स्तम्भ भी है जो आक्रमणकारियों की कारस्तानियों से बचा रह गया है। दूसरी संरचनाओं को तो आक्रमणकारियों ने बदलने का कुछ काम किया भी, लेकिन इस लौह स्तंभ को बदला जाना उनके बूते में नहीं था। और हां, बचा-खुचा कुत्सित कार्य देश के ही कई मक्कार इतिहासकारों ने किया ताकि जो सच वहां दिख रहा है उसे झुठलाया जा सके।

यह सरासर भ्रम कि मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनाया

भारतीय इतिहास में यह भ्रम फैलाने का सफल प्रयास किया गया कि मिहरौली में खड़ा स्तंभ कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनाया है। इसका कारण मीनार से साथ जुड़ा अरबी शब्द ‘कुतुब’ है। ‘कुतुब’ का मतलब ‘धुरी’, ‘अक्ष’, ‘केंद्रबिंदु’ या ‘स्तंभ’ या ‘खंभा’ होता है। ‘कुतुब’ शब्द का प्रयोग आकाशीय, खगोलीय और दिव्य गतिविधियों के लिए प्रयोग किया जाता है। अर्थात यह एक खगोलीय शब्द है। इस प्रकार ‘कुतुब मीनार’ का अर्थ ‘खगोलीय स्तंभ’ होता है। गणितज्ञ वराहमिहिर ने विष्णु स्तंभ (कुतुब मीनार) के समीप खगोलीय संरचना ही खड़ी की थी। इसी संरचना को ‘कुतुब’ नाम दिया गया जिसे बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक से साम्य कर उसके द्वारा बनायी गयी संरचना बताने का सफल प्रयास किया गया।

संरचना कुतुबुद्दीन की क्यों नहीं है, इसके लिए उसके शासनकाल पर भी गौर करना होगा। कुतुबुद्दीन का कार्यकाल 1206 से 1210 रहा है। अपने शासनकाल में उसका अधिकांश समय लाहौर में बीता है। उसकी मौत भी लाहौर में हुई। शासन लाहौर में और कुतुब मीनार दिल्ली में, बात कुछ हजम नहीं हुई। इतिहास को ही सच मान लें तब भी कुतुब मीनार का निर्माण 1193 में शुरू हुआ था। तब मुहम्मद गोरी जीवित था। मालिक के जीवित रहते गुलाम के नाम पर मीनार का नाम क्यो? इसका नाम तो ‘गोरी मीनार’ होना चाहिए था। कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाने की शुरुआत की थी, इसे सच माना जा सकता है, उसके बाद इल्तुतमिश ने इस संरचना को आगे बढ़ाया और फिरोजशाह तुगलक ने इसे पूरा किया। इस नाते इसका नाम ‘इल्तुतमिश मीनार’ या ‘फिरोजशाह मीनार’ भी हो सकता था। खगोलीय नाम ‘कुतुब’ के कारण इसका निर्माता कुतुबुद्दीन ऐबक को मान लिया गया है, इसे माना जा सकता है।

मिहिर के नाम से बना है मिहरौली

जिसे कुतुब मीनार कहा जाता है उसका वास्तविक नाम विष्णु स्तंभ है। जिसे सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक महान खगोलशास्त्री वराहमिहिर ने बनवाया था। यह मीनार वास्तव में ध्रुव स्तंभ है या प्राचीन हिन्दू खगोलीय वेधशाला का एक मुख्य निगरानी टॉवर है। कुतुब मीनार के पास जो बस्ती है, उसे ‘मिहरौली’ कहा जाता है। यह एक संस्कृ‍त शब्द है जिसे ‘मिहिर-अवेली’ कहा जाता है। यहां पर विख्यात खगोलशास्त्री वराहमिहिर अपने सहायकों, गणितज्ञों और तकनीकविदों के साथ रहते थे। यहां वे लोग खगोलीय गणना और अध्ययन के लिए प्रयोग करते थे। इस स्तम्भ के चारों ओर हिंदू राशि चक्र को समर्पित 27 नक्षत्रों या तारामंडलों के लिए मंडप या गुंबजदार इमारतें थीं। जिसे आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया था।

बिखरे पड़े हैं हिन्दू इमारत होने के पुरातात्विक साक्ष्य

  • स्तंभों और दीवारों पर उकेरी गयी मंदिर की घंटियों और मूर्तियों की नक्काशी आज भी देखी जा सकती है।
  • कुतुबमीनार परिसर में हिन्दू वास्तुकला से निर्मित सैकड़ों स्तम्भ आज भी देखे जा सकते हैं।
  • मूर्तियों को हटाने के प्रयास के बाद भी उकेरी गयीं हिंदू आकृतियां स्तंभों और दीवारों से झलक जाती हैं।
  • परिसर में मौजूद गणेश प्रतिमा वहीं की है। जिसे इस समय सरकार ने लोहे के जाल से कवर कर रखा है।
  • ध्यान देने वाली बात, मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में है, जबकि इस्लामी परम्परा के अनुसार महत्व पश्चिम दिशा का है।
  • शान से खड़े लौह स्तंभ पर ब्राह्मी लिपि में लिखा है कि ‘विष्णु का यह स्तंभ विष्णुपाद गिरि नामक पहाड़ी पर बना है’।
ऐतिहासिक साक्ष्य कुतुब मीनार का सच नकारते हैं
  • “तथाकथित कुतुबमीनार और अलाई दरवाजा, अलाईमस्जिद वास्तव में विष्णुमन्दिर परिसर का हिस्सा हैं। अलाईमस्जिद वास्तव में विष्णुमन्दिर का खंडहर है जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया। यहां शेषशय्या पर विराजमान भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति थी। कुतुबमीनार जो वास्तव में विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ है वह एक सरोवर के बीच स्थित था जो कमलनाभ का प्रतीक था। स्तम्भ के ऊपर कमलपुष्प पर ब्रह्मा जी विराजमान थे जिसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया। मन्दिर से स्तम्भ तक जाने के लिए पूल जैसा रास्ता बना था”। – इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक
  • अरबी यात्री इब्नबतूता पूरे परिसर को मन्दिर परिसर बता चुका है।
  • अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी के संस्थापक सैय्यद अहमद खान ने कुतुबमीनार और उसके पूरे परिसर को हिन्दू निर्माण माना है। – इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक
  • कुतुबमीनार के पास लगे जानकारी पट्ट पर पढ़ा जा सकता है यहां 27 हिन्दू-जैन मंदिरों के विध्वंस कर कुतुब मीनार की संरचना खड़ी की गयी है।
  • ब्रिटिश म्युजियम में संरक्षित जानकारियों के अनुसार सन 1900 तक इसे “राजा पृथ्वीराज मंदिर” नाम से जाना जाता था।
इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक का दावा

इंदिरा गांधी के शासनकाल में जब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा कुतुबमीनार परिसर की खुदाई में देवी-देवताओं की मूर्तियां मिलने लगीं तब लोगों की नजरों से बचाने के लिए चारों ओर त्रिपाल लगा दिया गया ताकि कोई देख न सके। आस पास के लोगों के अनुसार, रात्रि के अंधेरे में वहां से मूर्तियां ले जाकर दूसरे जगह कहीं रख दी जाती थीं।

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