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अनमोल धरोहर: देश बंटा फिर भी नहीं बंटा सीमा पर खड़ा यह पेड़, सदियों से इसकी छांव में हैं भारत-पाकिस्तान

Priceless heritage: The country is divided, yet it is not divided, this tree standing on the border

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

भारत-पाकिस्तान की सीमा पर सदियों से खड़ी एक ऐसी धरोहर है, जिसे बंटवारे की विभीषिका भी नहीं बांट सकी। अब से कुछ घंटे बाद भारत और पाकिस्तान बंटवारे की 75वीं वर्षगांठ पूरी हो जायेगी। लेकिन इस पेड़ ने अपने ऊपर विभाजन की गांठ नहीं पड़ने दी। 14 अगस्त, 1947 को भारत से पृथक होकर पाकिस्तान बना था। और 15 अगस्त को भारत ने स्वतंत्र देश के रूप में पहली सांस ली थी। भारत विभाजन हो गया और इस विभाजन के साथ तमाम ऐतिहासिक धरोहरों का बंटवारा भी हो गया जो दोनों देशों में दोनों देशों के नागरिकों की ऐतिहासिक पहचान बन गये हैं। आजाद भारत से पहले की जितनी भी निशानियां हैं अब उन इन दोनों देशों का दावा है। लेकिन आजादी से भी सदियों पुरानी एक निशानी है जिस पर भारत और पाकिस्तान का अधिकार भी है और नहीं भी। इस पर दोनों देशों का अधिकार भले न हो, लेकिन दोनों देश इसकी छाया में जरूर हैं।

यह ऐसी निशानी है जिसने सदियों से मूक दर्शक बन कर परतंत्र भारत की तड़प भी देखी है, आजाद होने के बाद दोनों देशों को लहूलुहान होते देखा है, लड़ते-झगड़ते भी देखा है और कभी-कभई गले मिलते भी देखा है। यह मूक दर्शक विशालकाय वृक्ष है जो दोनों देशों के बीच में खड़ा होकर दोनों देशों को अपनी छांव दे रहा है। इस वृक्ष के साथ हदबंदी का पिलर नंबर 918 भी लगा हुआ है।

यह पीपल का एक पेड़ भारत-पाकिस्तान दोनों अंतर्राष्ट्रीय सीमा रणवीर सिंह पुरा के जीरो लाइन पर स्थित है। भारत-पाकिस्तान ने अपने बीच लकीरें खिंच लीं, लेकिन इस पेड़ को अपना बंटवारा पसंद नहीं हुआ। भले ही दोनों देश इस इतिहास समटे धरोहर को अपना न मानें, लेकिन इसने दोनों देशों को सदा अपना माना और सदियों से मूक दर्शक बने इतिहास को करवट बदलते देखता रहा।

चूंकि वृक्ष काफी विशाल है, इसलिए इसका आधा तना भारत में तो आधा पाकिस्तान में है। यहां कभी जम्मू से सियालकोट जाने का रास्ता हुआ करता था। आने-जाने वाले यात्री इस स्थान पर पीपल के नीचे आराम भी फरमाते थे। देश का बंटवारा हुआ तो दोनों देशों के बीच सीमाएं बन गयीं। सियालकोट पाकिस्तान में चला गया। दोनों देशों ने जमीन का बंटवारा तो कर लिया, लेकिन जम्मू से करीब 27 किलोमीटर की दूरी पर बसने वाले गांव सुचेतगढ़ में स्थित भारतीय अग्रिम चौकी ऑक्ट्राय पोस्ट पर दोनों देशों के बीच खड़े इस पेड़ की विवशता देखिये कि यहे किसे अपना समझे और किसे पराया।

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