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‘मुस्लिम महिला अधिकार दिवस’ तीन तलाक कानून की वर्षगांठ नहीं, मुस्लिम महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान की बड़ी शुरुआत

'Muslim Women's Rights Day' a big start of smile on the faces of Muslim women

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

मुस्लिम देश ईरान में महिलाओं ने हिजाब से आजादी की जंग छेड़ दी, लेकिन भारत में कट्टरपंथियों को मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब चाहिए ही चाहिए। पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया सहित कई इस्लामिक देशों ने ‘तीन तलाक’ पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन भारत में इसे खत्म किया जाना कट्टरपंथियों को मंजूर नहीं है। पुरुष प्रधान समाज में यह विडम्बना है कि मुस्लिम महिलाएं अपने पुरुषों के रहम-करम पर निर्भर हैं। बुरके में सांस लेना की उनकी नियति है, ‘तीन तलाक’ देकर घर से निकाल दिया जाये तो उस पर चूं नहीं करना उसकी किस्मत। शादीशुदा महिलाओं को सिर्फ उतनी ही आजादी है जितने कि उनके पति उन्हें देना चाहें।

यह कैसी विडम्बना है कि जिस रास्ते दुनिया के कई मुस्लिम देश भी नहीं चलना चाहते, उसी पर भारत के कट्टरपंथियों चलना चाहते हैं। देश में हिजाब को लेकर खड़ा किया गया वितंडावाद कोई पुरानी बात नहीं है। यह देखिये, मुस्लिम देश ईरान में ही महिलाओं ने अपनी आज़ादी की जंग छेड़ दी है, मुस्लिम महिलाएं सड़कों में आकर हिजाब और बुर्के के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। ईरान की महिलाएं “Say No To Hijab’ कैम्पेन चला रही हैं। हालांकि इस एंटी हिजाब कैम्पेन से ईरान की सरकार और कट्टरपंथी बुरी तरह नाराज है।

वहीं तीन तलाक को ले लीजिए, कई मुस्लिम देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया सहित कई इस्लामिक देशों में तीन तलाक प्रतिबंधित है, लेकिन भारत के कठमुल्लाओं को यह मंजूर नहीं। एक तो महिलाओं की स्थिति वैसे ही ठीक नहीं, ऊपर से मुस्लिम महिलाओं की दशा के तो कहना नहीं है। मुस्लिम महिलाओं का सबसे बड़ा दर्द ‘तीन तलाक’ है। तीन तलाक की मारी महिलाओं को जिन दुःखों से गुजरना पड़ता है, उसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। आजादी के 70 साल गुजर जाने के बाद इस कोई सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ध्यान गया और उन्होंने तमाम विरोधों के बावजूद इससे छुटकारा दिलाने के लिए संसद से ‘तीन तलाक बिल’ पास करवाया। इस बिल के विरोध में सिर्फ कट्टरपंथी ही नहीं दे, कई राजनीतिक पार्टियां भी विरोध करने वालों में थी। इस विरोध में वे राजनीतिक पार्टियां भी थीं, जो इन मुस्लिम महिलाओं के वोट से जीत कर संसद तक पहुंची थीं, लेकिन उन्हें भी इनकी दुर्दशा पर जरा भी तरस नहीं आया। ‘तीन तलाक बिल’ पास होने के बाद भी हालांकि यह कुप्रथा अब भी जारी है, लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं तीन तलाक दिये जाने के मामलों में कमी आयी है।

बता दें, तत्कालीन विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 21 जून, 2019 को लोकसभा में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) बिल, 2019 पेश किया था। इस बिल ने 21 फरवरी, 2019 को जारी अध्यादेश का स्थान लिया। बिल तलाक बोलने को, इसमें लिखित और इलेक्ट्रॉनिक दोनों रूप शामिल हैं, कानूनी रूप से अमान्य और गैरकानूनी बना रहा है। देशभर की मुस्लिम महिलाओं ने इसका स्वागत किया था। इसके बाद केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने शादीशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए तीन तलाक को अपराध घोषित करने की वर्षगांठ एक अगस्त को ‘मुस्लिम महिला अधिकार दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया।

1 अगस्त 2019 को मिला मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार
  • एक अगस्त 2019 को तीन तलाक को किया गया था कानूनी अपराध घोषित
  • ‘तीन तलाक’ को कानूनी अपराध बनाकर मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के ‘आत्मनिर्भरता, आत्म सम्मान, आत्म विश्वास’ को पुख्ता कर उनके संवैधानिक-मौलिक-लोकतांत्रिक एवं समानता के अधिकारों को सुनिश्चित किया है।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक अगस्त 2019 के दिन ‘तीन तलाक’ या ‘तलाके बिद्दत’ को कानूनी अपराध घोषित किया।
  • अधिनियम लिखित या इलेक्ट्रॉनिक रूप में तलाक की सभी घोषणाओं को अमान्य (अर्थात कानून में लागू नहीं करने योग्य) और अवैध बनाता है।
तीन तलाक की तीन प्रमुख बातें

अपराध और दंड : बिल तलाक कहने को संज्ञेय अपराध बनाता है जिसके परिणामस्वरूप तीन साल की कैद और जुjर्माने की सजा हो सकती है (एक संज्ञेय अपराध ऐसा अपराध होता है जिसमें पुलिस अधिकारी बिना वारंट के आरोपी को गिरफ्तार कर सकता है)। अपराध संज्ञेय होगा, अगर अपराध से संबंधित सूचना: 1. विवाहित महिला (जिसे तीन तलाक कहा गया है), या 2. उससे रक्त या वैवाहिक संबंध से जुड़े किसी व्यक्ति ने दी हो। बिल में प्रावधान है कि मेजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत दे सकता है। महिला (जिसे तीन तलाक कहा गया है) की सुनवाई के बाद या अगर मेजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट है कि जमानत देने के पर्याप्त आधार हैं, तभी आरोपी को जमानत दी जा सकती है।

भत्ता: जिस मुस्लिम महिला को तलाक दिया गया है, वह अपने पति से अपने और खुद पर निर्भर बच्चों के लिए गुजारा भत्ता हासिल करने के लिए अधिकृत है। भत्ते की राशि मेजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित की जाएगी।

अवयस्क बच्चों की कस्टडी: जिस मुस्लिम महिला को इस प्रकार तलाक दिया गया है, वह अपने अवयस्क बच्चों की कस्टडी हासिल करने के लिए अधिकृत है। कस्टडी का निर्धारण मेजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा।

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