समाचार प्लस
Uncategories

मानवाधिकार हनन मामले में पुलिस सबसे आगे! झारखंड -बिहार में ऐसी है स्थिति

मानवाधिकार हनन मामले में पुलिस सबसे आगे! झारखंड -बिहार में बढ़े हैं हनन के मामले

न्यूज़ डेस्क/ समाचार प्लस झारखंड- बिहार

मानवाधिकारों के संरक्षण में पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पुलिस खुले मन से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे तो एक हद तक आमलोगों को उनका अधिकार मिल सकता है। पुलिस एक ऐसी व्यवस्था का अंग है जिसका सीधे जुड़ाव आमलोगों से होता है। कोई भी पीड़ित पक्ष सबसे पहले न्याय के लिए पुलिस के पास आता है। शुरुआती दौर में ही पीड़ित पक्ष के दर्द को समझ कर पुलिस को सहयोगात्मक भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। ऐसा करने से आमजनों में पुलिस के प्रति जहां विश्वास बढता है, वहीं पीड़ित पक्ष के अधिकारों की रक्षा भी हो जाती है।

कतिपय पुलिस वाले मानवाधिकार  कानून  हनन करने से बाज नहीं आ रहे

मानवाधिकार कानून लागू हो जाने के बावजूद कतिपय पुलिस वाले हनन करने से बाज नहीं आ रहे। अपराधियों को पकड़ने के बाद उसे बेबजह हाजत में बंद रखना और मारपीट कर झूठ-सच उगलवाने की पुलिसिया परम्परा अभी भी जारी है जिसकी इजाजत मानवाधिकार कानून नहीं देता।लोगों को अपने अधिकार के बारे में जानकारी नहीं होने के कारण ही मानवाधिकार का हनन होता है। जरूरत है लोगों को जागरूक करने की।

झारखंड की स्थिति 

क्राइम कंट्रोल करने में झारखंड पुलिस भले ही फिसड्डी साबित हो रही हो, मगर मानवाधिकार उल्लंघन मामले में जरुर नंबर वन साबित होता रहा है. मानवाधिकार आयोग में  कुछ वर्ष पूर्व दर्ज मामलों में 60 फीसदी मामले ऐसे हैं जिसमें पुलिस पर किसी न किसी रूप में प्रताड़ित करने का आरोप है.

हाल के वर्षों में मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर झारखंड सुर्खियों में रहा है. डायन बिसाही से लेकर पुलिस प्रताड़ना के मामले यहां आम हो चुकी है. यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो मानवाधिकार आयोग में साल दर साल ह्युमेन राइट्स उल्लंघन के केस में वृद्धि हो रही है.

कई केस में सरकार को क्षतिपूर्ति पीड़ित पक्ष को देना पड़ा है

हालांकि इस मामले में झारखंड पुलिस अपना अलग तर्क देती है. मानवाधिकार उल्लंघन को रोकने के लिए स्पेशल आईजी से लेकर जिला एसपी तक को विशेष निर्देश दिये गये हैं, इसके बावजूद कानून के रखवालों पर लग रहे ऐसे आरोपों से खुद मानवाधिकार आयोग चिंतिंत है. ऐसे कई मामले अब तक सामने आ चुके हैं जिसमें पुलिस पदाधिकारियों पर कार्रवाई की जा चुकी है और कई केस में सरकार को क्षतिपूर्ति पीड़ित पक्ष को देना पड़ा है.

एनएचआरसी के मांगे जाने के बावजूद पुलिस रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराती

वर्ष 2019 में मानवाधिकार हनन के कुल 640 मामले आयोग में आये. इनमें से 582 का निबटारा किया गया और शेष मामले अभी चल रहे हैं. वर्ष 2020 में कुल 673 मामले आये. इनमें से 410 मामलों का निष्पादन किया गया. दूसरी तरफ मानवाधिकार हनन के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जब संज्ञान लेता है, तो आयोग की ओर से पुलिस से रिपोर्ट मांगी जाती है, ताकि मामले में कार्रवाई की जा सके. लेकिन एनएचआरसी के मांगे जाने के बावजूद झारखंड पुलिस रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराती है.

“थानों में मानवाधिकारों के हनन का सबसे ज्यादा खतरा”

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) एन. वी. रमण (CJI NV Ramana) भी कुछ माह पूर्व पूरे देश के सन्दर्भ में कह चुके हैं कि थानों में मानवाधिकारों के हनन का सबसे ज्यादा खतरा है. उन्होंने कहा था कि हिरासत में यातना और अन्य पुलिसिया अत्याचार देश में अब भी जारी है. विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को भी ‘थर्ड डिग्री’ की प्रताड़ना से नहीं बख्शा जाता है. उन्होंने देश में पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील बनाने की भी वकालत की थी.

बिहार पुलिस पर भी कई प्रकार के सवाल उठे हैं

कुछ वर्ष पूर्व बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग की वार्षिक रिपोर्ट के खुलासे के बाद बिहार पुलिस पर भी कई प्रकार के सवाल उठे हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य में मानवाधिकार हनन के सबसे अधिक मामले पुलिस प्रताड़ना के सामने आये हैं।

आयोग की वार्षिक रिपोर्ट 2015 में पुलिस प्रताड़ना के 1 हजार 767 मामले पंजीकृत हुए थे । जो कुल प्रताड़ना के 5 हजार 674 मामले में सबसे अधिक थे । हालांकि 2014 में यह आंकड़ा 2138 था।

डायन के नाम पर प्रताड़ना

महिलाओं को डायन बताकर उन्हें प्रताड़ित करने के मामले भी कम नजर नहीं आ रहे हैं। अब तक 255 मामले दर्ज हुए हैं। 2015 में बिहार में ऐसे 5674 मामले आये थे । पिछले पांच साल में यह आंकड़ा पचास गुना बढ़ गया है। इनमें दहेज प्रताड़ना और यौनशोषण के मामले भी कुछ कम नहीं है।

आने वाले मामले
मानवाधिकार आयोग में बाल अधिकार, शिक्षा, जेल, स्वास्थ्य, न्याययिक, माफिया, अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, पुलिस प्रताड़ना, पर्यावरण प्रदूषण, गरीबी, धार्मिक, रिमांड, सेवा में और महिलाओं के प्रताड़ना के मामले आते आते हैं।

पुलिस हिरासत ने नागरिकों को और ज्यादा असहाय बना दिया

घटनाओं की समीक्षा से पता चलता है कि हमारे संस्थानों का रुझान वर्दीधारियों को दी गई शक्तियों का संरक्षण करने के पक्ष में अधिक है. अपने कृत्यों से इन्होंने संतुलन बिठाने की जगह, पुलिस हिरासत ने नागरिकों को और ज्यादा असहाय बना दिया है. क्या मजिस्ट्रेटों से यह अपेक्षा करना उचित नहीं है कि वे किसी भी नागरिक को पुलिस की मनमानी का शिकार ना होने दें? उनके मनोबल की चिंता करने से बेहतर होगा कि वर्दीधारियों को यह याद दिलाए कि उनको दी गई शक्तियों का इस्तेमाल संवैधानिक दायरों के बाहर नहीं किया जा सकता.

ये भी पढ़ें : अब बच्चों को भी लग सकेगी कोवैक्सीन, 2 से 18 साल तक के लोगों के वैक्सीनेशन को मंजूरी

 

Related posts

भारतीय नौसेना को मिली नई पनडुब्बी INS Vela, पलक झपकते ही करेगा दुश्मनों का खात्मा

Sumeet Roy

World Athletics Award 2021 : भारतीय एथलीट Anju Bobby George को मिला ‘वीमेन ऑफ द ईयर’ अवार्ड

Sumeet Roy

Happy B’Day Suresh Raina : IPL में सबसे ज्‍यादा रन बनाने वाले चौथे बल्‍लेबाज का जन्मदिन आज, कोच की बेटी पर कुछ इस तरह हुए थे लट्टू

Sumeet Roy

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.