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Panchayati Raj Divas: पंचायत ग्रामीण भारत की स्थानीय स्वशासन की प्रणाली

Panchayati Raj Divas: Panchayati System of Local Self-Government of Rural India

 

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

पंचायती राज व्यवस्था, ग्रामीण भारत की स्थानीय स्वशासन की प्रणाली है। जिस तरह से नगरपालिकाओं तथा उपनगरपालिकाओं के द्वारा शहरी क्षेत्रों का स्वशासन चलता है, उसी प्रकार पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों का स्वशासन चलता है। इन संस्थाओ का काम आर्थिक विकास करना, सामाजिक न्याय को मजबूत करना तथा राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की योजनाओं को लागू करना है

पंचायत राज गांव की सरकार है और गांव के विकास की योजनाओं को लागू करने में ग्राम स्वशासन की सक्रिय भागीदारी होती है। गांवों के लिए सरकारी योजनाओं का आंकलन गांव के लोगों द्वारा ही किया ज सकता है। योजनाओं को लागू करने में कोई परेशानी आती है तो गांव के लोग खुद उसका समाधान ढूंढें। गांव के विकास में भी सभी को, खासकर महिलाओं और कमजोर एवं पिछड़े वर्गों की भी भागदारी हो, यही ग्राम स्वशासन यानी पंचायती राज की आवश्यकता है।

पंचायती राज का स्वरूप :
  • पंचायती राज संस्थाएं स्थानीय स्वशासी निकाय हैं और केन्द्र द्वारा प्रायोजित विकास कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने वाली एजेंसी मात्र नहीं हैं।
  • निचले स्तर की भागीदारी से योजना बनाना और इसके लिये माइक्रो-प्लानिंग प्रक्रिया को लागू करना स्वशासन का आधार है। पंचायती राज संस्थाओं को विकास प्रशासन का तीसरा स्तर मात्र होकर नहीं रह जाना चाहिए।
  • महिला और अन्य कमजोर वर्ग की निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी पर जोर दिया गया है, ताकि उनकी भूमिका, गरिमा और नेतृत्व को स्थानीय स्वशासन में बढ़ावा मिल सके।
  • पंचायती राज सस्थाओं के सशक्तीकरण का केन्द्र बिन्दु महिला और दलित नेतृत्व को बढ़ावा देना तथा उन्हें सशक्त बनाना होना चाहिए।
  • पंचायती राज संस्थाओं का प्रयास होना चाहिए कि स्थानीय प्राकृतिक और मानव संसाधन के साथ-साथ राज्य तथा केन्द्र सरकार के पास उपलब्ध विकास संसाधनों तक पंचायतों की पहुंच हो और उन पर नियंत्रण रखा जा सके।
  • शासन प्रणाली को जवाबदेह पारदर्शी और सहभागी बनाने के लिये पंचायती राज संस्थाओं का सशक्तीकरण होना चाहिए। पंचायती राज संस्थाओं के बीच अन्तर्संबंध स्पष्ट होना चाहिए।
पंचायती राज की आवश्यकता क्यों?
  • निचले स्तर पर भागीदारी की प्रक्रिया को सहज और कारगर बनाने के लिये।
  • ग्रामीण विकास को प्रभावी बनाने के लिये।
  • भ्रष्टाचार मुक्त विकास की प्रक्रिया के लिये और
  • निचले स्तर पर सूचनाओं के सतत प्रवाह के लिये।
73वां संविधान संशोधन :

संविधान के 73वें संशोधन के आलोक में राज्य संस्कारों के लिये बाध्यकारी प्रावधान इस प्रकार हैं–

  • ग्राम स्तर पर पंचायत के क्षेत्र में गांवों की निर्वाचक सूची में पंजीकृत लोगों के निकाय के रूप में ग्रामसभा के गठन का प्रावधान है।
  • बीस लाख से कम आबादी वाले राज्यों को छोड़कर देश के सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद्‌ यानी त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली का गठन होना है।
  • पंचायत में सभी स्तर के पद को संबंधित पंचायती क्षेत्र में चुनाव के आधार पर भरा जाना है।
  • पंचायत के सभी सदस्यों को पंचायत बैठकों में वोट देने का अधिकार है।
  • पंचायत समिति के प्रमुख और जिला परिषद के अध्यक्ष का चुनाव सीधे निर्वाचित सदस्यों द्वारा की जायेगी।
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिये ग्राम पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद के सदस्यों और अध्यक्ष पद का आरक्षण आबादी के अनुपात में होगा।
  • प्रत्येक स्तर पर सदस्यों और पंचायत प्रमुख के लिये कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित होंगी।
  • पंचायत के सभी स्तरों का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा। नियमित एवं सुचारू चुनाव के लिये राज्य चुनाव आयोग के गठन का प्रावधान है।
  • पंचायती राज संस्थाओं की वार्षिक स्थिति सुदृढ़ करने के उपाय सुझाने के लिये राज्य वित्त आयोग का गठन अनिवार्य रखा गया है।
  • प्रत्येक जिले में जिला नियोजन समिति के गठन को संवैधानिक दर्जा दिया गया है।
  • 73वें संविधान में राज्यों से निम्नलिखित अधिकारों के प्रावधान की अपेक्षा की गयी है।
  • ग्रामसभा की शक्तियों और कार्यप्रणाली तय करना।
  • पंचायत समिति और जिला परिषद में ग्राम पंचायत के अध्यक्ष की सदस्यता का प्रावधान।
  • सांसद और विधायकों की सदस्यता पंचायत समिति और जिला परिषद में तय करना।
  • ग्राम पंचायत स्तर पर अध्यक्ष पद के चुनाव के तरीके का निर्धारण।
  • पंचायतों के स्वशासन के तौर पर कार्य करने के लिये आवश्यक अधिकार, शक्तियां और दायित्वों का प्रावधान करना।
  • पंचायतों द्वारा टैक्स, शुल्क, टॉल टैक्स और राजस्व के अन्य स्रोतों के लिये नियम बनाना और अधिकृत करना।
  • पंचायती राज संस्थाओं की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के उपाय सुझाने के लिये राज्य वित्त आयोग का गठन करना।
अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासी व्यवस्था :

24 दिसम्बर, 1996 को राष्ट्रपति ने अनुसूचित क्षेत्रों के लिये पंचायतों के नये कानून की मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही पंचायतों के बारे में संविधान के भाग 9 में दी गयी है। यह व्यवस्था महत्वपूर्ण फेरबदल के साथ अनुसूचित क्षेत्रों में लागू की गयी है।

  • परम्परागत आदिवासी व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता इस कानून की पहली उल्लेखनीय बात है कि इसमें आदिवासी स्वशासी व्यवस्था की मुख्य बातें औपचारिक स्तर से शामिल की गयी हैं कि (धारा 4) राज्य का विधानमंडल ऐसा कोई भई कानून नहीं बनायेगा जो उनसे असंगत हो।
  • प्रत्येक ग्रामसभा समाज की परम्परा उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संपदा और विवादों को निपटाने की परंपरागत व्यवस्था को बनाये रखने और उनके मुताबिक कामकाज चलाने के लिये सक्षम होगी।

इस केन्द्रीय कानून के तहत ग्रामसभाओं को तीन तरह के अधिकार सीधे सौंपे गये हैं :

  • क. विकास के काम : प्रत्येक ग्रामसभा को गांव के स्तर पर लागू होने वाले सामाजिक और आर्थिक विकास की सभी योजनाओं और कार्यक्रमों के अनुमोदन का अधिकार होगा। ग्रामसभा के अनुमोदन के बिना गांव के स्तर पर पंचायत कोई काम शुरू ही नहीं कर सकेगी। इसी तरह गरीबी हटाओ या दूसरे कार्यक्रमों से लाभ पाने वालों की पहचान और उनके चयन का अधिकार भी ग्रामसभा को ही होगा।
  • ख. खर्चे पर निगरानी : गांव की हर तरह की योजनाओं पर कितना खर्च हो रहा है, इसकी निगरानी की जिम्मेदारी भी ग्रामसभा को सौंपी गयी है। इसके लिये कानून के तहत पंचायत को गांव में किये जाने वाले कामों पर खर्च का पूरा ब्योरा ग्रामसभा के सामने रखना होगा। गांव में क्या खर्च हुआ और इसके आधार पर रुपये-पैसे के उपयोग का प्रमाण-पत्र अब ग्रामसभा देगी।
  • ग. भू-अर्जन से पहले परामर्श : विकास योजनाओं के लिये अनुसूचित क्षेत्रों में भू-अर्जन से पहले ग्रामसभा से परामर्श अनिवार्य होगा। इसी तरह उन परियोजनाओं से प्रभावी व्यक्तियों को फिर से बसाने और उनके लिये पुनर्वास की व्यवस्था करने से पहले भी ग्रामसभा से परामर्श जरूरी है।
विधानमंडलों द्वारा अपेक्षित कानूनी अधिकार :
  1. मद्यपान वगैरह : मद्यपान के मामले में ग्रामसभा को पूरे अधिकार देने की व्यवस्था की गयी। यदि ग्रामसभा चाहे तो अपने गांव में पूरा मद्य निषेध लागू कर दे। (धारा 4[3])।
  2. आदिवासियों की भूमि रक्षा : अगर किसी गांव में किसी आदिवासी की जमीन गलत तरीके से हथिया ली गयी हो तो उसको वापस दिलाने का अधिकार भी ग्रामसभा को होगा। (धारा 4[3])।
  3. लघु बनोपज पर मालिकाना हक।
  4. पानी पर अधिकार : जल संसाधनों के आयोजन और प्रबंधन का अधिकार पंचायतों को दिया गया है। (धारा 43] (i))।
  5. खनिजों के मामले में पर्यवेक्षण के लिये अनुमति और खनन के लिये पट्टा देने के पहले ग्रामसभा की सिफारिश अनिवार्य है।
  6. आदिवासियों को दिये जाने वाले कर्जे की पूरी व्यवस्था पर ग्रामसभा का नियंत्रण माना गया है। (धारा 43] (iv)।
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था की प्रमुख बातें :

ग्रामसभा –

  • प्रत्येक राजस्व गांव में एक ग्रामसभा होगी।
  • उस गांव की मतदाता सूची में पंजीकृत लोग ग्रामसभा के सदस्य होंगे।
  • अनुसूचित क्षेत्र में गांव के एक से अधिक ग्रामसभा का (यदि ग्रामसभा सदस्य चाहें तो) गठन किया जा सकेगा। ऐसी प्रत्येक ग्रामसभा के क्षेत्र के आवास या आवासों पर समूह अथवा छोटे गांव या गांवों/टोलों का समूह समाविष्ट होगा, जो परंपरा एवं रुढ़ियों के अनुसार अपने कार्य कलापों का प्रबंध करेंगे।
ग्रामसभा की बैठक की अध्यक्षता :
  • ग्रामसभा की प्रत्येक बैठक की अध्यक्षता मुखिया और उसकी अनुपस्थिति में बैठक में उपस्थित ग्रामसभा सदस्यों के बहुमत से इस कार्य के लिये चुने जायेंगे।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की बैठक की अध्यक्षता परम्परागत ग्राम प्रधान जैसे- मांझी, महतो, मुंडा आदि अथवा उनके द्वारा प्रस्तावित या बैठक में उपस्थित सदस्यों की सहमति से मनोनीत व्यक्ति द्वारा की जायेगी।
ग्रामसभा की बैठक का कोरम :
  • कुल सदस्यों का 40वां हिस्सा और उसमें कम से कम एक तिहाई महिलाएं होंगी।
  • अनुसूचित क्षेत्र में कुल सदस्यों की एक-तिहाई और उसमें कम से कम एक तिहाई महिलाएं होंगी।
ग्रामसभा की बैठक का कोरम :
  • कुल सदस्यों का 40वां हिस्सा और उसमें कम से कम एक तिहाई महिलाएं होंगी।
  • अनुसूचित क्षेत्र में कुल सदस्यों की एक-तिहाई और उसमें कम से कम एक तिहाई महिलाएं होंगी।
ग्रामसभा की बैठक में विचार होंगे :
  • वर्ष का हिसाब-किताब।
  • पिछले वर्ष का लेखा-जोखा।
  • ऑडिट रिपोर्ट।
  • गांव के विकास योजना से संबंधित कार्यक्रम।
  • ग्राम पंचायत का वार्षिक बजट और अगले वित्तीय वर्ष के लिये वार्षिक योजना।
  • निगरानी समिति की रिपोर्ट।
अनुसूचित क्षेत्र में ग्रामसभा की अतिरिक्त शक्तियां एवं कृत्य :
  • व्यक्तियों की परम्पराओं और रूढ़ियां, उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक-सांस्कृतिक स्थलों (सरना, मसना, जाहेरथान आदि) को और विवादों के निपटाने के उनके रुढ़िगत तरीकों को, जो संवैधानिक दृष्टिकोण से असंगत न हो, सुरक्षित एवं संरक्षित करेगी।
  • भूमि जल, वन जैसे प्राकृतिक स्रोतों के प्रबंधन।
  • स्थानीय योजनाओं (जनजातीय उप-योजना सहित) के स्रोतों एवं व्ययों का प्रबंधन।
ग्रामसभा के कार्य :
  • गरीबी उन्मूलन तथा अन्य कार्यक्रमों के लाभुकों का चयन।
  • सामुदायिक कल्याण कार्यक्रम को गतिशील बनाना।
  • जन सामान्य की चेतना, एकता एवं सौहार्द में अभिवृद्धि करना।
  • स्वच्छता, सफाई और शांति व्यवस्था बनाये रखना।
  • ग्रामीण सड़कों, पुलिया, पुलों बांधों और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों का निर्माण, अनुरक्षण और प्रबंधन।
ग्राम पंचायत :
  • प्रत्येक 5000 की आबादी पर एक ग्राम पंचायत होगी।
  • प्रत्येक ग्राम पंचायत सीधे चुने गये ग्राम पंचायत (वार्ड ) सदस्यों और मुखिया से मिलकर बनेगी।
  • प्रत्येक ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव लगभग 500 की आबादी पर सीधे मतदान से होगा।
  • ग्राम पंचायत का प्रधान मुखिया होगा और वह सीधे मतदान से चुना जायेगा।
  • मुखिया एवं सदस्य अपने बीच से उप मुखिया का चुनाव करेंगे।
ग्राम पंचायत की स्थायी समितियां :
  • सामान्य पंचायत समिति।
  • विकास समिति।
  • महिला, शिशु एवं सामाजिक कल्याण समिति।
  • स्वास्थ्य शिक्षा एवं पर्यावरण समिति।
  • आधारभूत संरचना समिति इन समितियों में मुखिया एवं उप मुखिया पदेन सदस्य होंगे। ग्राम पंचायत का सचिव स्थायी समिति का पदेन सचिव होगा।
ग्राम पंचायत के कार्य :
  • पंचायत को कर लगाने का अधिकार है।
  • ग्राम पंचायत को विकास कार्यों में खर्च करने का अधिकार है।
  • राज्य वित्त आयोग द्वारा सहायक अनुदान प्राप्त करने का अधिकार है।
  • पंचायत का बजट बनाना।
  • खर्च का हिसाब-किताब रखना।
पंचायत समिति :
  • प्रखंड स्तर पर एक पंचायत समिति बनेगी।
  • नगरपालिका का अधिसूचित क्षेत्र पंचायत समिति के क्षेत्र में नहीं आयेगा।
  • पंचायत समिति के सदस्यों का चुनाव 5000 की जनसंख्या पर होगा।
  • पंचायत समिति के प्रमुख एवं उप प्रमुख होंगे।
  • प्रमुख पंचायत समिति का प्रधान होंगे।
  • पंचायत समिति का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा।
  • इस क्षेत्र में आने वाले सांसद, विधायक और मुखिया भी पंचायत समिति के सदस्य होंगे, परन्तु पंचायत समिति क्षेत्र के सभी मुखिया एक साथ सदस्य नहीं हो सकते हैं। क्षेत्र के मुखिया का 1/5वां भाग चक्रानुक्रम से एक वर्ष की अवधि के लिये ही सदस्य होगा। कोई भी मुखिया
  • पांच वर्ष के दसम्यान दोबारा पंचायत समिति का सदस्य नहीं हो सकता है।
पंचायत समिति के कार्य :
  • पंचायत समिति के तहत कुल 32 कार्य सौंपे गये हैं।
  • जिला परिषद द्वारा सौंपी गयी योजनाओं की वार्षिक बनाना और जिला योजना में सम्मिलित करवाना।
  • पंचायत समिति का वार्षिक बजट बनाना।
  • कृषि, भूमि सुधार, सिंचाई, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण आदि।
अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत समिति की अतिरिक्त शक्तियां :
  • लघु जलाशयों की योजना बनाना, उन पर स्वामित्व तथा उनका प्रबंधन।
  • सामाजिक प्रक्षेत्रों में उनकी अंतरित संस्थाओं तथा कार्यों पर नियंत्रण करना।
  • स्थानीय योजना पर, जिसमें जनजाति उप-योजना सम्मिलित है, उसके स्रोतों एवं व्यय पर नियंत्रण रखना।
पंचायत समिति की स्थायी समितियां :
  • सामान्य स्थायी समिति।
  • वित्त अकेक्षण तथा योजना समिति।
  • सामाजिक न्याय समिति।
  • जिला परिषद :
  • प्रत्येक जिले में पांच लाख की आबादी पर एक जिला परिषद होगा।
  • प्रत्येक 50 हजार की जनसंख्या पर चुने गये प्रतिनिधि इसके सदस्य होंगे।
  • नगरपालिका, नगर निगम या अधिसूचित क्षेत्र जिला परिषद के तहत नहीं होंगे।
  • अध्यक्ष जिला परिषद का प्रधान होगा।
  • उस क्षेत्र की सभी पंचायत समिति के प्रमुख जिला परिषद के सदस्य होंगे।
  • उस जिले की लोकसभा, विधानसभा के सदस्य जिला परिषद के सदस्य होंगे।
  • अनुसूचित क्षेत्र में जिला परिषद का अध्यक्ष पद अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित होगा।

यह भी पढ़ें: World Book Day: NCERT की किताबों से ‘विदा हुए मुगल’, 10वीं, 11वीं और 12वीं के पाठ्यक्रमों में संशोधन

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