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जाति आधारित जनगणना पर नीतीश-तेजस्वी साथ, और दल मिला सकते हैं हाथ

जाति आधारित जनगणना पर नीतीश-तेजस्वी साथ, और दल मिला सकते हैं हाथ

बिहार में बीजेपी के साथ शासन कर रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं. बिहार में बीजेपी के साथ सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनसंख्या नियंत्रण कानून को गैर जरूरी बताकर जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं. केंद्र सरकार के साफ इनकार के बावजूद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा और उनसे राज्य के 10 दलों के प्रतिनिधिमंडल के साथ सोमवार को मुलाकात भी की।

 नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव एकमत

इसे लेकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के फिर मुखर होने से सियासत तेज हो गई है. बिहार की सियासत में जेडीयू और आरजेडी भले ही एक दूसरे के विरोधी हों, लेकिन जातिगत जनगणना के मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव एकमत हैं.

राजनीतिक दलों के बीच श्रेय लेने की होड़

बिहार में एनडीए सरकार की प्रमुख सहयोगी भाजपा पसोपेश में है और वह पार्टी की रणनीति के तहत जनसंख्या नियंत्रण कानून की हिमायत कर रही है. दरअसल, सारा खेल अन्य पिछड़ी जातियों के वोट बैंक का है. इनकी आबादी 52 फीसद बताई जाती है. राजनीतिक दलों के बीच ओबीसी के सच्चे हितैषी का क्रेडिट लेने की होड़ लग गई है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव जाति आधारित जनगणना को राष्ट्रीय हित में  बताते हैं . उनका मानना है कि  यह ऐतिहासिक कदम होगा और इससे समाज के गरीबों एवं सबसे वंचित वर्गों की मदद होगी।

मोदी सरकार के लिए पेचीदा होता जा रहा मुद्दा

देश में जाति के आधार पर जनगणना कराये जाने का मुद्दा केंद्र की मोदी सरकार के लिए थोड़ा पेचीदा होता जा रहा है क्योंकि अब बिहार बीजेपी के बड़े नेता भी इस मसले पर विपक्षी दलों के साथ आ गए हैं. हालांकि सरकार इसे कराने के नफे-नुकसान के हर पहलू से सोच रही है और शायद यही वजह है कि  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में राज्य की 11 पार्टियों के नेताओं की बातों को गौर से सुना तो जरूर लेकिन कोई आश्वासन नहीं दिया.

वोट बैंक छिटकने का खतरा

दरअसल, बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में हुए चुनावों में अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी के वोट बैंक में बेहद तेजी से सेंध लगाते हुए उसे अपने पक्ष में किया है. लिहाज़ा, बीजेपी व संघ को एक खतरा ये लगता है कि जातिगत जनगणना कराने से कहीं ये वोट बैंक उससे छिटककर फिर से क्षेत्रीय पार्टियों की झोली में न चला जाये. हालांकि संघ ने अभी तक इस पर अपनी कोई राय जाहिर नहीं की है.

क्या कहते हैं जानकार

देश में जाति आधारित जनगणना की मांग को लेकर  जानकारों का मानना है कि इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि इससे किसी भी जाति की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्तर की सही वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल जाएगी. जाति आधारित जनगणना से यह भी पता चलेगा कि किस जाति में कितने लोग अब तक बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं. लेकिन, नीतीश कुमार और आरजेडी के नेता इसमें भी अपना हित साध रहे हैं. नीतीश कुमार जहां उस हिसाब से अपना राजनीतिक समीकरण बना सकते हैं तो वहीं आरजेडी इसको मुद्दा बना कर आगामी बिहार विधान सभा या लोक सभा चुनाव में भुनाना चाहेगी. वहीं, बीजेपी को लग रहा है कि अगर अभी जातिगत जनगणना की गयी तो उसके कई दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं.’

क्या बिगड़ सकता है देश का सामाजिक ताना-बाना?  

बीजेपी नेताओं को लगता है कि जातीय जनगणना कराए जाने से देश का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सकता है. देश में अनुसूचित जाति और जनजाति की जनगणना इसलिए कराई जाती है क्योंकि संविधान के तहत उन्हें सदन के अंदर आरक्षण दिया गया है. जातीय जनगणना के आधार पर तैयार की गई संख्या के आधार पर ही अनुसूचित जाति और जनजाति की सीटों को घटाया और बढ़ाया जाता है. बीजेपी को लगता है कि जातिगत आधार पर जब किसी को यह पता चलेगा कि उनके समाज की संख्या घट रही है, तो वह जाति परिवार नियोजन को अपनाना छोड़ सकती है. जिससे देश की जनसंख्या में और भी अधिक तेजी से इजाफा हो सकता है.

 बीजेपी का रुख अलग

जातिगत जनगणना पर बीजेपी का रुख अलग है. भाजपा विधायक हरिभूषण ठाकुर बचौल का कहना है कि जातिगत जनगणना से समाज में वैमनस्य फैलेगा. ऐसे में गरीबों की गणना होनी चाहिए. वहीं भाजपा विधान पार्षद डॉ संजय पासवान ने कहा है कि जातिगत जनगणना की जरूरत नहीं है. गणना ही करनी है तो गरीबों की गिनती हो, जिस तबके को आरक्षण का लाभ मिल रहा है, उसमें भी गरीबी को पैमाना बनाया जाए.

अगड़ी जातियों को होगा सबसे ज़्यादा नुक़सान!

जातिगत जनगणना कराने का मतलब है आरक्षण के मुद्दे को एक बार फिर से तूल देना. हक़ीक़त भी यही है कि अगड़ी जातियों ने  आरक्षण के मुद्दे का हमेशा विरोध किया है. उनको लगता है कि जातिगत जनगणना से आरक्षण बढ़ेगा, जिसका सबसे ज़्यादा नुक़सान अगड़ी जातियों को ही होगा. इसलिये मोदी सरकार के लिए ये मुद्दा फिलहाल गले की फांस बनता नज़र आ रहा है, लेकिन सियासत के लिए इसे निगलने के सिवा और कोई चारा भी नहीं है.

क्यों उठने लगी है जाति आधारित जनसंख्या की मांग?

बिहार में जातिगत जनगणना को लेकर भले ही मत अलग-अलग रहे हों, लेकिन बिहार में जातिगत राजनीति का ही बोलबाला रहा है. जेडीयू और आरजेडी दोनों पार्टियां सत्ता प्राप्त करने के लिए जातिगत समीकरणों पर ही ज्यादा भरोसा करती हैं. राजनीतिक जानकारों की मानें तो नीतीश कुमार जातिगत जनगणना करा कर ओबीसी वोट बैंक को साधने की कवायद में लगे हुए हैं तो वहीं आरजेडी जनगणना करा कर ओबीसी वोट बैंक को और मजबूत करेगी. अभी तक सिर्फ एससी और एसटी की ही गणना होती रही है, लेकिन पहली बार ओबीसी को भी जनगणना में शामिल कराने की मांग की गई है.

20 फीसदी हैं अगड़ी जातियां 

बिहार का जातीय समीकरण देखें तो करीब 20 फीसदी अगड़ी जातियां हैं, जिसमें राजपूत सबसे ज्यादा हैं. ब्रह्मण और भूमिहार की अच्छी खासी तादाद है. मुसलमान और दलित समुदाय की आबादी करीब 15-15 फीसदी है. ओबीसी में सबसे ज्यादा यादवों की संख्या है और करीब 14 फीसदी हैं.

जाति आबादी (प्रतिशत में )

ओबीसी/ईबीसी 46%
यादव 12%
कुर्मी 4%
कुशवाहा (कोयरी) 7%
(आर्थिक रूप से पिछड़े 28% जिसमें 3.2% तेली भी आएंगे )
महादलित / दलित (अनुसूचित जातियां ) 15% इस श्रेणी में चमार 5%, दुसाध/पासवान 5%, और मुसहर 1.8% समुदाय आते हैं।
मुस्लिम 16.9%
तथाकथित अगड़ी जातियां 19%
भूमिहार 6%
ब्राह्मण 5.5%
राजपूत 5.5%
कायस्थ 2%
अनुसूचित जनजातियाँ 1.3%
अन्य 0.4% सिक्ख, जैन, और इसाई इत्यादि

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