महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की आज भक्तों पर बरस रही कृपा

आज महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ की आराधना में पूरी दुनिया लीन है। शिवरात्रि भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति का विशेष अवसर है। मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन के इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव का सबसे पवित्र दिन माना गया है, जो सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी है।

शिवपुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन विधिपूर्वक व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से समस्त पापों का नाश होता है और भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है, जिसमें हर प्रहर में शिवलिंग का अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है, पहले प्रहर में जल, दूसरे प्रहर में दही, तीसरे प्रहर में घी और चौथे प्रहर में शहद से अभिषेक करने का विधान है।

भगवान शिव को ‘कालों का काल’ और ‘देवों का देव’ अर्थात् ‘महादेव’ कहा गया है। शिव नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक नामों से पूजे जाते हैं। शिव सर्वत्र पूजनीय हैं और वह अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं और दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

शिवरात्रि से जुड़ी कथा

पुराणों में कहा गया है कि एक समय शिव-पार्वती जी के साथ कैलास पर्वत पर बैठे थे। उसी समय पार्वती जी ने प्रश्न किया कि इस तरह का कोई व्रत है जिसके करने से मनुष्य आपके धाम को प्राप्त कर सके ? तब उन्होंने यह कथा सुनाई थी कि प्रत्यना नामक देश में एक व्यक्ति रहता था, जो जीवों को बेचकर अपना भरण -पोषण करता था। उसने सेठ से धन उधार ले रखा था। समय पर कर्ज न चुकाने के कारण सेठ ने उसको शिवमठ में बन्द कर दिया।

संयोग से उस दिन फाल्गुन बदी चतुर्दशी थी। वहां रातभर कथा-पूजा होती रही जिसे उसने भी सुना। अगले दिन शीघ्र कर्ज चुकाने की शर्त पर उसे छोड़ा गया। उसने सोचा रात को नदी के किनारे बैठना चाहिये। वहां जरूर कोई न कोई जानवर पानी पीने आयेगा। अतः उसने पास के बील वृक्ष पर बैठने का स्थान बना लिया। उस बील के नीचे एक शिवलिंग था। जब वह पेड़ पर अपने छिपने का स्थान बना रहा था उस समय बील के पत्तों को तोड़कर फेंकता जाता था जो शिवलिंग पर ही गिरते थे। वह दो दिन का भूखा था। इस तरह से वह अनजाने में ही शिवरात्रि का व्रत कर ही चुका था। साथ ही शिवलिंग पर बेल-पत्र भी अपने आप चढ़ते गये।

एक पहर रात्रि बीतने पर एक गर्भवती हिरणी पानी पीने आई। उस व्याध ने तीर को धनुष पर चढ़ाया किन्तु हिरणी की कातर वाणी सुनकर उसे इस शर्त पर जाने दिया कि सुबह होने पर वह स्वयं आयेगी। दूसरे पहर में दूसरी हिरणी आई। उसे भी छोड़ दिया। तीसरे पहर भी एक हिरणी आई उसे भी उसने छोड़ दिया और सभी ने यही कहा कि सुबह होने पर मैं आपके पास आऊंगी। चौथे पहर एक हिरण आया। उसने अपनी सारी कथा कह सुनाई कि वे तीनों हिरणियां मेरी स्त्री थी। वे सभी मुझसे मिलने को छटपटा रही थी। इस पर उसको भी छोड़ दिया तथा कुछ और भी बेल-पत्र नीचे गिराये। इससे उसका हृदय बिल्कुल पवित्र, निर्मल तथा कोमल हो गया।

प्रातः होने पर वह बेल-पत्र से नीचे उतरा। नीचे उतरने से और भी बेल पत्र शिवलिंग पर चढ़ गये। अतः शिवजी ने प्रसन्न होकर उसके हृदय को इतना कोमल बना दिया कि अपने पुराने पापों को याद करके वह पछताने लगा और जानवरों का वध करने से उसे घृणा हो गई। सुबह वे सभी हिरणियां और हिरण आये। उनके सत्य वचन पालन करने को देखकर उसका हृदय दुग्ध सा धवल हो गया और वह फूट-फूट कर रोने लगा।

महाशिवरात्रि पर किया जाता है विशेष अनुष्ठान

महाशिवरात्रि पर भगवान शिव का अभिषेक अनेकों प्रकार से किया जाता है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घरों में और मन्दिरों में भक्त सभी पारम्परिक शिवलिंग पूजा करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं। भक्त सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं, जैसे गंगा, या (खजुराहो के शिव सागर में) या किसी अन्य पवित्र जल स्रोत में। यह शुद्धि के अनुष्ठान हैं, जो सभी हिन्दू त्योहारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पवित्र स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं, भक्त शिवलिंग स्नान करने के लिए मन्दिर में पानी का बर्तन ले जाते हैं महिलाओं और पुरुषों दोनों सूर्य, विष्णु और शिव की प्रार्थना करते हैं मन्दिरों में घण्टी और “शंकर जी की जय” ध्वनि गूंजती है। भक्त शिवलिंग की आधी परिक्रमा करते हैं और फिर शिवलिंग पर पानी या दूध भी चढ़ाते हैं। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भांग, धतूरा, अकवन के फूल-माला, बेल पत्र, समी पत्ते आदि भी अर्पित किये जाते हैं।

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

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