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Olympic में चाहिए Medals पर schools में नहीं है playground, ऐसे में कैसे खेलेगा भारत और कैसे बढ़ेगा भारत?

Indian Olympians

भारत के खिलाड़ियों ने इस साल Tokyo Olympic में जो सफलता हासिल की है वो भारत का अब तक का किसी भी Olympic में सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा। हमारे कई खिलाड़ियों ने पदक जीतकर कई सारे नए records बनाये हैं। भले ही इन सब उपब्लधियों से खुश होकर सरकार इन खिलाड़ियों की पीठ थपथपा रही हो और उनको सम्मानित कर रही हो, लेकिन भारत अगर ये सोच रहा हैं की वो अब खेल महाशक्ति है तो वो मुकाम अभी मीलों दूर है।

देश का infrastructure कितना ख़राब है ये इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की यहां 62% सरकारी स्कूलों में खेल के मैदान ही नहीं हैं। वहीं निजी या  private स्कूलों का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है, देश के 48% निजी स्कूलों में ही खेल के मैदान हैं। आप इन आकड़ों से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि जब बच्चों को खेल के लिए प्रथिमिक सुविधाएं उब्लब्ध नहीं कराई जाएंगी तो बच्चे देश को मेडल कैसे दिलाएंगे।

केंद्र के साथ राज्य सरकारों ने Tokyo Olympic में जीत कर आए खिलाड़ियों के नाम पर भले ही वाहवाही ले रही हो, लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि ये मालूम होते हुए भी की 2021 में भी Olympic होने हैं, केंद्र सरकार ने खेल budget में 8.16% की कटौती की थी। फरवरी में आया खेल बजट सिर्फ  2,596.14 crore का था, जो पिछली बार के मुकाबले 230.78 crore रुपये कम है।

इस बार के Olympic में medals जितने वाले ज़्यादातर खिलाड़ी ऐसे परिवार से हैं जो आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं। तो सरकार को इनका उदहारण लेकर ये सिख लेनी चाहिए की अगर वो चाहती है की भारत के खिलाड़ी खेल में अच्छा प्रदर्शन करें, medals लाएं और भारत को आने वाले Olympic में कई सारे Neeraj Chopra मिलें तो उसके लिए सरकार को भी infrastructure और खेल से जुडी facilities इन प्रयासरत बच्चों को देनी पड़ेगी।

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विडंबना तो ये है ये भारत में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने National level के competitons में जीत हासिल की है लेकिन आज अपना घर चलाने के लिए कोई सब्जी बेच रहा है तो कोई किसी दूकान में काम कर रहा है।  ऐसे खिलाड़ियों की ऐसी हालत की ज़िम्मेदार हमारी चरमराई खेल व्यवस्था ही है। जिसका जीता जागता उदाहरण चंडीगढ़ की रहने वाली 23 साल की रितु है जो National Boxing School और Inter School की Medalist  रह चुकी है।  2017 में पिता की तबियत खराब होने के बाद उन्हें खेल छोड़ना पड़ा और अब वह 350 रूपए के दैनिक वेतन पर parking attendant का काम करती हैं। इनकी ही तरह और भी कई खिलाड़ी हैं जिन्होंने खेल में आगे जाने का अपना सपना छोड़ दिया है क्योंकि उनके घर पर रोटी कमाने वाले कोई नहीं था।

भारत खेल में विश्व पटल पर और अच्छा प्रदर्शन कर सके और देश के खिलाड़ी किसी अन्य देश से पीछे ना रह जाएं तो सरकार को खेल के मैदान जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान इन खिलाड़ियों को देनी होगी जिसके बाद बेहतर कोचिंग से इनके प्रदर्शन को पूरी क्षमता तक सुधारा जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले स्कूलों में खेलने के लिए मैदान होना चाहिए। साथ ही खेल संबंधी योजनाओं के निवेश और उसका बजट को बढ़ाते हुए खिलाड़ियों को प्रोत्साहन राशि देनी होगी तब जाके देश से अच्छे खिलाड़ी सामने आ पाएंगे, फिलहाल तो World level पर भारत के खिलाडियों को चमकने के लिए अभी काफी जतन करना होगा।

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