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Gandhi Jayanti: फुटबॉल के साथ रंगभेद के खिलाफ महात्मा गांधी का ‘सत्य का प्रयोग’

फुटबॉल के साथ रंगभेद के खिलाफ महात्मा गांधी का ‘सत्य का प्रयोग’

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आप सभी जानते हैं कि गांधी के महात्मा बनने की बुनियाद दक्षिण अफ्रीका में पड़ी थी। अब आप यह भी जान लीजिये इसका माध्यम बना आज दुनिया का सबसे चर्चित खेल फुटबॉल। दक्षिण अफ्रीका में जब महात्मा गांधी को ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया, उसी समय अंग्रेजों के गुरूर को जमीन पर लाने के लिए रंगभेद के खिलाफ कमर कस ली। गांधी ने रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह का हथियार पहली बार यहीं उठाया था। इसके बाद फुटबॉल के सहारे उन्होंने सत्य की एक अलग ही लड़ाई लड़ी। बापू को फुटबॉल पसंद था, क्योंकि यह टीम गेम है। जब तक पूरी टीम का प्रदर्शन अच्छा नहीं हो, इस खेल में जीत मुश्किल हो जाती है। गांधीजी को लगता था कि टीम वर्क को बढ़ावा देने के लिए ये बेजोड़ खेल है। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिस के दौरान उन्होंने फुटबॉल को अच्छी तरह समझा। चूंकि यह मध्यम और गरीब लोगों का खेल था, इसलिए इसे देखने के लिए काफी भीड़ जुटती थी। और इसी का फायदा महात्मा गांधी ने उठाया।

भीड़ को नस्लभेद के खिलाफ एकजुट करने का प्रयास

फुटबॉल मैचों के दौरान उमड़ने वाली भीड़ को देखकर गांधीजी ने रंगभेद के खिलाफ लोगों को जोड़ने की बात सोची। उन्होंने डरबन, प्रिटोरिया और जोहान्सबर्ग में तीन क्लब बनाये। संभवतः ये तीन क्लब ऐसे थे जिसे गोरे नहीं चलाते थे। इन तीन क्लबों के मैच में दर्शक भी अच्छी खासी संख्या में आते थे। बापू इनके मैचों में खेलते तो नहीं थे, लेकिन मौजूद हमेशा रहते थे। वह मैच के दौरान नस्लभेद के खिलाफ पम्प्लेट बांटा करते थे। मैचों से कमाई भी हो जाती थी। यह कमाई उन गरीब और मध्यम लोगों के परिवारों के बीच बांटी जाती थी जो नस्लभेद के शिकार हुए थे। गांधीजी का मानना था कि किसी खेल पर खिलाड़ियों की त्वचा के रंग का कोई असर नहीं होना चाहिए।

मैच वाली राशि के उपयोग का तरीखा अनोखा

गांधीजी की फुटबॉल टीम में वे लोग शामिल थे, जो दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ लड़ाई में गांधी के साथ थे। ये स्थानीय लोग थे और वहां के गोरे शासकों और गोरी स्थानीय जनता के अत्याचारों से मुक्ति पाना चाहते थे। गांधी ने इन्हें एक माध्यम बनाया और इन्हें खेल की शिक्षा न देकर इनका उपयोग बड़ी समझदारी से अपनी सामाजिक मांगों को पूरा करने के लिए किया। गांधी की टीमें जो भी मैच जीततीं, उससे मिलने वाली राशि का उपयोग उन लोगों के परिजनों को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए किया जाता था, जो अहिंसा की लड़ाई में जेल में डाल दिए गए थे।

भारत लौटने के बाद भी चलते रहे क्लब

महात्मा गांधी को 1914 में भारत आना पड़ा। उन्होंने हालांकि इन क्लबों को बंद नहीं किया। इसकी कमान गांधी ने 1913 के लेबर स्ट्राइक में शामिल अपने पुराने साथी अल्बर्ट क्रिस्टोफर को सौंप दी। क्रिस्टोफर ने 1914 में दक्षिण अफ्रीका की पहली पेशेवर फुटबॉल टीम का गठन किया। इस टीम में मुख्यतया भारतीय मूल के खिलाड़ियों को रखा गया।

मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में अफ्रीकन हिस्ट्री के प्रोफेसर पीटर अलेगी इसे बहुत बड़ी घटना मानते हैं। एक वेबसाइट ने अलेगी के हवाले से लिखा है, “यह अफ्रीका महाद्वीप का पहला ऐसा संगठित फुटबॉल समूह था, जिसका नेतृत्व वहां के गोरे लोगों के हाथों में नहीं था। गांधी ने फुटबॉल के माध्यम से लोगों को अपने सामाजिक आंदोलन से जोड़ा। मैचों के दौरान गांधी और उनके सहयोगी अक्सर संदेश लिखे पैम्पलेट बांटा करते थे।

साउथ अफ्रीकन इंडोर फुटबॉल एसोसिएशन ने गांधी को माना फुटबॉल लेजेंड

साउथ अफ्रीकन इंडोर फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष पूबालन गोविंदसामी ने फीफा को दिए साक्षात्कार में गांधी को फुटबॉल लेजेंड करार दिया। फीफा ने पूबालन के हवाले से लिखा है, “गांधी ने समझ लिया था कि इस देश में फुटबॉल के प्रति लोगों के अंदर अपार प्यार है और इसी प्यार के माध्यम से उन्हें सामाजिक आंदोलन का हिस्सा बनाया जा सकता है।”

फुटबॉल के लिए गांधी के खेतों का इस्तेमाल होता था। हालांकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि बापू ने भी कभी फुटबॉल खेली हो, लेकिन वे फुटबॉल मैचों के दौरान सक्रिय रूप से मौजूद रहते थे। बापू जब भारत लौटे तब भी उनके क्लब जिंदा रहे और कई भारतीय मूल के लोगों ने मूनलाइटर्स एफसी और मैनिंग रेंजर्स एफसी जैसे क्लबों की स्थापना की।

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