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Mirabai Chanu की अनसुनी कहानियां : उस दिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने खा लिया चानू  का जूठा चावल – Part 2

Mirabai Chanu

गोल्ड जीतकर बैलगाड़ी खरीदने का मां से किया वादा निभाया

Tokyo Olympic में भारत को अब तक मिले एक मात्र पदक का भार उठाने वाली वेटलिफ्टर Mirabai Chanu को वेटलिफ्टर बनने की प्रेरणा देश की ख्यातिप्राप्त वेटलिफ्टर कुंजुरानी से मिली थी। लेकिन इसके पहले की कहानी से प्रेरणा देश के तमाम युवाओं को मीराबाई चानू से लेनी चाहिए। चानू की जिन्दगी का एक-एक पन्ना प्रेरणा देने वाला है। अगर ऐसा नहीं होता तो ओलंपिक में वेटलिफ्टंग का 21 वर्षों का पदकों का सूखा कैसे खत्म होता? अगर ऐसा नहीं होता तो पदक जीतने के बाद आज देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति उन्हें नमन क्यों कर रहे होते?  ऐसा है तभी तो मीराबाई चानू के प्लेट से चावल का दाना खाकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने-आप को धन्य समझा!

Mirabai Chanu जब बड़ी हुईं तब उनका आदर्श कुंजुरानी थीं। कुंजूरानी को देखकर Mirabai Chanu के मन में विश्व चैंपियन बनने का सपना जगा था। संयोग देखिये, चानू ने 12 साल पहले बनाये गये अपने आदर्श कुंजूरानी का ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड 2016 में तोड़ा था। इसी उपलब्धि का ही परिणाम था कि 2017 में अमेरिका के अनाहाइम, कैलीफोर्निया में आयोजित हुए विश्व भारोत्तोलन चैम्पियनशिप में उन्हें भाग लेने का अवसर मिला था।

जिम्मेदारियों का बोझ बचपन से ही उठाना जानती हैं चानू

कहानी इम्फाल से 200 किमी दूर नोंगपोक काकचिंग गांव की है। उस समय Mirabai Chanu की उम्र 10 साल रही होगी। एक गरीब परिवार में जन्मी चानू अपने छह भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। चानू अपने चार साल बड़े भाई सैखोम सांतोम्बा मीतेई के साथ पास की पहाड़ी पर लकड़ी बीनने जाती थीं। लेकिन एक दिन जो हुआ, उसने चानू के जीवन की दिशा बदल दी। उस दिन चानू और सांतोम्बा रोज की तरह पहाड़ी पर लकड़ी बीनने गये थे। लकड़ी बीनने के बाद गट्ठर तो बन गया, मगर उस दिन उसके भाई से वह गट्ठर नहीं उठा। फिर क्या था, मीरा ने गट्ठर उठाया और चल पड़ी 2 किमी दूर अपने घर की ओर।

उस शाम जंगल से चानू के गट्ठर लाने की ही चर्चा थी। लेकिन मां का दिल, परिवार की दयनीय स्थिति पर उन्हें बड़ी कोफ्त हो रही थी। फिर भी मां ने कहा था, अगर हमारे पास बैलगाड़ी होती तो मेरी बेटी को गट्ठर उठाकर न लाना पड़ता।

इसके बाद मां मासूम चानू के सवाल से अचम्भित थीं। चानू का सवाल था- ‘मां, बैलगाड़ी कितने रुपयों में आती है।’

मां का जवाब था- ‘उतनी कि उस कमाई से हम जीवनभर नहीं खरीद सकते।’

मासूम चानू के जेहन में मासूम सवाल घुमड़ रहे थे। सवाल फिर भी वही था- ‘हमारे पास पैसा क्यों नहीं है, क्या पैसा कमाया नहीं जा सकता। पैसा कमाकर तो हम बैलगाड़ी खरीद सकते हैं।’

तभी गांव के एक व्यक्ति ने सलाह दी। उस व्यक्ति ने कहा, ‘तू जब लड़कों से अधिक वजन उठा लेती है, तब ऐसे खेल की खिलाड़ी क्यों नहीं बन जाती है। जिसमें वजन उठाना पड़ता है। खेल में सोना जीत जायेगी तो, सोना बेचकर तू अपने परिवार के लिए बैलगाड़ी खरीद लेगी।’

उसी समय मासूम चानू ने अपनी मां से प्रतिज्ञा की कि वह खिलाड़ी बनेगी और  सोना बेचकर बैलगाड़ी खरीदेगी।

यहीं से शुरू हुआ आत्मविश्वास से भरी चानू का ‘विजय’अभियान। अब तो सारी दुनिया जान चुकी है चानू के आत्मविश्वास ने उन्हें कैसे बुलंदियों पर पहुंचा दिया है।

कठिन वेटलिफ्टिंग प्रशिक्षण की शुरुआत

चानू ने पहले वजन उठाने वाले खेल (वेटलिफ्टिंग) के बारे में जानकारी हासिल की। चूंकि उनके गांव में वेटलिफ्टिंग सेंटर नहीं था। इसलिए उन्होंने इंफाल के खुमन लंपक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जाने का इरादा किया। यह सेन्टर उनके घर से 60 किलोमीटर दूर था, और रोज ट्रेन से यह दूरी तय करनी पड़ती थी।

ट्रेन छूटा, तो नयी जिन्दगी मिली

Mirabai Chanu इम्फाल के वेटलिफ्टिंग सेन्टर रोज ट्रेन से आया-जाया करती थी। लेकिन दिन लौटते समय उनकी ट्रेन छूट गयी थी। इम्फाल शहर में उनका कोई ठौर-ठिकाना भी नहीं था और न ही इस शहर में उन्हें कोई जानता था। रात हो चुकी थी। उन्होंने किसी मन्दिर में शरण लेने की सोची।

तभी उनकी नजर एक अर्द्धनिर्मित भवन पर पड़ी जिस पर ‘आर्य समाज मन्दिर’ लिखा हुआ था। अन्दर एक पुरोहित थे। चानू ने उनसे रात भर की शरण मांगी।

पुरोहित शरण देना चाहते थे, लेकिन उनकी विवशता थी। उस मन्दिर में एक ही कमरा था, जिसमें वह खुद रहते थे। दूसरा कमरा पूरा बना नहीं था, इसलिए उस समय वह रहने लायक नहीं था। इसलिए उन्होंने चानू को शरण देने में असमर्थता जतायी।

तब मीराबाई ने बिना छत के कमरे में ही रहने की इजाजत मांगी। लड़की होने के कारण पुरोहित ने चानू को वहां रहने की इजाजत दे दी। चानू बिना छत वाले उसी कमरे में सो गयीं। अचानक रात को बूंदाबादी शुरू हुई और उनकी नींद खुल गयी। मीराबाई ने छत की ओर देखा। दीवारों में लोहे के एंगल तो लगे थे, लेकिन उनपर सिल्लियां नहीं थी। सिल्लियां नीचे पड़ी थीं। फिर क्या था, चानू ने नीचे पड़ी पत्थर की सिल्लिया उठायीं और ऊपर एंगल पर जाकर रख ​दिया। एक, दो, तीन, चार… दर्जनों सिल्लियां थोड़ी देर में कक्ष की दीवारों के उपर लग चुकी थीं। यानी अब कमरे को एक छत मिल गयी थी। चानू यहीं नहीं रुकीं। वहां एक बरसाती पन्नी पड़ी थी, उसे उन्होंने सिल्लियों पर डाल दिया। फिर नीचे पड़े फावड़े और तसले से मिट्टी भर-भरकर छत पर सिल्लियों पर डाल दिया। इस प्रकार मीराबाई ने अकेले ही मंदिर की छत तैयार कर दी।

तब तक बारिश तेज हो चुकी थी, लेकिन चानू को अब भींगने का डर नहीं था। वह कमरे में आराम से थीं।

अगली सुबह आर्यसमाज के मंदिर के पुरोहित मीराबाई का यह कारनामा देखकर दंग रह गये। आश्चर्य के साथ पुरोहित खुश भी हुए और मीराबाई चानू को उनके इस कार्य का पुरस्कार भी दे दिया। पुरोहित ने चानू को मन्दिर में हमेशा के लिए शरण दे दी। अब मीराबाई चानू यहीं रहकर अपने खेल की तैयारियां खुलकर करने लगीं। अब उन्हें रोज-रोज 60 किलोमीटर आने-जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती थी।

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पुरोहित ने चानू में भरी देशभक्ति की भावना

आर्यसमाज मंदिर के पुरोहित चानू के लिए खुद चावल तैयार करके खिलाते और मीराबाई ने मंदिर के कक्षों को गाय के गोबर और पीली मिट्टी से लीप दिया करती थीं।

आर्यसमाज के पुरोहित समय-समय पर चानू को किताबें दिया करते थे। जिसे वह पढ़कर पुरोहित को सुनाया करती थीं। इन किताबों से चानू के अन्दर धर्म के प्रति आस्था तो जगी ही, साथ ही देशभक्ति की भावना भी जगी।

11 साल की उम्र में अण्डर-17 की बन गयी चैम्पियन

मीराबाई चानू 11 साल की उम्र में अंडर-15 चैंपियन बन गयी थी और 17 साल की उम्र में जूनियर चैंपियन का खिताब अपने नाम किया।

पुरोहित ने निकाला समस्या का समाधान

बढ़ती उम्र के साथ वेटलिफ्टिंग के लिए चानू को लोहे के बार की जरूरत थी। लेकिन इन्हें खरीदना परिवार के वश में नहीं थी। यह चानू के लिए मानसिक परेशान करने वाला समय था। मीराबाई ने यह समस्या पुरोहित से बताई, तो पुरोहित बोले- ‘बेटी चिंता न करो, शाम तक आओगी तो बार तैयार मिलेगा।’

शाम को जब चानू मंदिर लौटीं तो पुरोहित ने उनके हाथ में बांस से बनी थमा दी और कहा- ‘अब आराम से अभ्यास करो।’

कुंजुरानी से मुलाकात

आर्यसमाज मंदिर में ही पुरोहित ने चानू की भेंट कुंजुरानी से करवाई। कुंजुरानी उन दिनों मणिपुर की स्टार महिला वेटलिफ्टर थीं। उस समय तक कुंजुरानी एथेंस ओलंपिक में भाग ले चुकी थीं।

मीराबाई ने कुंजुरानी को अपना आदर्श बना लिया। पुरोहित के आग्रह पर कुंजुरानी ने चानू की हर संभव सहायता करने का बीड़ा उठाया।

राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण और वह 15 लाख रुपयों का इनाम

अब चानू के सपनों के सच होने की बारी थी। कुंजुरानी का सहयोग और चानू की खुद की लगन 2018 के राष्ट्रमंडल खेलों में मिली सफलता की कहानी खुद-ब-खुद कहती है। 2018 राष्ट्रमण्डल खेलों में विश्व कीर्तिमान के साथ चानू ने स्वर्ण जीतकर भारत का मान बढ़ाया था। उस समय मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने 15 लाख रुपये की नकद धनराशि देने की घोषणा की। 2018 में भारत सरकार ने पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित भी किया था। इसके पहले मीराबाई चानू 2016 में राष्ट्रीय खेलों का स्वर्ण पदक जीत चुकी थीं।

अब आ पहुंचा था वादा निभाने का समय

पुरस्कार मिलने के बाद मीराबाई ने बचपन में अपनी मां को दिया अपना वचन निभाया। सबसे पहले उन्होंने अपने घर के लिए एक बैलगाड़ी खरीदी। लेकिन आर्यसमाज मंदिर के पुरोहित का उपकार वह कैसे भूल सकती थीं। Mirabai Chanu के जीवन में बदलाव लाने की जितनी कड़ियां हैं, उनमें आर्यसमाज मंदिर के पुरोहित भी एक हैं। उनकी गुरुदक्षिणा के बिना चानू की शिक्षा अधूरी थी। चानू ने मन्दिर को पक्का करने के लिए एक लाख रुपए देकर अपनी गुरुदक्षिणा अर्पित की। सही मायनों में यह पुरोहित से मिले संस्कारों की भी गुरुदक्षिणा थी।

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