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Jharkhand Panchayat Election: निचले स्तर पर भागीदारी की प्रक्रिया को सहज बनाता है ग्राम स्वशासन

Panchayat Election: Facilitates the process of participation at the lower level, village self-government

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

झारखंड में तीसरी बार पंचायत राज चुनाव हो रहा हैं। पंचायत चुनाव की तिथियां घोषित कर दी गयी हैं। पूरे झारखंड में 14 मई, 19 मई, 24 मई और 27 मई को चार चरणों में पंचायत चुनाव होने वाले हैं। एक सामान्य सा सवाब मन में उठता है कि पंचायत चुनाव की क्यों जरूरत है। पंचायत राज यानी गांव की सरकार क्यों जरूरी है और यह करती क्या है? दरअसल, गांव के विकास की योजनाओं को लागू करने में ग्राम स्वशासन की सक्रिय भागीदारी होती है। गांवों के लिए सरकारी योजनाओं का आंकलन गांव के लोगों द्वारा ही किया ज सकता है। योजनाओं को लागू करने में कोई परेशानी आती है तो गांव के लोग खुद उसका समाधान ढूंढें। गांव के विकास में भी सभी को, खासकर महिलाओं और कमजोर एवं पिछड़े वर्गों की भी भागदारी हो, यही ग्राम स्वशासन यानी पंचायती राज की आवश्यकता है।

पंचायती राज का स्वरूप :
  • पंचायती राज संस्थाएं स्थानीय स्वशासी निकाय हैं और केन्द्र द्वारा प्रायोजित विकास कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने वाली एजेंसी मात्र नहीं हैं।
  • निचले स्तर की भागीदारी से योजना बनाना और इसके लिये माइक्रो-प्लानिंग प्रक्रिया को लागू करना स्वशासन का आधार है। पंचायती राज संस्थाओं को विकास प्रशासन का तीसरा स्तर मात्र होकर नहीं रह जाना चाहिए।
  • महिला और अन्य कमजोर वर्ग की निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी पर जोर दिया गया है, ताकि उनकी भूमिका, गरिमा और नेतृत्व को स्थानीय स्वशासन में बढ़ावा मिल सके।
  • पंचायती राज सस्थाओं के सशक्तीकरण का केन्द्र बिन्दु महिला और दलित नेतृत्व को बढ़ावा देना तथा उन्हें सशक्त बनाना होना चाहिए।
  • पंचायती राज संस्थाओं का प्रयास होना चाहिए कि स्थानीय प्राकृतिक और मानव संसाधन के साथ-साथ राज्य तथा केन्द्र सरकार के पास उपलब्ध विकास संसाधनों तक पंचायतों की पहुंच हो और उन पर नियंत्रण रखा जा सके।
  • शासन प्रणाली को जवाबदेह पारदर्शी और सहभागी बनाने के लिये पंचायती राज संस्थाओं का सशक्तीकरण होना चाहिए। पंचायती राज संस्थाओं के बीच अन्तर्संबंध स्पष्ट होना चाहिए।
पंचायती राज की आवश्यकता क्यों?
  • निचले स्तर पर भागीदारी की प्रक्रिया को सहज और कारगर बनाने के लिये।
  • ग्रामीण विकास को प्रभावी बनाने के लिये।
  • भ्रष्टाचार मुक्त विकास की प्रक्रिया के लिये और
  • निचले स्तर पर सूचनाओं के सतत प्रवाह के लिये।
73वां संविधान संशोधन :

संविधान के 73वें संशोधन के आलोक में राज्य संस्कारों के लिये बाध्यकारी प्रावधान इस प्रकार हैं–

  • ग्राम स्तर पर पंचायत के क्षेत्र में गांवों की निर्वाचक सूची में पंजीकृत लोगों के निकाय के रूप में ग्रामसभा के गठन का प्रावधान है।
  • बीस लाख से कम आबादी वाले राज्यों को छोड़कर देश के सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद्‌ यानी त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली का गठन होना है।
  • पंचायत में सभी स्तर के पद को संबंधित पंचायती क्षेत्र में चुनाव के आधार पर भरा जाना है।
  • पंचायत के सभी सदस्यों को पंचायत बैठकों में वोट देने का अधिकार है।
  • पंचायत समिति के प्रमुख और जिला परिषद के अध्यक्ष का चुनाव सीधे निर्वाचित सदस्यों द्वारा की जायेगी।
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिये ग्राम पंचायत, पंचायत समिति एवं जिला परिषद के सदस्यों और अध्यक्ष पद का आरक्षण आबादी के अनुपात में होगा।
  • प्रत्येक स्तर पर सदस्यों और पंचायत प्रमुख के लिये कम से कम एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित होंगी।
  • पंचायत के सभी स्तरों का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा। नियमित एवं सुचारू चुनाव के लिये राज्य चुनाव आयोग के गठन का प्रावधान है।
  • पंचायती राज संस्थाओं की वार्षिक स्थिति सुदृढ़ करने के उपाय सुझाने के लिये राज्य वित्त आयोग का गठन अनिवार्य रखा गया है।
  • प्रत्येक जिले में जिला नियोजन समिति के गठन को संवैधानिक दर्जा दिया गया है।
  • 73वें संविधान में राज्यों से निम्नलिखित अधिकारों के प्रावधान की अपेक्षा की गयी है।
  • ग्रामसभा की शक्तियों और कार्यप्रणाली तय करना।
  • पंचायत समिति और जिला परिषद में ग्राम पंचायत के अध्यक्ष की सदस्यता का प्रावधान।
  • सांसद और विधायकों की सदस्यता पंचायत समिति और जिला परिषद में तय करना।
  • ग्राम पंचायत स्तर पर अध्यक्ष पद के चुनाव के तरीके का निर्धारण।
  • पंचायतों के स्वशासन के तौर पर कार्य करने के लिये आवश्यक अधिकार, शक्तियां और दायित्वों का प्रावधान करना।
  • पंचायतों द्वारा टैक्स, शुल्क, टॉल टैक्स और राजस्व के अन्य स्रोतों के लिये नियम बनाना और अधिकृत करना।
  • पंचायती राज संस्थाओं की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के उपाय सुझाने के लिये राज्य वित्त आयोग का गठन करना।
अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासी व्यवस्था :

24 दिसम्बर, 1996 को राष्ट्रपति ने अनुसूचित क्षेत्रों के लिये पंचायतों के नये कानून की मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही पंचायतों के बारे में संविधान के भाग 9 में दी गयी है। यह व्यवस्था महत्वपूर्ण फेरबदल के साथ अनुसूचित क्षेत्रों में लागू की गयी है।

  • परम्परागत आदिवासी व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता इस कानून की पहली उल्लेखनीय बात है कि इसमें आदिवासी स्वशासी व्यवस्था की मुख्य बातें औपचारिक स्तर से शामिल की गयी हैं कि (धारा 4) राज्य का विधानमंडल ऐसा कोई भई कानून नहीं बनायेगा जो उनसे असंगत हो।
  • प्रत्येक ग्रामसभा समाज की परम्परा उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संपदा और विवादों को निपटाने की परंपरागत व्यवस्था को बनाये रखने और उनके मुताबिक कामकाज चलाने के लिये सक्षम होगी।

इस केन्द्रीय कानून के तहत ग्रामसभाओं को तीन तरह के अधिकार सीधे सौंपे गये हैं :

  • क. विकास के काम : प्रत्येक ग्रामसभा को गांव के स्तर पर लागू होने वाले सामाजिक और आर्थिक विकास की सभी योजनाओं और कार्यक्रमों के अनुमोदन का अधिकार होगा। ग्रामसभा के अनुमोदन के बिना गांव के स्तर पर पंचायत कोई काम शुरू ही नहीं कर सकेगी। इसी तरह गरीबी हटाओ या दूसरे कार्यक्रमों से लाभ पाने वालों की पहचान और उनके चयन का अधिकार भी ग्रामसभा को ही होगा।
  • ख. खर्चे पर निगरानी : गांव की हर तरह की योजनाओं पर कितना खर्च हो रहा है, इसकी निगरानी की जिम्मेदारी भी ग्रामसभा को सौंपी गयी है। इसके लिये कानून के तहत पंचायत को गांव में किये जाने वाले कामों पर खर्च का पूरा ब्योरा ग्रामसभा के सामने रखना होगा। गांव में क्या खर्च हुआ और इसके आधार पर रुपये-पैसे के उपयोग का प्रमाण-पत्र अब ग्रामसभा देगी।
  • ग. भू-अर्जन से पहले परामर्श : विकास योजनाओं के लिये अनुसूचित क्षेत्रों में भू-अर्जन से पहले ग्रामसभा से परामर्श अनिवार्य होगा। इसी तरह उन परियोजनाओं से प्रभावी व्यक्तियों को फिर से बसाने और उनके लिये पुनर्वास की व्यवस्था करने से पहले भी ग्रामसभा से परामर्श जरूरी है।
विधानमंडलों द्वारा अपेक्षित कानूनी अधिकार :
  1. मद्यपान वगैरह : मद्यपान के मामले में ग्रामसभा को पूरे अधिकार देने की व्यवस्था की गयी। यदि ग्रामसभा चाहे तो अपने गांव में पूरा मद्य निषेध लागू कर दे। (धारा 4[3])।
  2. आदिवासियों की भूमि रक्षा : अगर किसी गांव में किसी आदिवासी की जमीन गलत तरीके से हथिया ली गयी हो तो उसको वापस दिलाने का अधिकार भी ग्रामसभा को होगा। (धारा 4[3])।
  3. लघु बनोपज पर मालिकाना हक।
  4. पानी पर अधिकार : जल संसाधनों के आयोजन और प्रबंधन का अधिकार पंचायतों को दिया गया है। (धारा 43] (i))।
  5. खनिजों के मामले में पर्यवेक्षण के लिये अनुमति और खनन के लिये पट्टा देने के पहले ग्रामसभा की सिफारिश अनिवार्य है।
  6. आदिवासियों को दिये जाने वाले कर्जे की पूरी व्यवस्था पर ग्रामसभा का नियंत्रण माना गया है। (धारा 43] (iv)।

यह भी पढ़ें: Jharkhand: पंचायत चुनाव का बज गया बिगुल, चार चरणों में होंगे मतदान, 1,96,16,504 मतदाता बनायेंगे गांव की सरकार

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