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Jharkhand में Mob lynching: हीरो बनती भीड़ पर अब कसेगा कानून का शिकंजा!

Mob lynching in Jharkhand

न्यूज़ डेस्क/ समाचार प्लस झारखंड – बिहार
माओवादी घटनाओं से हमेशा परेशान रहने वाला झारखंड मॉब ल‍िंंच‍िंंग की घटनाओं के कारण सुर्ख‍ियों में रह चुका है। यहां कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, ज‍िसकी चर्चा देश ही नहीं, बल्‍क‍ि दूसरे देशों में भी हो चुकी है। झारखंड (Jharkhand) में मॉब ल‍िंंच‍िंंग (Mob lynching) की इन घटनाओं से पीड़‍ित होने वालों की सूची में क‍िसी एक धर्म के लोग शाम‍िल नहीं हैं। दोनों समुदायों के पीड़‍ित म‍िल जाएंगे। हालांक‍ि, झारखंड की मौजूदा हेमंत सोरोन की सरकार ने इसे गंभीरता से लेते हुए पश्‍च‍िम बंगाल की तरह यहां भी सख्‍त कानून बनाने के लिए विधानसभा के शीतकालीन सत्र में बिल पेश करने जा रही है। आने वाले द‍िनों में यह प्रदेश में लागू भी हो जाएगा। इस कानून के लागू होते ही मॉब ल‍िंंच‍िंंग की घटनाओं को अंजाम देने वालों को सख्‍त दंड म‍िल सकेगा। अभी कई मामलों में आरोप‍ित बच न‍िकलते हैं।

राज्यों ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया

बीते कुछ वर्षों में मॉब लिंचिंग (Mob Lynching) की बढ़ती घटनाओं ने सामाजिक एवं आर्थिक रूप से शोषित वर्गों और हाशिये पर मौजूद समुदायों के मध्य एक भय का माहौल पैदा कर दिया है। ज्ञात हो कि वर्ष 2015 के बाद से NCRB ने लिंचिंग के मामलों से संबंधित आंकड़े भी संकलित नहीं किये हैं। इस संदर्भ में NCRB का कहना था कि मॉब लिंचिंग को लेकर राज्यों द्वारा जो आंकड़े प्रस्तुत किये गए वे ‘अविश्वसनीय’ थे। हालांकि मॉब लिंचिंग को लेकर विभिन्न स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा एकत्रित आंकड़े चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने लिंचिंग को ‘भीड़तंत्र के एक भयावह कृत्य’ के रूप में संबोधित करते हुए केंद्र सरकार व राज्य सरकारों को कानून बनाने के दिशा-निर्देश दिये थे। इसके बावजूद विभिन्न राज्यों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है और लिंचिंग की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

क्या होती है मॉब लिंचिंग?

जब अनियंत्रित भीड़ द्वारा किसी दोषी को उसके किये अपराध के लिये या कभी-कभी मात्र अफवाहों के आधार पर ही बिना अपराध किये भी तत्काल सज़ा दी जाए अथवा उसे पीट-पीट कर मार डाला जाए तो इसे भीड़ द्वारा की गई हिंसा या मॉब लिंचिंग (Mob Lynching) कहते हैं। इस तरह की हिंसा में किसी कानूनी प्रक्रिया या सिद्धांत का पालन नहीं किया जाता और यह पूर्णतः गैर-कानूनी होती है।

क्या है संवैधानिक प्रावधान

भारतीय दंड संहिता (IPC) में लिंचिंग जैसी घटनाओं के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर किसी तरह का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और इन्हें धारा- 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 323 (जान बूझकर घायल करना), 147-148 (दंगा-फसाद), 149 (आज्ञा के विरुद्ध इकट्ठे होना) तथा धारा- 34 (सामान्य आशय) के तहत ही निपटाया जाता है।

भीड़ द्वारा किसी की हत्या किये जाने पर IPC की धारा 302 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है और इसी तरह भीड़ द्वारा किसी की हत्या का प्रयास करने पर धारा 307 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है तथा इसी के तहत कार्यवाई की जाती है।
CrPC में भी इस संबंध में कुछ स्पष्ट तौर पर नहीं कहा गया है।

भीड़ द्वारा की गई हिंसा की प्रकृति और उत्प्रेरण सामान्य हत्या से अलग होते हैं इसके बावजूद भारत में इसके लिये अलग से कोई कानून मौजूद नहीं है।

सबसे पहले मणिपुर ने लिंचिंग के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया था

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए सर्वप्रथम मणिपुर ने वर्ष 2018 में ही लिंचिंग के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया था। विशेषज्ञों ने तर्क और प्रासंगिकता की दृष्टि से मणिपुर के बिल को काफी अच्छा बताया था।

तबरेज मामले की दुन‍िया भर में हुई थी चर्चा

वर्ष 2019 की बात है। झारखंड के सरायकेला खरसावां ज‍िले में 24 वर्ष के तबरेज अंसारी की चोरी के शक में पीट-पीटकर हत्‍या कर दी गई थी। यह घटना धतकीडीह गांव में हुआ था। उग्र भीड़ ने तबरेज अंसारी को ब‍िजली के खम्‍भे से बांध कर बेरहमी से प‍िटाई की थी। इस मामले में कई आरोप‍ित जेल गए और कई जेल से बाहर भी आ चुके हैं। देश के कई द‍िग्‍गज नेताओं और बालीवुड के कलाकारों ने इस घटना की न‍िंंदा की थी। तब इस झारखंड में भाजपा नेतृत्‍व वाली रघुवर दास की सरकार थी। व‍िपक्ष ने इस मुद्दे को खूब उछाला था।

झारखंड में वर्ष 2020 में हुई मॉब ल‍िंंच‍िंंग की घटनाएं

वर्ष 2020 में 18 अप्रैल को झारखंड के रामगढ़ ज‍िले में पेशाब कर रहे जाबिर अंसारी से पहले नाम पूछा गया, फ‍िर उसकी प‍िटाई की गई। इसी तरह 11 मई को दुमका में शुभान अंसारी को उन्‍मादी भीड़ ने बकरी चुराने के आरोप में पीट कर मार डाला था। दुलाल मिया नामक एक व्‍यक्‍त‍ि घायल भी गया था। 23 जून को गोड्डा में भी बकरी चुराने के आरोप में उन्‍मादी भीड़ ने बबलू शाह की पीटकर हत्‍या कर दी थी।वहीं उचित्त कुमार यादव को अधमरा कर द‍िया था। 02 जुलाई को पूर्वी सिंहभूम ज‍िले में प्रत‍िबंध‍ित मांस खाने के आरोप में रमेश बेसरा की प‍िटाई कर दी गई थी। 02 जुलाई को ही दुमका ज‍िले में प्रत‍िबंध‍ित मांस बेचने के आरोप में आद‍िवासी छोटेलाल टुडू और मंडल मुर्मू की प‍िटाई कर दी गई थी। 16 सितंबर को सिमडेगा ज‍िले में राज सिंह, दीपक कुल्लू, इमानुएल टेटे, सुगाद डाग, सुलीन बारला, रोशन डांग, सेम किड़ो को गोवंशीय हत्‍या के आरोप में भीड़ ने जमकर पीटा था। इतना ही नहीं स‍िर मुंडवा कर उनसे धर्म व‍िशेष के नारे लगवाए गए थे।

झारखंड में वर्ष 2021 में हुई मॉब ल‍िंंच‍िंंग की घटनाएं

इसी तरह अगर वर्ष 2021 की बात करें तो कई घटनाएं शर्मसार करती नजर आती हैं। 10 मार्च को राजधानी रांची में ट्रक चोरी के आरोप में भीड़ ने सचिन कुमार वर्मा की बांध कर प‍िटाई कर दी। भीड़ ने इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। वहीं, 13 मार्च को रांची में ही मोबारक खान की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्‍या कर दी। मोबारक खान पर बाइक चोरी का आरोप था। वहीं, 19 मार्च को गुमला ज‍िले में हत्या के आरोप‍ित रामचंद्र उरांव की भीड़ ने पीटकर हत्‍या कर दी थी। झारखंड में  मानवता को शर्मसार करने वाली ऐसी घटनाओं की लम्बी चौड़ी फेहरिस्त है।

भीड़ का न तो कोई चेहरा होता है और ना ही उसकी कोई पहचान

ये आंकड़े इशारा करते हैं कि झारखंड में भीड़ तंत्र का ये गुनाह नया नहीं है।  भीड़ का न तो कोई चेहरा होता है और ना ही उसकी कोई पहचान होती है। इसी बात का फायदा आपराधिक तत्व उठाते हैं और तुरंत इंसाफ के नाम पर हैवानियत से इंसानियत को लहूलुहान कर देते हैं।  ऐसे घटनाएं सभ्य समाज के लिए किसी भी तरीके से जायज नहीं ठहराई जा सकती।  सवाल ये है कि लोगों का पुलिस और कानून पर विश्वास नहीं रहा या लोगों में पुलिस और कानून का खौफ नहीं रहा।

झारखंड सरकार मॉब लिचिंग पर पेश करेगी विधेयक 

झारखंड विधानसभा में मंगलवार को सरकार मॉब लिंचिंग और भीड़ हिंसा रोकने के लिए द झारखंड (प्रीवेंशन ऑफ मॉब वायलेंस एंड मॉब लिंचिंग) बिल 2021 पेश करेगी। विधेयक की प्रति सभी विधायकों के बीच सोमवार को वितरित कर दी गई है। इस विधेयक के कानून बनने पर भीड़ हिंसा के दोषी व्यक्ति या व्यक्तियों को उम्र कैद तक की सजा सुनाई जा सकेगी। पश्चिम बंगाल में यह कानून बन चुका है। इस विधेयक में सजा का प्रावधान के अलावा गवाह की सुरक्षा, पीड़ित पक्ष को मुआवजा जैसे कई प्रावधान किये गये हैं। जुर्माना के तौर पर 25 लाख रुपये तक वसूला जा सकेगा।

तीन वर्गों में सजा का प्रावधान

तैयार अध्यादेश के अनुसार अपराध साबित होने पर तीन वर्गों में सजा का प्रावधान किया गया है। सामान्य हिंसा तथा पीड़ित के घायल होने की अवस्था में तीन साल की सजा के साथ एक लाख का आर्थिक दंड होगा, जिसे बढ़ाकर तीन लाख किया जा सकता है। गंभीर रूप से घायल होने की स्थिति में आरोपियों को दस वर्ष की सजा सुनाई जा सकती है। सजा को आजीवन कारावास तक बढ़ाने का भी प्रावधान किया गया है। मॉब लिंचिंग में मौत पर आजीवन कारावास की सजा के साथ-साथ 25 लाख रुपये का अर्थदंड लगाने और पूरी संपत्ति जब्त करने तक का भी प्रावधान किया गया है। दूसरी ओर पीड़ित को निजी या सरकारी अस्पताल में नि:शुल्क इलाज किया जाएगा।

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